जलवायु परिवर्तन

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जलवायु परिवर्तन औसत मौसमी दशाओं के पैटर्न में ऐतिहासिक
रूप से बदलाव आने को कहते हैं। सामान्यतः इन बदलावों का अध्ययन पृथ्वी के इतिहास
को दीर्घ अवधियों में बाँट कर किया जाता है। जलवायु की दशाओं में यह बदलाव
प्राकृतिक भी हो सकता है और मानव के क्रियाकलापों का परिणाम भी।[1] हरितगृह प्रभाव
और वैश्विक तापन को मनुष्य की क्रियाओं का परिणाम माना जा रहा है जो औद्योगिक
क्रांति के बाद मनुष्य द्वारा उद्योगों से निःसृत कार्बन डाई आक्साइड आदि गैसों के
वायुमण्डल में अधिक मात्रा में बढ़ जाने का परिणाम है।[2] जलवायु परिवर्तन के
खतरों के बारे में वैज्ञानिक लगातार आगाह करते आ रहे हैं[3]
जलवायु परिवर्तन
हमें गर्मी के मौसम में गर्मी व सर्दी के मौसम में ठण्ड
लगती है। ये सब कुछ मौसम में होने वाले बदलाव के कारण होता है। मौसम, किसी भी स्थान की औसत जलवायु होती है जिसे
कुछ समयावधि के लिये वहां अनुभव किया जाता है। इस मौसम को तय करने वाले मानकों में
वर्षा, सूर्य प्रकाश, हवा, नमी व तापमान प्रमुख हैं।
मौसम में बदलाव काफी जल्दी होता है लेकिन जलवायु में बदलाव
आने में काफी समय लगता है और इसीलिये ये कम दिखाई देते हैं। इस समय पृथ्वी के
जलवायु में परिवर्तन हो रहा है और सभी जीवित प्राणियों ने इस बदलाव के साथ
सामंजस्य भी बैठा लिया है।
परंतु,
पिछले 150-200 वर्षों में
ये जलवायु परिवर्तन इतनी तेजी से हुआ है कि प्राणी व वनस्पति जगत को इस बदलाव के
साथ सामंजस्य बैठा पाने में मुश्किल हो रहा है। इस परिवर्तन के लिये एक प्रकार से
मानवीय क्रिया-कलाप ही जिम्मेदार है।
जलवायु परिवर्तन के कारण
जलवायु परिवर्तन के कारणों को दो बागों में बांटा जा सकता
है- प्राकृतिक व मानव निर्मित
I. प्राकृतिक कारण
जलवायु परिवर्तन के लिये अनेक प्राकृतिक कारण जिम्मेदार
हैं। इनमें से प्रमुख हैं- महाद्वीपों का खिसकना, ज्वालामुखी, समुद्री तरंगें और धरती का घुमाव।
• महाद्वीपों का खिसकना
हम आज जिन महाद्वीपों को देख रहे हैं, वे इस धरा की उत्पत्ति के साथ ही बने थे
तथा इनपर समुद्र में तैरते रहने के कारण तथा वायु के प्रवाह के कारण इनका खिसकना
निरंतर जारी है। इस प्रकार की हलचल से समुद्र में तरंगें व वायु प्रवाह उत्पन्न
होता है। इस प्रकार के बदलावों से जलवायु में परिवर्तन होते हैं। इस प्रकार से
महाद्वीपों का खिसकना आज भी जारी है।
• ज्वालामुखी
जब भी कोई ज्वालामुखी फूटता है, वह काफी मात्रा में सल्फरडाई ऑक्साइड, पानी, धूलकण और राख के कणों का वातावरण में उत्सर्जन करता है। भले
ही ज्वालामुखी थोड़े दिनों तक ही काम करें लेकिन इस दौरान काफी ज्यादा मात्रा में
निकली हुई गैसें, जलवायु को लंबे समय तक
प्रभावित कर सकती है। गैस व धूल कण सूर्य की किरणों का मार्ग अवरूद्ध कर देते हैं, फलस्वरूप वातावरण का तापमान कम हो जाता
है।
• पृथ्वी का झुकाव
धरती 23.5 डिग्री के कोण पर, अपनी कक्षा में झुकी हुई है। इसके इस झुकाव में परिवर्तन से
मौसम के क्रम में परिवर्तन होता है। अधिक झुकाव का अर्थ है अधिक गर्मी व अधिक
सर्दी और कम झुकाव का अर्थ है कम मात्रा में गर्मी व साधारण सर्दी।
• समुद्री तरंगें
समुद्र,
जलवायु का एक प्रमुख भाग
है। वे पृथ्वी के 71 प्रतिशत भाग पर फैले हुए हैं। समुद्र द्वारा पृथ्वी की सतह की
अपेक्षा दुगुनी दर से सूर्य की किरणों का अवशोषण किया जाता है। समुद्री तरंगों के
माध्यम से संपूर्ण पृथ्वी पर काफी बड़ी मात्रा में ऊष्मा का प्रसार होता है।
II. मानवीय कारण
ग्रीन हाउस प्रभाव
पृथ्वी द्वारा सूर्य से ऊर्जा ग्रहण की जाती है जिसके चलते
धरती की सतह गर्म हो जाती है। जब ये ऊर्जा वातावरण से होकर गुज़रती है, तो कुछ मात्रा में, लगभग 30 प्रतिशत ऊर्जा वातावरण में ही रह
जाती है। इस ऊर्जा का कुछ भाग धरती की सतह तथा समुद्र के ज़रिये परावर्तित होकर
पुनः वातावरण में चला जाता है। वातावरण की कुछ गैसों द्वारा पूरी पृथ्वी पर एक परत
सी बना ली जाती है व वे इस ऊर्जा का कुछ भाग भी सोख लेते हैं। इन गैसों में शामिल
होती है कार्बन डाईऑक्साइड, मिथेन, नाइट्रस ऑक्साइड व जल कण, जो वातावरण के 1 प्रतिशत से भी कम भाग में
होते है। इन गैसों को ग्रीन हाउस गैसें भी कहते हैं। जिस प्रकार से हरे रंग का
कांच ऊष्मा को अन्दर आने से रोकता है, कुछ इसी प्रकार से ये गैसें, पृथ्वी के ऊपर एक परत बनाकर अधिक ऊष्मा से इसकी रक्षा करती
है। इसी कारण इसे ग्रीन हाउस प्रभाव कहा जाता है।
ग्रीन हाउस प्रभाव को सबसे पहले फ्रांस के वैज्ञानिक जीन
बैप्टिस्ट फुरियर ने पहचाना था। इन्होंने ग्रीन हाउस व वातावरण में होने वाले समान
कार्य के मध्य संबंध को दर्शाया था।
ग्रीन हाउस गैसों की परत पृथ्वी पर इसकी उत्पत्ति के समय से
है। चूंकि अधिक मानवीय क्रिया-कलापों के कारण इस प्रकार की अधिकाधिक गैसें वातावरण
में छोड़ी जा रही है जिससे ये परत मोटी होती जा रही है व प्राकृतिक ग्रीन हाउस का
प्रभाव समाप्त हो रहा है।
कार्बन डाईऑक्साइड तब बनती है जब हम किसी भी प्रकार का ईंधन
जलाते हैं, जैसे- कोयला, तेल, प्राकृतिक गैस आदि। इसके बाद हम वृक्षों को भी नष्ट कर रहे
है, ऐसे में वृक्षों में संचित कार्बन
डाईऑक्साइड भी वातावरण में जा मिलती है। खेती के कामों में वृद्धि, ज़मीन के उपयोग में विविधता व अन्य कई
स्रोतों के कारण वातावरण में मिथेन और नाइट्रस ऑक्साइड गैस का स्राव भी अधिक
मात्रा में होता है। औद्योगिक कारणों से भी नवीन ग्रीन हाउस प्रभाव की गैसें
वातावरण में स्रावित हो रही है,
जैसे क्लोरोफ्लोरोकार्बन, जबकि ऑटोमोबाईल से निकलने वाले धुंए के
कारण ओज़ोन परत के निर्माण से संबद्ध गैसें निकलती है। इस प्रकार के परिवर्तनों से
सामान्यतः वैश्विक तापन अथवा जलवायु में परिवर्तन जैसे परिणाम परिलक्षित होते हैं।
हम ग्रीन हाउस गैसों में किस प्रकार अपना योगदान देते हैं?
• कोयला, पेट्रोल आदि जीवाष्म ईंधन का उपयोग कर
• अधिक ज़मीन की चाहत में हम
पेड़ों को काटकर
• अपघटित न हो सकने वाले समान
अर्थात प्लास्टिक का अधिकाधिक उपयोग कर
• खेती में उर्वरक व
कीटनाशकों का अधिकाधिक प्रयोग कर
जलवायु परिवर्तन का प्रभाव
उत्तरः जलवायु परिवर्तन से मानव पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता
है। 19 वीं सदी के बाद से पृथ्वी की सतह का सकल तापमान 03 से 06 डिग्री तक बढ़
ग़या है। ये तापमान में वृद्धि के आंकड़े हमें मामूली लग सकते हैं लेकिन ये आगे
चलकर महाविनाश को आकार देंगे,
जैसा कि नीचे बताया गया है-
(क) खेती
बढ़ती जनसंख्या के कारण भोजन की मांग में भी वृद्धि हुई है।
इससे प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बनता है। जलवायु में परिवर्तन का सीधा प्रभाव
खेती पर पडेग़ा क्योंकि तापमान,
वर्षा आदि में बदलाव आने से
मिट्टी की क्षमता, कीटाणु और फैलने वाली
बीमारियां अपने सामान्य तरीके से अलग प्रसारित होंगी। यह भी कहा जा रहा है कि भारत
में दलहन का उत्पादन कम हो रहा है। अति जलवायु परिवर्तन जैसे तापमान में वृद्धि के
परिमाणस्वरूप आने वाले बाढ़ आदि से खेती का नुकसान बढ़ेगा।
(ख) मौसम
गर्म मौसम होने से वर्षा का चक्र प्रभावित होता है, इससे बाढ़ या सूखे का खतरा भी हो सकता है, ध्रुवीय ग्लेशियरों के पिघलने से समुद्र
के स्तर में वृद्धि की भी आशंका हो सकती है। पिछले वर्ष के तूफानों व बवंडरों ने
अप्रत्यक्ष रूप से इसके संकेत दे दिये है।
(ग) समुद्र के जल-स्तर में वृद्धि
जलवायु परिवर्तन का एक और प्रमुख कारक है समुद्र के जल-स्तर
में वृद्धि। समुद्र के गर्म होने,
ग्लेशियरों के पिघलने से यह
अनुमान लगाया जा रहा है कि आने वाली आधी सदी के भीतर समुद्र के जल-स्तर में लगभग
आधे मीटर की वृद्धि होगी। समुद्र के स्तर में वृद्धि होने के अनेकानेक दुष्परिणाम
सामने आएंगे जैसे तटीय क्षेत्रों की बर्बादी, ज़मीन का पानी में जाना, बाढ़,
मिट्टी का अपरदन, खारे पानी के दुष्परिणाम आदि। इससे तटीय
जीवन अस्त-व्यस्त हो जाएगा, खेती, पेय जल, मत्स्य पालन व मानव बसाव तहस नहस हो जाएगी।
(घ) स्वास्थ्य
वैश्विक ताप का मानवीय स्वास्थ्य पर भी सीधा असर होगा, इससे गर्मी से संबंधित बीमारियां, निर्जलीकरण, संक्रामक बीमारियों का प्रसार, कुपोषण और मानव स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव
होगा।
(ङ) जंगल और वन्य जीवन
प्राणी व पशु, ये प्राकृतिक वातावरण में रहने वाले हैं व ये जलवायु
परिवर्तन के प्रति काफी संवेदनशील होते हैं। यदि जलवायु में परिवर्तन का ये दौर
इसी प्रकार से चलता रहा, तो कई जानवर व पौधे समाप्ति
की कगार पर पहुंच जाएंगे।
सुरक्षात्मक उपाय
• जीवाष्म ईंधन के उपयोग में
कमी की जाए
• प्राकृतिक ऊर्जा के स्रोतों
को अपनाया जाए, जैसे सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा आदि
• पेड़ों को बचाया जाए व अधिक
वृक्षारोपण किया जाए
• प्लास्टिक जैसे अपघटन में
कठिन व असंभव पदार्थ का उपयोग न किया जाए
जलवायु परिवर्तन और मध्यप्रदेश
मध्यप्रदेश के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन का
सीधा असर देखा और महसूस किया जा सकता है। यह एक अहम अनाज उत्पादक इलाका रहा है पर
यहां पिछले सात सालों में इसके चलते किसानों व पान उत्पादकों का जिंदगी बदल कर रख
दी है। जलवायु परिवर्तन ने यहां कृषि आधारित आजीविका और खाद्यान्न उत्पादन पर खासा
असर डाला है। मध्यप्रदेश के उत्तर-पूर्वी जिलों में पिछले 9 सालों में खाद्यान्न
उत्पादन में 58 फीसदी की कमी दर्ज की गई है। पिछले चार-पांच सालों में बेहद कम
पानी बरसने या कई क्षेत्रों में सूखा पड़ने के चलते इस क्षेत्र के तकरीबन सभी कुएं
सूख चुके हैं। निष्चित तौर पर यह कृषि आधारित समाज तथा उसकी आर्थिक स्थिति के लिए
बेहद गंभीर बात है। मध्यप्रदेश में कृषि क्षेत्र में नाकामी अब एक चक्रीय परिघटना
बन चुकी है, और जलवायु परिवर्तन इसका
बड़ा कारण है।
जलवायु परिवर्तन सम्मेलन
द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात जलवायु परिवर्तन को लेकर
वैश्विक स्तर पर चर्चाएँ प्रारंभ हुईं। १९७२ मे स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में
पहला सम्मेलन आयोजित किया गया। तय हुआ कि प्रत्येक देश जलवायु परिवर्तन से निपटने
के लिए घरेलू नियम बनाएगा। इस आशय की पु्ष्टि हेतु १९७२ में ही संयुक्त राष्ट्र
पर्यावरण कार्यक्रम का गठन किया गया तथा नैरोबी को इसका मुख्यालय बनाया गया।
पृथ्वी सम्मेलन
स्टॉकहोम सम्मेलन के २० वर्ष पश्चात ब्राजील के रियो डि
जेनेरियो में सम्बद्ध राष्ट्रों के प्रतिनिधि एकत्रित हुए तथा जलवायु परिवर्तन
संबंधित कार्ययोजना के भविष्य की दिशा पर पुनः चर्चा आरंभ भी। इस सम्मेलन को रियो
सम्मेलन, स्टॉकहोम २०, ९२ अभिसमय, तथा एजेण्डा २१ आदि नामों से भी जाना जाता है। रियो में यह
तय किया गया कि सदस्य राष्ट्र प्रत्येक वर्ष एक सम्मेलन में एकत्रित होंगे तथा
जलवायु संबंधित चिंताओं और कार्ययोजनाओं पर चर्चा करेंगें। इस सम्मेलन को
कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज (कोप) नाम दिया गया। १९९५ में पहला कोप सम्मेलन आयोजित किया
गया। १९९५ से २०११ तक कुल १७ कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज आयोजित किये जा चुके हैं।
प्रमुख जलवायु परिवर्तन सम्मेलन
कोप-३,
क्योटो, जापान १९९७
रियो-१०,
रियो डि जेनेरियो, ब्राजील २००२
कोप-१३,
बाली, इण्डोनेशिया २००७
कोप-१७,
डरबन, दक्षिण अफ्रीका २०११
कम्पोस्ट टॉयलेट (शौचालय खाद)
मल एक ऐसी वस्तु है जो हमारे पेट में तो पैदा होती है पर
जैसे ही वह हमारे शरीर से अलग होती है हम उस तरफ देखना या उसके बारे में सोचना भी
पसंद नहीं करते। पर आंकडे बताते हैं कि फ्लश लैट्रिन के आविष्कार के 100 साल
बाद भी आज दुनिया में सिर्फ 15% लोगों के पास ही आधुनिक विकास का यह प्रतीक पहुंच
पाया है और फ्लश लैट्रिन होने के बावज़ूद भी इस मल का 95% से अधिक आज भी नदियों के
माध्यम से समुद्र में पहुंचता है बगैर किसी ट्रीटमेंट के।
दुनिया के लगभग आधे लोगों के पास पिट लैट्रिन है जहां मल
नीचे गड्ढे में इकट्ठा होता है और आंकडों के अनुसार इनमें से अधिकतर से मल रिस रिस
कर ज़मीन के पानी को दूषित कर रहे हैं। छत्तीसगढ में बिलासपुर जैसे शहर इसके
उदाहरण हैं।और शहरों का क्या कहें, योजना आयोग के आंकडे के अनुसार राजधानी दिल्ली में 20% मल
का भी ट्रीटमेंट नहीं हो पाता शेष मल फ्लश के बाद सीधे यमुना में पहुंच जाता है।
यूरोप में 540 शहर में से सिर्फ 79 के पास आधुनिक ट्रीटमेंट प्लांट हैं। 168
यूरोपियन शहरों के पास कोई ट्रीटमेंट प्लांट नहीं है। आधुनिक विकास का प्रतीक लंदन
भी 1997 तक अपने मल को सीधे समुद्र में प्रवाहित किया करता था। 2004 में जब एकदिन
आंधी आई तो लंदन का ट्रीटमेंट प्लांट बैठ गया और लंदन ने एक बार फिर सारा मल टेम्स
नदी में प्रवाहित कर दिया। पर कोई इस बारे में बातचीत नहीं करना चाहता कि अगर लंदन
का यह हाल है तो और शहरों का क्या हाल होगा ? इस दुनिया ने बहुत तरक्की कर ली है आदमी चांद और न जाने
कहां कहां पहुंच गया है पर हमें यह नहीं पता कि हम अपने मल के साथ क्या करें। क्या
किसी ने कोई गणित लगाया है कि यदि सारी दुनिया में फ्लश टॉयलेट लाना है और उस मल
का ट्रीटमेंट करना है तो विकास की इस दौड में कितना खर्च आयेगा ?
दक्षिण अफ्रीका में 1990 के एक विश्व सम्मेलन में यह वादा
किया गया था कि सन 2000 तक सभी को आधुनिक शौचालय मुहैया करा दिया जायेगा। अब सन
2000 में वादा किया गया है कि 2015 तक विश्व के आधे लोगों को आधुनिक शौचालय मुहैया
करा दिये जायेंगे। भारत समेत दुनिया के तमाम देशों ने इस वचनपत्र पर हस्ताक्षर
किये हैं और इस दिशा में काम भी कर रहे हैं। भारत के आंकडों को देखें तो ग्रामीण इलाकों में सिर्फ 3%
लोगों के पास फ्लश टायलेट हैं शहरों में भी यह आंकडा 22.5% को पार नहीं करता।
स्टाकहोम एनवायरनमेंट इंस्टीट्यूट दुनिया की प्रमुखतम
पर्यावरण शोध संस्थाओं में से एक है। इस संस्था के उप प्रमुख योरान एक्सबर्ग कहते
हैं फ्लश टायलेट की सोच गलत थी,
उसने पर्यावरण का बहुत
नुकसान किया है और अब हमें अपने आप को और अधिक बेवकूफ बनाने की बजाय विकेन्द्रित
समाधान की ओर लौटना होगा।
सीधा सा गणित है कि एक बार फ्लश करने में 10 से 20 लीटर
पानी की आवश्यकता होती है यदि दुनिया के 6 अरब लोग फ्लश लैट्रिन का उपयोग करने लगे
तो इतना पानी आप लायेंगे कहां से और इतने मल का ट्रीटमेंट करने के लिये प्लांट
कहां लगायेंगे ?
हमारे मल में पैथोजेन होते हैं जो सम्पर्क में आने पर हमारा
नुकसान करते हैं। इसलिये मल से दूर रहने की सलाह दी जाती है। पर आधुनिक विज्ञान
कहता है यदि पैथोजेन को उपयुक्त माहौल न मिले तो वह थोडे दिन में नष्ट हो जाते हैं
और मनुष्य का मल उसके बाद बहुत अच्छे खाद में परिवर्तित हो जाता है जिसे कम्पोस्ट
कहते हैं।
वैज्ञानिकों के अनुसार एक मनुष्य प्रतिवर्ष औसतन जितने मल
मूत्र का त्याग करता है उससे बने खाद से लगभग उतने ही भोजन का निर्माण होता है
जितना उसे सालभर ज़िन्दा रहने के लिये ज़रूरी होता है।
यह जीवन का चक्र है। रासायनिक खाद में भी हम नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटेशियम का उपयोग करते हैं।
मनुष्य के मल एवं मूत्र उसके बहुत अच्छे स्रोत हैं।
एक आधुनिक विकसित मनुष्य के लिये यह सोच भी काफी तकलीफदेय
है कि हमारा भोजन हमारे मल से पैदा हो पर सत्य से मुंह मोडना हमें अधिक दूर नहीं
ले जायेगा।
विकास की असंतुलित अवधारणा ने हमें हमारे मल को दूर फेंकने
के लिये प्रोत्साहित किया है,
फ्लश कर दो उसके बाद भूल
जाओ। रासायनिक खाद पर आधारित कृषि हमें अधिक दूर ले जाती दिखती नहीं है। हम एक ही
विश्व में रहते हैं और गंदगी को हम जितनी भी दूर फेंक दे वह हम तक लौट कर आती है। गांधी जी अपने आश्रम में कहा करते थे गड्ढा खोदो और अपने मल
को मिट्टी से ढक दो। आज विश्व के तमाम वैज्ञानिक उसी राह पर वापस आ रहे हैं।
वे कह रहे हैं कि मल में पानी मिलाने से उसके पैथोजेन को
जीवन मिलता है वह मरता नहीं। मल को मिट्टी या राख से ढंक दीजिये वह खाद बन जायेगी। इसके बेहतर प्रबंधन की ज़रूरत है दूर फेंके जाने की नहीं।
हमें अपने सोच में यह बदलाव लाने की ज़रूरत है कि मल और मूत्र खजाने हैं बोझ नहीं।
यूरोप और अमेरिका में ऐसे अनेक राज्य हैं जो अब लोगों को सूखे टॉय़लेट की ओर
प्रोत्साहित कर रहे हैं। चीन में ऐसे कई नए शहर बन रहे हैं जहां सारे के सारे
आधुनिक बहुमंजिली भवनों में कम्पोस्ट टायलेट ही होंगे।
भारत में भी इस दिशा में काफी लोग काम कर रहे हैं। केरल की
संस्था www.eco-solutions.org ने इस दिशा में कमाल का काम
किया है। मध्यप्रदेश के वरिष्ठ अधिकारियों ने केरल में उनके कम्पोस्ट टॉयलेट का
दौरा किया है। छत्तीसगढ के नेता,
अधिकारियों को भी उनसे सीख
लेने की ज़रूरत है। विज्ञान की मदद से आज हमें किसी मेहतरानी की ज़रूरत नहीं है
जो हमारा मैला इकट्ठा करे। कम्पोस्ट टॉयलेट द्वारा मल मूत्र का वैज्ञानिक प्रबंधन
बहुत सरलता से सीखा जा सकता है। गांवों में यह सैकडों नौकरियां पैदा करेगा, कम्पोस्ट फसल की पैदावार बढाएगा और मल के
सम्पर्क में आने से होने वाली बीमारियों से बचायेगा। मल को नदी में बहा देने से वह किसी न किसी रूप में हमारे
पास फिर वापस आती है। यह शतुरमुर्गी चाल हमें छोडनी होगी वर्ना हमारी बरबादी का
ज़िम्मेदार कोई और नहीं होगा। गांधी जी ने एक बार कहा था शौच का सही प्रबंधन आज़ादी से भी
अधिक महत्वपूर्ण विषय है। कम्पोस्ट टॉयलेट आज की गांधीगिरी है। यह छत्तीसगढ के
गांवों का कायाकल्प करने की।
पर्यावरण के अनुकूल हैं जैविक-शौचालय
टोक्यो/ गंदे और बदबूदार सार्वजनिक शौचालयों से निजात
दिलाने के लिए जापान की एक गैर सरकारी संस्था ने ‘जैविक-शौचालय’ विकसित करने में सफलता हासिल की है। ये खास किस्म के शौचालय
गंध-रहित तो हैं ही, साथ ही पर्यावरण के लिए भी
सुरक्षित हैं। समाचार एजेंसी ‘डीपीए’ के अनुसार संस्था द्वारा विकसित किए गए
जैविक-शौचालय ऐसे सूक्ष्म कीटाणुओं को सक्रिय करते हैं जो मल इत्यादि को सड़ने में
मदद करते हैं।
इस प्रक्रिया के तहत मल सड़ने के बाद केवल नाइट्रोजन गैस और
पानी ही शेष बचते हैं, जिसके बाद पानी को
पुर्नचक्रित (री-साइकिल) कर शौचालयों में इस्तेमाल किया जा सकता है। संस्था ने
जापान की सबसे ऊंची पर्वत चोटी ‘माउंट फुजी’ पर इन शौचालयों को स्थापित किया है।
गौरतलब है गर्मियों में यहां आने वाले पर्वतारोहियों द्वारा इस्तेमाल किए जाने
वाले सार्वजनिक शौचालयों के चलते पर्वत पर मानव मल इकट्ठा होने से पर्यावरण दूषित
हो रहा है। इस प्रयास के बाद ‘माउंट फुजी’ पर मौजूद सभी 42 शौचालयों को जैविक-शौचालयों में बदल दिया
गया है। इसके अलावा सार्वजनिक इस्तेमाल के लिए पर्यावरण के लिए स़ुरक्षित आराम-गृह
भी बनाए गए हैं।
जल संसाधन
जल संसाधन पानी के वह स्रोत हैं जो मानव के लिए उपयोगी हों
या जिनके उपयोग की संभावना हो। पानी के उपयोगों में शामिल हैं कृषि, औद्योगिक, घरेलू,
मनोरंजन हेतु और पर्यावरणीय
गतिविधियों में। वस्तुतः इन सभी मानवीय उपयोगों में से ज्यादातर में ताजे जल की
आवश्यकता होती है। पृथ्वी पर पानी की कुल उपलब्ध मात्रा अथवा भण्डार को
जलमण्डल कहते हैं।[1] पृथ्वी के इस जलमण्डल का ९७.५% भाग समुद्रों में खारे जल के
रूप में है और केवल २.५% ही मीठा पानी है, उसका भी दो तिहाई हिस्सा हिमनद और ध्रुवीय क्षेत्रों में
हिम चादरों और हिम टोपियों के रुप में जमा है।[2] शेष पिघला हुआ मीठा पानी मुख्यतः
जल के रूप में पाया जाता है,
जिस का केवल एक छोटा सा भाग
भूमि के ऊपर धरातलीय जल के रूप में या हवा में वायुमण्डलीय जल के रूप में है।
मीठा पानी एक नवीकरणीय संसाधन है क्योंकि जल चक्र में
प्राकृतिक रूप से इसका शुद्धीकरण होता रहता है, फिर भी विश्व के स्वच्छ पानी की पर्याप्तता लगातार गिर रही
है दुनिया के कई हिस्सों में पानी की मांग पहले से ही आपूर्ति से अधिक है और
जैसे-जैसे विश्व में जनसंख्या में अभूतपूर्व दर से वृद्धि हो रही हैं, निकट भविष्य मैं इस असंतुलन का अनुभव
बढ़ने की उम्मीद है। पानी के प्रयोक्ताओं के लिए जल संसाधनों के आवंटन के लिए
फ्रेमवर्क (जहाँ इस तरह की एक फ्रेमवर्क मौजूद है) जल अधिकार के रूप में जाना जाता
है।[3]

आज जल संसाधन की कमी, इसके अवनयन और इससे संबंधित तनाव और संघर्ष विश्वराजनीति और
राष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। जल विवाद राष्ट्रीय और
अंतर्राष्ट्रीय दोनों स्तरों पर महत्वपूर्ण विषय बन चुके हैं।

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