गहरे समुद्री खनिजों का अन्‍वेषण

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योजना विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा पृथ्‍वी विज्ञान राज्‍य मंत्री डॉ. अश्विनी कुमार ने आज लोकसभा में एक प्रश्‍न के लिखित उत्‍तर में बताया कि भारत द्वारा किए गए गहन सर्वेक्षण कार्य के आधार पर संयुक्‍त राष्‍ट्र (यूएन) के तत्‍कालीन उपक्रमात्‍मक आयोग द्वारा 17 अगस्‍त, 1987 को भारत को केंद्रीय हिंद महासागर बेसिन (सीआईओबी) में प्रारंभ में 1,50,000 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र आबंटित किया गया था। बाध्‍यताओं के अनुसार भारत ने इसके 50 प्रतिशत क्षेत्र को चरणबद्ध तरीके से त्‍याग दिया तथा 75,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र अपने पास रखा। भारत सरकार के नॉडल मंत्रालय के रूप में पृथ्‍वी विज्ञान मंत्रालय (एमओईएस) संयुक्‍त राष्‍ट्र द्वारा सीआईओबी में भारत को आबंटित किए गए 75,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में अन्‍वेषण की विकासात्‍मक गतिविधियां संचालित कर रहा है। 
पृथ्‍वी विज्ञान मंत्रालय ने बहुधात्विक पिडिंकाओं से अंततोगत्‍वा धातुओं के निष्‍कर्षण के लिए सर्वेक्षण तथा अन्‍वेषण, पर्यावरणीय प्रभाव निर्धारण अध्‍ययन तथा चरणों में प्रौद्योगिकियों के विकास जैसी विभिन्‍न गतिविधियां चलाई हैं। ये सर्वेक्षण सुव्‍यवस्थित तरीके से चलाए गए हैं जो कि चुनिंदा ब्‍लॉक्‍स में 100 किलोमीटर के नमूना अंतराल से प्रारंभ किए गए तथा जिन्‍हें बाद में 50, 25, 12.5 किलोमीटर तथा तदुपरांत इसे घटाकर-6.25 किलोमीटर ग्रिड अंतराल का कर दिया गया था। अपने पास रखे गए संपूर्ण क्षेत्र का मल्‍टीबीम सर्वेक्षण भी किया गया है। विस्‍तृत विश्‍लेषण के आधार पर लगभग 7860 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र की पहचान प्रथम पीढ़ी के खनन स्‍थल के रूप में की गई है। पृथ्‍वी विज्ञान मंत्रालय 6000 मीटर की समुद्री गहराई में प्रचालन के लिए एकीकृत गहरा समुद्र खनन प्रणाली का चरणों में विकास का कार्यक्रम भी चला रहा है। 6 किलोमीटर की समुद्री गहराई में खनन करने में सक्षम प्रणाली के चरणबद्ध विकास के एक भाग के रूप में, पृथ्‍वी विज्ञान मंत्रालय के स्‍वायत्‍तशासी संस्‍थान राष्‍ट्रीय समुद्र प्रौद्योगिकी संस्‍थान (एनआईओटी) ने 500 मीटर की गहराई में कार्य करने में सक्षम एक आदि-प्ररूप उथला समुद्र तल खनन प्रणाली का डिजाइन, विकास तथा प्रदर्शन किया है। 
इस अवस्‍था में गहरे समुद्र के तल से बहुधात्विक पिडिंकाओं का दोहन अभी आर्थिक रूप से व्‍यवहार्य नहीं पाया गया है। हिंद महासागर में बहुधात्विक पिडिंकाओं से अब तक खोजी गई तथा निष्‍कर्षण की संभावना वाली रणनीतिक दृष्टि से महत्‍वपूर्ण धातुओं में तांबा, निकल, कोबाल्‍ट तथा मैंगनीज की मिश्र धातुएं हैं। 
भारत द्वारा अपने पास रखे गए क्षेत्र में, बहुधात्विक पिडिंका संसाधनों की अनुमानित मात्रा 380 मिलियन टन है, जिसमें से 4.7 मिलियन टन निकल, 4.29 मिलियन टन तांबा तथा 0.55 मिलियन टन कोवाल्‍ट तथा 92.59 मिलियन टन मैंगनीज हैं। वर्तमान मूल्‍यों पर तांबा, निकल तथा कोवाल्‍ट धातुओं का अनुमानित मूल्‍य लगभग 700,000 करोड़ रूपए है। 
भारत ने बहुधात्विक पिडिंका कार्यक्रम के अंतर्गत अपने पास रखे गए क्षेत्र में विभिन्‍न विकासात्‍मक कार्यों (सर्वेक्षण तथा अन्‍वेषण, पर्यावरणीय प्रभाव निर्धारण (ईआईए) अध्‍ययन, खनन तथा धातुशोधन में प्रौद्योगिकी विकास) को चलाने के लिए अंतर्राष्‍ट्रीय समुद्र संस्‍तर प्राधिकरण (आईएसए) के साथ मार्च, 2002 में 15 वर्ष की अवधि के लिए अनुबंध पर हस्‍ताक्षर किए हैं। 

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