महात्मा गांधी को मिलता नोबेल तो पुरस्कार का सम्मान बढ़ता : सत्यार्थी

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भोपाल। नोबेल शांति पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी ने बुधवार को कहा कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को इस पुरस्कार से नवाजे जाने की स्थिति में इस पुरस्कार का सम्मान और बढ़ जाता। नोबेल शांति पुरस्कार हासिल करने के बाद पहली बार अपने गृहराज्य मध्यप्रदेश की दो दिन की यात्रा पर आए सत्यार्थी ने शाम को यहां म ुख्यमंत्री निवास पर अपने सम्मान में आयोजित समारोह में यह बात कही। उन्होंने बताया कि नॉर्वे की राजधानी ओस्लो में जब वह यह पुरस्कार हासिल कर रहे थे तब उनके मन में महात्मा गांधी का स्मरण आ रहा था। महात्मा गांधी ने देश की आजादी के लिए सत्य और अहिंसा की बदौलत जबर्दस्त आंदोलन किया। उन्हें 1947 में देश को आजादी हासिल होने के पहले तक तो यह पुरस्कार नहीं दिया जा सकता था। लेकिन, भारत के आजाद होने के बाद 1948 में महात्मा गांधी को यह पुरस्कार दिया जा सकता था, हालांकि ऎसा नहीं हो पाया। यदि ऎसा हो जाता तो इससे गांधी का सम्मान तो नहीं बढ़ता, लेकिन पुरस्कार का सम्मान अवश्य बढ़ जाता। महात्मा गांधी और विवेकानंद के विचारों से काफी प्रभावित नजर आए सत्यार्थी ने कहा कि अब वह “मानवीय करूणा के वैश्वीकरण” का आंदोलन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर करने के काम में जुट गए हैं। इस काम में उन्होंने युवाओं से सहयोग करने का आह्वान करते हुए कहा कि “आर्थिक उदारीकरण” के कारण विश्व के बाजार एक हो सकते हैं, लेकिन “मानवीय करूणा” के माध्यम से ही पूरा विश्व एकजुट हो सकता है और इसी से भाईचारे की भावना विकसित हो सकती है। उन्होंने बताया कि प्रत्येक मानव के प्रति बगैर किसी भेदभाव के बच्चों की तरह करूणा भाव जागृत होना ही इस आंदोलन का मूल आधार है। युवाओं को अं तरराष्ट्रीय कंपनियों में सिर्फ “पैकेज” के पीछे नहीं भागना चाहिए। युवाओं को आध्यात्म की ओर भी ध्यान देना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत भले ही आर्थिक शक्ति के रूप में विश्व का नेतृृत्व नहीं कर पाए, लेकिन नैतिकता की ताकत के साथ वह विश्व का नेतृत्व करने में सक्षम है। 

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