11 साल का भारतीय “एलब्रूस चोटी” पर चढ़ाई करेगा

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र्यन बालाजी नामक 11 साल का भारतीय लड़का कुछ ही दिनों में रूस में स्थित यूरोप की सबसे ऊँची पर्वतचोटी एलब्रूस (5 हजार 6 सौ 42 मीटर) पर चढ़ने का प्रयास कर रहा होगा। यदि वह सफल हो जाता है, तो वह इस चोटी पर चढ़ने वाला सबसे कम उम्र का भारतीय बन जाएगा। इस नन्हें साहसिक पर्वतारोही के रूस के काकेशस अंचल की यात्रा पर निकलने से पहले रूस-भारत संवाद ने उससे बात की।

दक्षिणी रूस में स्थित मिनेराल्निये वोदि नामक शहर के लिए विमान पकड़ने से कुछ घंटे पहले आर्यन बालाजी नामक यह लड़का दक्षिण मुंबई के एक जलपानगृह में मजे से चिकन टिक्का सैंडविच खा रहा था। मिनेरल्न्ये वोदी से आर्यन, उसके पिता कमांडर के एस बालाजी और उसकी माँ रिकी बालाजी एलब्रूस चोटी के लिए अपनी ऐतिहासिक साहसिक यात्रा पर निकलेंगे। उल्लेखनीय है कि कमांडर के एस बालाजी भारतीय नौसेना के अधिकारी व एक अनुभवी पर्वतारोही हैं, जबकि रिकी बालाजी एक पैराशूट गोताखोर हैं।

श्रीमती रिकी बालाजी ने बताया “एलब्रूस में भारतीय खाना नहीं मिलेगा”। उन्होंने आगे बताया कि हमारे परिवार को बिना मसाले वाले साधारण रूसी भोजन से ही काम चलाना पड़ेगा। वैसे रूसी भोजन में पर्याप्त प्रोटीन होता है, जिससे हमें इस चुनौतीपूर्व काम के लिए भरपूर ऊर्जा मिलेगी।

बक्सान खाई में काफी ऊँचाई पर स्थित तेर्स्काल नामक गाँव में पहुँचने के बाद इस परिवार ने 20 अगस्त को ही अपना साहसिक अभियान शुरू कर दिया है। चोटी पर चढ़ने की कोशिश करने से पहले उन्हें विभिन्न ऊँचाइयों पर अनेक दिन गुजारने हैं, ताकि वे यहाँ की जलवायु के अभ्यस्त हो सकें और पर्वतारोहण का थोड़ा पूर्वाभ्यास भी कर लें।

विशेषज्ञों के अनुसार एलब्रूस “सात शिखर” सूची (विश्व के सात महाद्वीपों के सात सबसे ऊँचे पर्वत) में शामिल चोटियों सहित अन्य अनेक चोटियों के मुकाबले तकनीकी रूप से मुश्किल पर्वत नहीं है। लेकिन ऊँचाई परिवर्तन और तेज पवन व जमा देने वाली ठंड के कारण अनुभवी पर्वतारोहियों के लिए भी इस पर चढ़ाई करना काफी मुश्किल काम होता है।

जब आर्यन से पूछा गया कि एलब्रूस की चढ़ाई करने की बात से क्या आपको डर लग रहा है, तो उसने मुस्कराकर कहा: “थोड़ी-सी उत्तेजना तो जरूर है”। आर्यन ने सात साल की उम्र में ही एवरेस्ट आधार शिविर (5 हजार 3 सौ 64 मीटर) और काला पत्थर (5 हजार 5 सौ 45 मीटर) पर चढ़ाई कर ली थी। सात साल दस महीने की उम्र में उसने अफ़्रीका के सबसे ऊँचे पर्वत किलिमंजारो और साढ़े आठ साल की उम्र में हिमालय की शितिधर शिखर (5 हजार 2 सौ 50 मीटर) तथा मैत्री शिखर (5 हजार 2 सौ 89 मीटर) पर चढ़ाई पूरी की थी।

एलब्रूस चोटी पर चढ़ने से पहले आर्यन बालाजी ने भारत के प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी से मिले। स्रोत: pmindia.gov.in
एलब्रूस चोटी पर चढ़ने से पहले आर्यन बालाजी ने भारत के प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी से मिले। स्रोत: pmindia.gov.in

इतनी कम उम्र का आर्यन केवल पर्वतारोहण ही नहीं करता बल्कि वह गोताखोरी, एक पहिए वाली साइकिल की सवारी, स्केटिंग, नौकायन, गोल्फ खेलना, अभिनय और मॉडलिंग भी करता है। 2014 में आर्यन को खेलकूद, साहसिक कार्यों तथा समाज सेवा के क्षेत्र में अपनी उपलब्धियों के लिए भारत के राष्ट्रपति से 2014 का राष्ट्रीय बाल पुरस्कार प्राप्त हुआ। 2012 में सामुदायिक सेवा के लिए उसे गाँधी सेवा मेडल मिला था। आर्यन 2018 में उत्तर यानी तिब्बत की तरफ से एवरेस्ट पर चढ़ाई करने की तैयारी कर रहा है, जिसकी योजना उसने 2010 में ही बनाई थी।

भारत से एलब्रूस तक
एलब्रूस पर बाल पर्वतारोहियों द्वारा चढ़ाई करने का लंबा इतिहास रहा है। अनेक देशों के बाल पर्वतारोही इस चोटी पर पहुँचने में सफल रहे हैं। 2013 में बल्गारिया की 10 साल की इवाना पेंचेवा और 2015 में अमरीका के 11 साल के टाइलर आर्मस्ट्रांग ने एलब्रूस की चढ़ाई पूरी की थी। इस चोटी पर सबसे कम उम्र में चढ़ने का कीर्तिमान 8 साल के इवान बुकानफ़ के नाम है। मास्को अंचल में स्थित झ़ूकव्स्की शहर के रहने वाले इस बच्चे ने 2012 में एलब्रूस पर चढ़ाई की थी।

इस बार की गर्मी में भारत के लगभग आठ पर्वतारोही एलब्रूस पर चढ़ाई कर चुके हैं। उनमें तनीष खोट नामक 13 साल का पुणे का एक लड़का भी रहा, जिसने अपने पिता ऋतुज शाह के साथ इस अभियान को पूरा किया। 2015 में जाह्नवी श्रीपेरंबुदूरु नामक 13 साल की ही हैदराबाद की एक लड़की ने भी एलब्रूस पर चढ़ाई की थी। जुलाई 2014 में 20-22 साल की कई भारतीय युवतियों ने एलब्रूस चोटी पर चढ़ाई की थी। इस अभियान में साची सोनी, आकृति हीर और अंतरराष्ट्रीय ख्याति-प्राप्त अरुणिमा सिन्हा शामिल थीं। अरुणिमा सिन्हा एवरेस्ट शिखर पर चढ़ने वाली विश्व की पहली विकलांग महिला हैं।

बालाजी परिवार के अनुसार भारतीय पर्वतारोहियों के बीच रूस की एलब्रूस चोटी की लोकप्रियता दिन पर दिन बढ़ती जा रही है। हालाँकि एलब्रूस पर्वत तथा पर्वतारोहियों के लिए वहाँ उपलब्ध सुविधाओं की जानकारी पाना भारतीयों के लिए बहुत आसान नहीं है और इस समस्या को दूर करने के लिए बहुत कुछ करना शेष है।

रूसी सूचना केंद्र के विशेषज्ञों का विचार है कि एलब्रूस ऐसे भारतीय पर्यटकों के लिए एक नया गंतव्य बन सकता है, जो मास्को और साँक्त पितेरबुर्ग के धरोहर स्थलों को देखने के अलावा और कुछ खोज रहे हैं। दक्षिणी रूस में स्थित एलब्रूस पर्वत रूस की ग्रीष्मकालीन तटीय सैरगाह और 2014 शीतकालीन ओलंपिक के मेजबान शहर सोची से केवल सात सौ किलोमीटर की दूरी पर है। एलब्रूस सिर्फ पर्वतारोहियों का ही गंतव्य नहीं है बल्कि स्कीइंग और आधुनिक स्नोबोर्डिंग जैसे चरम खेल-प्रेमियों के भी आकर्षण का केंद्र है। यहाँ की पर्वतीय ढलानों पर इस तरह के खेलों के लिए साल भर आदर्श स्थिति बनी रहती है।

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