इटली : इमारतों में सिमटती आम लोगों की जिंदगी

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मारियांगेला शिएना जब 11 साल पहले दक्षिणी इटली से रोम आईं, तो आंखों में बस एक सामान्य जिंदगी जीने का सपना था. सिर पर एक छत और पैरों के नीचे इतनी जमीन कि परिवार शुरू कर सकें. इटली में आर्थिक संकट के आने के बाद छह महीने पहले जब उनकी और उनके ब्वॉयफ्रेंड हेनोक की नौकरी चली गई तो अपना लक्ष्य हासिल करने के लिए उनके पास रोम की बेकार पुरानी इमारतों में शरण लेने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचा.
रोम के बाहरी हिस्से में ऐसी ही एक इमारत में छोटे से हीटर के सामने कंपकपाती सर्दी में बैठी शिएना ने बताया, “केवल बिल ही नहीं बढ़ रहा, बल्कि हर चीज महंगी होती जा रही है, हम महीने के आखिरी दिनों तक खर्च नहीं चला पा रहे.”
बेकार पड़ी इमारत में आने का फायदा यह हुआ कि उन्हें घर का किराया नहीं देना पड़ रहा. शिएना कहती हैं, “पहली रात यहां सोने के बाद जब सुबह मैं उठी तो सोचा, कितना अच्छा है, मुझे किराया नहीं देना होगा. मुझे इस बात की चिंता नहीं करनी है कि मेरी जरूरतें पूरी होगीं कि नहीं.” आर्थिक मुसीबत से लड़ने में शिएना के तरीके से यह अहसास हो जाता है कि संकट कितना बड़ा है. युवा, प्रवासी और संघर्ष कर रहे दूसरे लोग साल भर से आर्थिक संकट के जाल में हैं और अगले साल की शुरुआत में होने वाले चुनावों के लिए यह सबसे बड़ा मुद्दा है.
प्रधानमंत्री मारियो मोंटी ने टैक्स बढ़ा दी है और सार्वजनिक खर्चों को घटा दिया है जिससे कि इटली के बढ़ते कर्ज को कम किया जा सके. इस कदम ने निवेशकों को तो खुश कर दिया है लेकिन कारोबार और आम लोगों पर बहुत बुरा असर हुआ है. युवाओं की बेरोजगारी फिलहाल 35 फीसदी पर पहुंच गई है जो सामान्य बेरोजगारी के मुकाबले तीन गुना ज्यादा है. कंपनियां युवाओं को केवल साधारण करार पर सीमित सुविधाओं के साथ ही नौकरी दे रही हैं, नतीजा यह हुआ है कि युवाओं को या तो घर पर अपने मां बाप के साथ रहना पड़ रहा हा या फिर वह देश से बाहर का रुख कर रहे हैं.
मोंटी ने बीते हफ्ते कहा कि वह 2013 के बजट को मंजूरी मिलने के साथ ही इस्तीफा दे देंगे. इसके जरिए वह इटली के मुख्य बैंकिंग और कारोबारी संगठनों पर यह दबाव बनाना चाहते हैं कि वह अगली सरकार से उनके सुधारवादी एजेंडे के लिए समर्थन मांगें. उधर टैक्स बढ़ने से आम इटलीवासियों की पहले ही सिमट चुकी निजी पूंजी और ज्यादा निचुड़ गई है. ग्राहक अपनी खरीदारी घटा रहे हैं और इसकी वजह से कई स्टोर बंद होने पर मजबूर हुए हैं. इसका नतीजा यह भी हो रहा है कि शिएना और उनके मित्र जैसे लोग बेरोजगार हो गए हैं.
शिएना ने कहा कि उनसे इटली की राजनेताओं पर भरोसा एकदम से खत्म हो गया है. शिएना देश के उन आधे लोगों में शामिल है जिन्होंने एक सर्वे के दौरान कहा कि वह या तो फैसला नहीं कर पाए हैं या फिर चुनाव में हिस्सा नहीं लेंगे. शिएना ने कहा, “मैं वोट देती थी लेकिन पिछले दो साल से मैं विरोध के लिए इससे दूर रह रही हूं. हमारा पूरा राजनेता वर्ग भ्रष्ट है.”
बढ़ते अवैध निवासी
रोम के नगर परिषद का कहना है कि उसे राजधानी में ऐसी 2,850 जगहों के बारे में जानकारी है जहां अवैध निवासी रह रहे हैं लेकिन पिछले सालों के ब्योरे के साथ विस्तार से जानकारी देने से इनकार कर रही है. परिषद की प्रवक्ता ने बस इतना कहा कि अधिकारियों ने 2011 में 176 जगहों से अवैध निवासियों को निकाला. 2007 में ऐसा 157 जगहों से किया गया था.
शिएना ने कहा कि वह पहले इस तरह के जुगाड़ के घर में रहने के बारे में आशंकित थी. ऐसे घरों मे पहले अवैध अप्रवासी या इसी तरह के दूसरे लोग रहते थे. शिएना और उनके इथियोपियाई साथी हेनोक एक गलियारे में 140 परिवारों के साथ रह रहे हैं. इनमें से ज्यादातर ट्यूनीशिया और इक्वाडोर से आए लोग हैं. हर महीने अवैध निवासियों की संख्या में और लोग जुड़ते जा रहे हैं.
शोर करते पड़ोसी, पतली दीवारें, टपकती छतें और सार्वजनिक शौचालय, इन सब के बीच रहने की आदत बनाना आसान नहीं, लेकिन साथ रहने वालों के बीच कुछ अच्छी बातें भी हैं. हेनोक कहते हैं, “आपको यह चिंता नहीं करनी होती कि आप भूखे रह जाएंगे, लोग अपने पड़ोसियों का हाल पूछते हैं और जरूरत पर एक दूसरे की मदद करते हैं.” इमारत के एक हिस्से में बच्चों के खेलने की जगह है, बड़े हॉल को पार्टियों और बैठकों के लिए रखा गया है, शौचालयों की सफाई के लिए सबकी बारी तय कर दी गई है और गलियारों में क्रिसमस ट्री भी सजा है.
शिएना और हेनोक ने सफाई कर थोड़े पैसे कमाए और अपनी जगह को रसोई के सामान, अलमारी और डबल बेड से सजा लिया. उनके पास टीवी, स्काई नेटवर्क की सदस्यता और एक वीडियो गेम कॉन्सोल भी है. ये लोग चुनाव में तो हिस्सा नहीं ले रहे, लेकिन इन दोनों को उम्मीद है कि वामपंथी सरकार उन जैसे युवा लोगों की दिक्कतों को समझेगी और सहानुभूति दिखाएगी. शिएना ने कहा, “हम बस एक सरल, शांत जिंदगी चाहते हैं ताकि बच्चा पाल सकें. लेकिन मुझे डर है कि स्थिति अगर नहीं बदली तो मैं वो जिंदगी नहीं जी पाउंगी जैसा चाहती हूं.”

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