… तो क्या आईएएस को किसी का बनकर ही रहना होगा?-राजखन्ना

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आईएएस किसी के नहीं होते।उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के हवाले से कही गई ये बात एक अखबार की सुर्खी बनी है।आईएएस अधिकारियों को क्या किसी को (सत्ता का) बनकर रहना चाहिए? उन्हीं को क्यों, बाकी प्रशासनिक तंत्र या फिर पुलिस के लिए क्या सत्तादल की चकरी जरूरी है।उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से लेकर बाकी प्रदेश के हर जिले में सत्ता दल के बड़ों से लेकर छोटे तक की एक ही शिकायत है कि अधिकारी पुलिस उनकी नहीं सुनते।मुलायम सिंह यादव अधिकारियों को सुधरने की बार-बार नसीहत दे रहे हैं।मुख्यमंत्री अखिलेश यादव बता रहे हैं कि उनकी विनम्रता को कमजोरी न समझा जाये।सपा सरकार के एंग्रीमैन आजम खां सुधरने के लिए डंडे की जरूरत बता रहे हैं।कहीं-कहीं उत्तेजित विधायक कहते सुने जा रहे हैं कि उन्हें इस अधिकारियों को सुधारने की छूट दी जाये।
    माजरा क्या है? आखिर उत्तर प्रदेश में क्या हो रहा है? 2007 में मुलायम सिंह यादव की सरकार से आजिज जनता ने मायावती को मौका दिया था।उन्होंने भीनिराश किया।2012 में सपा फिर सत्ता में वापस आ गई।अखिलेश यादव को पारिवारिक गिरफ्त में उत्तर प्रदेश का राजपाट दिया।फिलहाल उनकी सरकार के कामकाज के प्रति असंतोष जाहिर करने वालों में उनके पिता मुलायम सिंह यादव भीशामिल है।कहा नहीं जा सकता कि उनकी ये चिन्ता नाकारा नौकरशाही के कारण जनता को हो रही परेशानियों के चलते हैं या फिर 2014 के लोकसभा चुनाव के नतीजों की चिन्ता इन्हें बेचैन कर रही है।मतदाता के विकल्प सीमित है।पांच साल निराश करने वाली सरकारों को बदलते समय वह जिसे चुनती है, उनको लेकर भी उसे कोई मुगालता नहीं रहता।जिनसे वह बार-बार धोखा खाती और ठगी जाती है, उन्हीं को फिर से आजमाना उसकी मजबूरी है।ऐसे माहौल में लोकसभा चुनाव को लेकर उत्तर प्रदेश के सत्ता दल में अगर बेचैनी है तो इसमें आश्चर्य की बात नहीं है।
    सत्तादल को यह कोशिश होती है कि उसकी सरकार का कामकाज ऐसा हो जिससे मतदाता उस पर रीझे और अगले चुनाव में मददगार बनें।अगर ऐसा नहीं हो पा रहा है तो उसका जिम्मेदार कौन है? मुलायम सिंह यादव, अखिलेश यादव और आजम खां जैसे नेताओं के भाषणों या फिर उनके हवालों से सार्वजनिक हो रही बातों पर गौर करें तो साफ होता है कि सरकारी योजनाओं का पूरा लाभ जनता तक न पहुंच पाने के कारण यही अधिकारी है।यह अधिकारी या तो काम नहीं करते या फिर उनके काम के प्रति ईमानदार नहीं है।बहुत हद तक यह सच भी है।लेकिन इस बड़ी समस्या का शायद यह पूर्ण सच नहीं है।
    अधिकारी पुलिस नाकारा और बेलगाम है तो आखिर उसका जिम्मेदार कौन है? उनके बिगड़ने या फिर बिगाड़ने में राजनीतिक तंत्र का क्या योगदान है? ऐसा क्यों होता है कि चुनाव नतीजों के कुछ पहले से ही संभावित सरकार के मुखिया या फिर भावी सरकार के मजबूत समझे जाने वाले लोगों के इर्द गिर्द प्रशासन पुलिस के अधिकारियों की भीड़ लगनी शुरू हो जाती है।ऐसा कैसे होता है कि नई सरकार के वजूद में आने के पहले ही पंचम तक पहुंचने वाले अधिकारियों की सूची चर्चा में आ जाती है।ऐसे अधिकारियों की क्या खूबी और क्या खामी होती है कि वे किसी मुख्यमंत्री की नाक के बाल बनकर काबिल अफसर माने जाते हैं।तो अगले मुख्यमंत्री के लिए नाकारा या फिर ‘‘विरोधी खेमे’’ का मानकर राजस्व परिषद जैसी किसी महत्वहीन पोस्टिंग के लायक मान लिये जाते हैं।अधिकारियों को अपने पराये खेमे में बांटने का यह खेल किसी मौके पर किसी पक्ष को लाभ देता है तो कभी घाटा लेकिन एक पक्ष जो हमेशा घाटे पर रहता है वह है ‘‘जनता’’ और इस घाटे का हिसाब लेने का जनता के पास एक ही मौका होता है और वह है चुनाव।जाहिर तौर चुनाव के दो ही पक्ष है-प्रत्याशी और मतदाता।लेकिन उनके बीच के विश्वास-अविश्वास के जो रिश्ते बनते बिगड़ते हैं उसमें अधिकारियों के कारगुजारी की बड़ी भूमिका होती है।
    अधिकांश अधिकारियों की प्राथमिकताएं बदल चुकी है।उनकी अपने कामकाज से अधिक कहीं और पर निगाहें हैं।उन्हें पता है कि बढ़िया पोस्टिंग कैसे पायी जाती है।इन रास्तों से गुजर कर मलाईदार पदों पर बैठे लोगों के लिए अपने काम से ज्यादा उन्हें खुश रखने की जरूरत रहती है।ऐसे में उस जनता के जरिये और हित पीछे हो जाते हैं।जिसके हित में योजनाओं के क्रियान्वयन की जिम्मेदार होती है।मौजूदा सरकार में नौकरशाही पर बरसते सत्तादल नेताओं की शिकायत है कि इस नौकरशाही को पिछली मायावती सरकार ने बिगाड़ कर रखा दिया है।बेशक मायावती सरकार के दौर में अधिकारियों के एक छोटे से समूह की खूब चली।उनके आगे मंत्री और विधायक सभी बेबस थे।लेकिन उत्तर प्रदेश में नौकरशाही की इस मनमानी और पतन लीला का इतिहास पुराना है।उसमें मुलायम सिंह यादव की पिछली सरकार की भी हिस्सेदारी बनती है।वे और उनके सहयोगी केवल बसपा सरकार को दोषी ठहराकर जनता का भला नहीं कर पायेंगे।इन स्थितियों के लिए कौन जिम्मेदार है? पूरे सरकारी तंत्र के भ्रष्टाचार और लूट से आजिज जनता इसके लिए राजनीतिक व्यवस्था को सबसे ज्यादा जिम्मेदार मानती है।इस तंत्र से ईमानदार की उम्मीद करने वाले खुद कितने ईमानदार है।  
    ट्रांसफर पोस्टिंग का धंधा एक बड़े उद्योग का रूप ले चुका है।इस पर बहस हो सकती है कि किसके राज्य में किसी कुर्सी के दाम घटे बढ़े अगर इस खेल का सत्ता दल बड़ा लाभार्थी है तो पूंजी लगाने वाले अपनी कुर्सियों पर जमने के बाद खुला खेल फर्रूखावादी खेलेंगे।इसमें किसे शक है कि नौकरशाही जनता की नहीं सुनती।सबको पता है कि सरकारी धन की बंदरबांट का खेल ऊपर से नीचे तक जारी है।पर इसे रोकने के लिए जनता ने जिन्हें बागडोर सौंपी है वे क्या कर रहे हैं? अगर सत्ता से जुड़े लोग लूट मनमानी को रोकने की जगह उसमें अपने हिस्से या फिर मौजूदा हिस्से के विस्तार के लिए जूझ रहे है तो उन्हें चुनाव में जनता के फैसले के लिए तैयार रहना होगा।मुलायम सिंह यादव को इस चुनौती का एहसास है।इसलिए वे सिर्फ अधिकारियों को ही नहीं बल्कि अपने कार्यकर्ताओं को भी बार-बार नसीहते दे रहे हैं।कोई नहीं सुनता? क्यों नहीं सुनता? शिखर पर जो हैं, क्या वे खुद कभी अपने भीतर भी झांकेंगे !

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