नशे के नाख्शे कदम पर बढ़ता युवा

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 सिनेमा को समाज का दर्पण कहा जाता है।विडंबना यह कि सिनेमा एवं टीवी धारावाहिकों में मादक पदार्थो का प्रदर्शन अब आम हो चुका है।पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन आफ इंडिया ने मई 2012 में किए अनेक सर्वेक्षण में यह पाया कि बॉलीवुड की 59फिल्मों में मद्यपान के दृश्यों का असर करीब चार हजार किशोरों पर हुआ।हालॉंकि केन्द्रीय सेंसर बोर्ड ने फिल्म निर्माताओं को निर्देश दिया है कि फिल्मों में धूम्रपान एवं मद्यपान के दृश्यों के दौरान नीचे एक पट्टी चलाई जावे जिस वैधानिक चेतावनी लिखी हो लेकिन इन चेतावनियों का प्रभाव बेअसर दृष्टिगोचर हो रहा है।बहरहाल देश की नई पौध को नशे जैसे सामाजिक बुराई से बचाने के लिए सरकार के साथ-साथ समाज एवं माता-पिता को भी संवेदनशील रूख अपनाना होगा।

 देश की बागडोर इन्हीं पीढ़ियों को संभालना है।अगर समाज में इस अपसंस्कृति का प्रसार इसी तेजी के साथ होता रहे तो कहीं पाश्चात्य सभ्यता के अंधानुकरण के कारण देश की सांस्कृतिक विरासत एवं परंपराओं की मर्यादा खतरे में न पड़ जावे। गौरतलब है कि तथाकथित अभिजात्य वर्ग से लेकर मध्यम एवं निम्न आयवर्गीय तबकों के प्रायःहर सामाजिक एवं पारिवारिक उत्सवों में शराब एवं अन्य मादक पदार्थो का प्रचलन अब आम होने लगा है। सोचनीय है कि मादक पदार्थो का यह नया चलन देश को जिस तेजी से अपनी जद में से ले रहा है वह आने वाले वर्षो में कितनी तबाही लेकर आएगी समझ से परे है।आश्चर्यजनक तथ्य यह कि सर्वेक्षण के अनुसार जहॉं अस्सी के दशक में शराब एवं अन्य नशीले पदार्थो की सेवन की औसत आयु 28 वर्ष थी वह अब 15 वर्ष पर आ गई है, महानगरों एवं बड़े शहरों में तो यह 13 वर्ष तक पहुंच चुकी है।

किशोर एवं युवा पीढ़ियों में नशे की बढ़ती प्रवृत्ति के लिए सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक पहलुओं का विश्लेषण आवश्यक है।अभिभावकों की बढ़ती आय और जेबखर्च में हो रही बढोतरी के कारण उच्च एवं मध्यम आय वर्ग के किशोरों एवं युवाओं को मादक पदार्थो का चस्का बड़ी तेजी से लगा रहा है।माता-पिता के कामकाजी होने के कारण इस पीढ़ी को खुला मौका मिल रहा है।खेद का विशय है कि लड़कियों में भी यह शौक तेजी से पनप रहा है।सितारा होटलों, पबों, हॉस्टलों एवं क्लबों में होने वाले रेव पार्टियों में बिजली की ऑंख मिचौली, हाथ में छलकते पैमाने तथा नशीले हुक्के के उड़ते धुंए के बीच अर्धनग्न भौंडे डांस को मनोरंजन के पर्याय अथवा विकल्प मानने वाले तथाकथित प्रगतिशील युवक-युवतियॉं आधुनिक देश का वीभत्स रूप प्रस्तुत कर रहें है।इस अपसंस्कृति का प्रसार अब महानगरों के अलावा देश के छोटे शहरों में भी होने लगा है।ऐसा न हो कि भटकाव के इस दौर में हर युवा जाम टकराये पता नहीं प्रगतिशीलता का यह कौन सा पैमाना है।दूसरी ओर गलाकाट प्रतिस्पर्धा, ब्यस्त तनाव भरी जीवन शैली और माता-पिता का अपने बच्चों को वक्त न दे पाना भी किशोरों एवं युवाओं में बढ़ रही नशे की प्रवृत्ति के लिए जिम्मेदार हैं।

किशोरों एवं युवाओं में नशाखोरी की बढ़ती प्रवृत्ति ने सामाजिक समरसता के ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर दिया है।इस वर्ग में मादक पदार्थो की बढ़ती लत के कारण जहॉं यह पीढ़ी शारीरिक, मानसिक एवं आर्थिक त्रासदी से जूझ रहा है वहीं नशे के कारण अपराध एवं दुर्घटनाएं भी बढ़ रही है।एक सर्वेक्षण के अनुसार 70 प्रतिशत किशोर एवं युवा पीढ़ी ने अपने आपको किसी न किसी मादक पदार्थ के सेवन का आदी बना लिया है।
महानगरों से लेकर कस्बो एवं गॉंवों के किशोर एवं युवा पीढ़ी बड़ी तेजी से नशीले पदार्थो के आदी हो रहें हैं।इन मादक पदार्थो में ब्राउन शुगर,शराब,सिगरेट तंबाकूयुक्त पान मसाला, नशीली दवाओं सहित अन्य नशीले पदार्थ शामिल हैं।चिंतनीय यह कि झुग्गी-झोपड़ियों एवं सार्वजनिक स्थलों में रहने वाले बच्चे एवं किशोर बोनफिक्स एवं सुलेशन जैसे घातक रासायनिक पदार्थो का प्रयोग नशे के लिए कर रहे है।नशाखोरी की यह समस्या अब विकराल रूप लेती जा रही है।भारत देश वर्जनाओं एवं पाबंदियों के लिए माना गया है।विचारणीय है कि देश का युवा यदि नशाखोरी में मदमस्त होकर इन वर्जनाओं तथा पाबंदियों का अतिक्रमण कर रहा हो तो यह देश, समाज और परिवार सभी के लिए चिंता का विषय है।

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