इंदिरा-अब्दुल्ला समझौते का क्या है रहस्य?

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श्रीनगर। नेशनल कांफ्रेंस 1975 में हुए इंदिरा-अब्दुल्ला समझौते की शर्तों को लागू नहीं करने के लिए लगभग 37 वर्षों से केंद्र सरकार की आलोचना करती रही है। अब एनसी के कुछ नेताओं के सुर अचानक बदल गए हैं। उनका कहना है कि ऐसा कोई समझौता नहीं हुआ था।
मुख्यधारा की राजनीति से अलगाव के 22 वर्षों बाद 1975 में एनसी के संस्थापक मरहूम शेख मुहम्मद अब्दुल्ला ने राज्य की सत्ता संभाली थी। इसके बाद उनके दूत मिर्जा अफजल बेग और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के दूत जी. पार्थसारथी ने एक समझौते पर हस्ताक्षर किए थे।
समझौते की शर्तों में शामिल था कि मुख्यमंत्री को वजीर-ए-आजम और राज्यपाल को सदर-ए-रियासत लिखा जाए क्योंकि वर्ष 1953 में शेख की गिरफ्तारी से पहले दोनों पदों के लिए ये ही नाम प्रचलित थे।
समझौते में यह भी कहा गया था कि 1953 के बाद जम्मू एवं कश्मीर में लागू केंद्रीय कानून की समीक्षा होगी और राज्य को प्राप्त विशेष दर्जा प्रभावित होने की स्थिति में केंद्रीय कानून हटा लिए जाएंगे। एनसी के महासचिव एवं पार्टी के संस्थापक के भतीजे शेख नजीर का कहना है कि मरहूम शेख की तरफ से 1975 में किसी समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किए गए थे।
स्थानीय समाचार पत्र ‘ग्रेटर कश्मीर’ को दिए एक साक्षात्कार में शेख नजीर ने एक सावाल का जवाब देते हुए कहा कि शेख पर आरोप लगाने से पहले लोगों को इतिहास पढ़ लेना चाहिए और तथ्यों की जांच कर लेनी चाहिए। 1975 में हुए समझौते पर शेख साहेब ने हस्ताक्षर नहीं किए थे और न ही राज्य विधानसभा में सदन पटल पर उसे रखा गया था।
कश्मीरियों की युवा पीढ़ी में कम ही लोगों को पता होगा कि 1975 के समझौते के बाद शेख कांग्रेस के समर्थन से राज्य के मुख्यमंत्री बने थे। उस समय राज्य विधानसभा में हालांकि उनकी पार्टी का एक भी विधायक नहीं था।
दिल्ली में रहने वाले एक वरिष्ठ कश्मीरी पत्रकार एम.एल. काक ने कहा कि समझौते पर दोनों तरफ के दूतों ने हस्ताक्षर किए थे और शेख समझौते का समर्थन करने के बाद सत्ता में आए थे। यह कहना कि शेख ने हस्ताक्षर या समर्थन नहीं किया था, इतिहास को नकारने का प्रयास माना जाएगा। 1953 में गिरफ्तारी के बाद 22 साल तक मुख्यधारा की राजनीति से बाहर रहने के बाद शेख ने सत्ता की बागडोर कैसे संभाली। काक कश्मीर की राजनीति पर पांच दशक से अधिक समय से बड़े पैमाने पर लिखते रहे हैं।
संसद में नेशनल कांफ्रेंस के सदस्य और मरहूम मिर्जा अफजल बेग के बेटे महबूब बेग ने इस विवाद पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि यह कहना गलत होगा कि समझौता मिर्जा अफजल बेग और जी. पार्थसारथी के बीच हुआ था। मिर्जा अफजल बेग खुद पार्थसारथी से नहीं मिल सके थे। शेख और इंदिरा गांधी इसके हिस्से थे। मुझे समझ में नहीं आता, शेख नजीर ने किस प्रसंग में ऐसा कहा, लेकिन तथ्य यही है कि जब समझौते पर हस्ताक्षर किए गए तब मिर्जा अफजल बेग ही शेख के एकमात्र प्रतिनिधि थे।

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