सहकारिता चुनाव का गणित भितरघातियों की बगावत से बिगड़ा

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भोपाल।भाजपा के सहकारिता चुनाव के मिशन को बगावत ने बिखेर दिया है। भोपाल जिला सहकारी बैंक में बागियों ने मंसूबों पर पानी फेर दिया। वहीं, 15 जिलों में भी पार्टी के अरमान पूरे नहीं हो पा रहे हैं। ऎसे में नगरीय निकाय चुनाव के पहले भाजपा का पूरा सहकारिता मिशन उलझ गया है। सहकारिता चुनाव में पूरे प्रदेश में भाजपा को कई झटके लगे हैं। छतरपुर, रीवा, टीकमगढ़, मुरैना सहित करीब 15 जिले ऎसे हैं, जहां चुनाव नहीं हो पाए। इसके पीछे भाजपा के मनपसंद प्रत्याशी को सदस्यों की सूची में स्थान नहीं मिल पाना है। इसके अलावा जहां चुनाव हुए, वहां भी पूरी तरह हालात काबू में नहीं रहे। भोपाल में पार्टी की पसंद के स्थानीय दिग्गज दावेदारों को हार का सामना करना पड़ा। दूसरी ओर विंध्य और बंुदेलखंड के सहकारी बैंकों में भी बगावत के कारण पार्टी की रणनीति पूरी तरह सफल नहीं हो सकी है। इन सभी जगह भितरघातियों ने मुश्किल पैदा की है। कई और निशाने पर भाजपा संगठन ने इस चुनाव में भितरघात करने वाले दूसरे नेताओं को लेकर भी मंथन शुरू किया है। इसके तहत कुछ और पर कार्रवाई हो सकती है। अब भोपाल बैंक अध्यक्ष के लिए दांव-पेंच भाजपा और कांग्रेस दोनों की ओर से भोपाल बैंक जिलाध्यक्ष के लिए प्रस्तावित रहने वाले दावेदार हार गए हैं। इस कारण अब पूरा गणित नए सदस्यों को लेकर जमेगा। दोनों पार्टियों की कोशिश रहेगी कि जिला बैंक अध्यक्ष उनके पक्ष का बने। इसके लिए डायरेक्टरों पर प्रभाव बढ़ाने की कोशिश है। हालांकि, भाजपा के सदस्य अधिक हैं इसलिए जिलाध्यक्ष का पद उसी के कोटे में जा सकता है। कांग्रेस संचालक मंडल में चार सदस्य होने का दावा कर रही है। अध्यक्ष का चुनाव 14 अक्टूबर को होना है। भाजपा की कोशिश रहेगी कि इस दिन कोरम पूरा नहीं हो। वहीं, कांग्रेस इस दिन कोरम पूरा करने का दावा कर रही है। ऎसी रही दिग्गजों की स्थिति भक्तपाल सिंह : ग्रामीण भाजपा जिलाध्यक्ष थे, लेकिन दावेदारों को समान वोट आने पर लॉटरी की पर्ची में हार गए। क्यों हारे : बागियों के कारण वोट कम मिले। समान वोट होने पर लॉटरी हुई, तो पर्ची में हार गए। वोट बंट गए। यह असर : भाजपा ने इन्हें ही जिलाध्यक्ष बनाना लगभग तय कर लिया था, किंतु इनकी हार से सारे समीकरण बदल गए। विजय तिवारी : जिला सहकारी बैंक के निवृतमान अध्यक्ष हंै। पार्टी से बगावत करके चुनाव लड़े थे। क्यों हारे : पार्टी ने बगावत करने पर निलंबित किया। अधिकृत प्रत्याशी नहीं होने से वोट कम मिले। यह असर : पार्टी के अधिकृत प्रत्याशी के खिलाफ काम कर जीतने नहीं दिया। अब पार्टी में इनके प्रति भारी नाराजगी। पर्वत सिंह : भाजपा के पूर्व ग्रामीण जिलाध्यक्ष हैं। संगठन महामंत्री अरविंद मेनन तक ने चुनाव नहीं लड़ने के लिए मनाया फिर भी बगावत की। क्यों हारे : पार्टी का साथ नहीं था। अधिकृत प्रत्याशी का वजन ज्यादा रहा। पर्याप्त वोट नहीं मिले। यह असर : पार्टी ने परिणाम के तुरंत बाद शाम को निलंबित कर दिया। अब राजनीतिक भविष्य पर चिंता।

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