चेर्नोबिल परमाणु दुर्घटना

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चेर्नोबिल परमाणु दुर्घटना 26 अप्रैल 1986 को युक्रेन के
चेर्नोबिल में हुई अब तक की सबसे भयानक परमाणु दुर्घटना है। यह आपदा शनिवार, २६ अप्रैल १९८६ को एक प्रणाली के परीक्षण
के दौरान चेरनोबिल परमाणु संयंत्र, के चौथे हिस्से से शुरु हुई। वहाँ अचानक विद्युत उत्पादन
में वृद्धि हो गई थी और जब उसे आपात्कालीन स्थिति के कारण बंद करने की कोशिश की गई
तो उल्टे विद्युत के उत्पादन में अत्यधिक वृद्धि हो गई। इससे एक संयंत्र टूट गया
और अनियंत्रित नाभकीय विस्फोट श्रृंखला शुरु हो गई। ये घटनाएं संयंत्र के ग्रेफाइट
में आग लगने का कारण हो सकती हैं। तेज हवा और आग के साथ रेडियोधर्मी पदार्थ तेजी
से आस-पास के क्षेत्रों में फैल गए। इसमें भारी संख्या में जान माल की क्षती हुई
और लगभग 350,400 लोग विस्थापित कर आलग स्थानों पर बसाए गए। इस दुर्घटना से
सर्वाधिक प्रभावित बेलारूस हुआ.
अब तक की सबसे जानलेवा परमाणु दुर्घटना भूतपूर्व सोवियत संघ
के यूक्रेन में हुई थी। शुक्रवार,
25 अप्रैल 1986 की रात थी।
आधी रात बीत गई थी। बिजलीघर के रिएक्ट-ब्लॉक 4 में प्रयोग के तौर पर एक अनुकरण
(सिम्युलेशन) का निर्णायक चरण शुरू हुआ। अनुकरण का उद्देश्य यह सिद्ध करना था कि
यदि किसी कारण से पूरे बिजलीघर में बिजली फेल हो जाए और रिएक्टर को तुरंत बंद कर
देना पड़े, तब भी उसे ठंडा करने के
कूलिंग पंपों और तरह-तरह के मापन उपकरणों को चालू रखने के लिए बंद रिएक्टर से भी
पर्याप्त बिजली जुटाई जा सकती है।12 घंटे पहले ही रिएक्टर को धीमा करते हुए उसकी
क्षमता को 3200 मेगावाट से उतार कर 500 मेगावाट पर लाना शुरू कर दिया गया। 25
अप्रैल की मध्यरात्रि के बाद एक बज कर 23 मिनट पर असली प्रयोग शुरू हुआ। सबसे पहले
टर्बाइन को रोकने वाले रिएक्टर में विस्फोट हुआ मध्यरात्रि को: पहले कदम के तौर पर
कोई ल्व को और उसके बाद रिएक्टर को ठंडा रखने की आपातकालीन प्रणाली को बंद कर दिया
गया। 40 सेकंड बाद आपात स्थिति में रिएक्टर में नभिकीय विखंडन की क्रिया को अपने
आप रोक देने के स्वाचालित स्विच को भी हाथ से सक्रिय कर दिया गया। लेकिन, ऐसा करते ही रिएक्टर के भीतर नाभिकीय
विखंडन की सतत क्रिया (चेन रिएक्शन) नियंत्रण से एकाएक बाहर हो गई। रात एक बज कर
24 मिनट पर ब्लॉक 4 में दो जोरदार धमाके हुए।
रक्षाकवच की धज्जियाँ उड़ गयीं : विस्फोट इतने शक्तिशाली थे
कि रिएक्टर को ढकने वाले एक हज़ार टन से भी भारी रक्षाकवच और उसके ऊपर की छत की
धज्जियाँ उड़ गयीं। रिएक्टर में लगी ईंधन की छड़ों के परखचे बिखर गये। छड़ों वाली
रेडियोधर्मी सामग्री सुलगती हुई कोई तीन किलोमीटर की ऊँचाई तक हवा में उछल गयी।
रिएक्टर अपने भीतर की भारी गर्मी से पिघलने लगा। उसे प्रमंदित करने वाले ग्रेफ़ाइट
का 250 टन भारी वह हिस्सा, जो हवा में उड़ नहीं गया था, अगले 10 दिनो तक जलता रहा।
अकल्पनीय अनहोनी : क्षण ही भर में जैसी अनहोनी हो गयी थी, चेर्नोबिल बिजलीघर के निर्माताओं और
इंजीनियरों ने उसकी कभी कल्पना ही नहीं की थी। इसीलिए, ऐसी किसी दुर्घटना से निबटने या अपनी
सुरक्षा संबंधी सही बर्ताव करने की कोई आपातकालीन योजना या निर्देशिका भी तैयार
नहीं गयी थी। फुकूशिमा की तरह चेर्नोबिल में भी हफ्तों तक अफ़रा-तफ़री मची रही।
जिन 134 लोगों ने शुरू-शुरू में वहाँ स्थिति को संभालने का जोखिम उठाया, उनमें से 28 रेडियोधर्मी विकिरण के घातक
प्रभावों के कारण अगले 60 दिनों में दम तोड़ बैठे।
दुर्घटना के समाचार को दबाए रखा : चेर्नोबिल दुर्घटना के
समय यूक्रेन सोवियत संघ (आज के रूस) का एक हिस्सा था। सोवियत सरकार ने दो दिनों तक
दुर्घटना के समाचार को दबाए रखा। समाचार एजेंसी ”तास” ने 28 अप्रैल की रात नौ बजे
पहली बार चेर्नोबिल में ”एक दुर्घटना” होने की ख़बर दी। आधे घंटे बाद सोवियत
टेलीविज़न के समाचार ” व्रेम्या” में भी यही कहा गया। कोई तस्वीर या
रिपोर्ट नहीं दिखायी गयी।
इन दो दिनों में चेर्नोबिल परमाणु रिएक्टर से निकली
रेडियोधर्मी धूल और राख स्वीडन तक पहुँच गयी थी। स्वीडन वाले हैरान थे कि उनके
यहाँ या आस-पास तो कोई दुर्घटना हुई नहीं है, तो फिर यह रेडियोधर्मी राख कहाँ से आई? उन्होंने मॉस्को की सरकार से पूछा कि उसके
यहाँ कहीं कोई परमाणु दुर्घटना तो नहीं हुई है? तब मॉस्को की समझ में आया कि दुर्घटना कितनी बड़ी है और उसे
छिपाना कितना असंभ। यही नहीं,
तब तक चेर्नोबिल भेजे गये
बचाव और सुरक्षाकर्मी साधरण कपड़ों और मामूली साज-सामान के साथ विस्फोट के
परिणामों से लड़ रहे थे। स्वीडन की पूछ-ताछ के बाद उन्हें वे पोशाकें और उपकरण
दिये गये, जो भारी रेडियोधर्मी विकिरण से बचाव के
लिए ज़रूरी होते हैं।
रेडियोधर्मी बादल दूर-दूर तक पहुँचे : दोनो भीषण विस्फोटों
और ग्रेफाइट की भारी मात्रा 10 दिनों तक जलते रहने से मुख्यतः आयोडीन-131 और
सेज़ियम-137 के आइसोटोप (समस्थानिक) महीन कणों वाले एसे एरोसोल बन गये, जो रेडियोधर्मी बादलों के रूप में पूरे
यूरोप में ही नहीं, पूरे उत्तरी
गोलार्ध में हज़ारों किलोमीटर दूर-दूर तक पहुँचे। यूरोप के कुल मिलाकर क़रीब 2 18
000 वर्ग किलोमीटर भूभाग पर रेडियोधर्मी विकिरण बढ़ कर 37 किलो बेकेरेल प्रति
वर्गमीटर हो गया। लोगों से कहा गया कि वे यथासंभव घर से बाहर न जायें, फल-फूल, सब्ज़ी व जंगली जानवरों के मांस से कुछ समय तक परहेज़ करें।
प्रीप्यात शहर को अगले 36 घंटो में ही ख़ाली करा लिया गया।
बाद में उस दायरे को बढ़ाते-बढ़ाते 30 किलोमीटर कर दिया गया, जहाँ से सभी लोगों को हटा कर दूसरी जगहों
पर ले जाया गाया। इस बीच वह वर्जित क्षेत्र 4300वर्ग किलोमीटर बड़ा हो गया है, जहाँ जाना-रहना मना है। वहाँ अब जंगल उग
आये हैं और जंगली जानवर रहते हैं।
मृतकों की संख्या जटिल पहेली: जहाँ तक मृतकों का प्रश्न है, विशेषज्ञ एकमत नहीं हैं कि किसकी मृत्यु
को चेर्नोबिल परमाणु दुर्घटना का परिणाम माना जाये और किसकी मृत्यु को नहीं।
जर्मनी में एसन विश्वविद्यालय-अस्पताल के प्रो. वोल्फ़गांग म्युलर का कहना है कि
सबसे कम विवाद गले की थाइरॉइड (अवटु) ग्रंथि वाले कैंसर के प्रसंग में हैः ”बिल्कुल साफ़ है कि बच्चों में थाइरॉइड
कैंसर के मामले शुरू के तीन-चार वर्षों में काफ़ी बढ़ गये…क्योकि चेर्नोबिल के
आस-पास के पूरे इलाके में आयोडीन की कोई गोली नहीं बाँटी गयी।” प्रो. म्युलर के अनुसार, ”इससे शिक्षा लेते हुए जापानी फुकूशिमा
बिजलीघर के निकटवर्ती प्रिफ़ेक्चरों (प्रशासनिक इकाइयों) में कम से कम यह तो हुआ
ही कि आयोडीन की गोलियाँ बाँटी गयीं और, मेरी समझ से, दो प्रिफ़ेक्चरों में इन गोलियों को लेने का आग्रह भी किया
गया।”
सबसे अधिक विवाद चेर्नोबिल से कहीं दूर रहने वालों पर पड़े
क्षीण विकिरण के दीर्घकालिक प्रभावों को लेकर है। उनके बारे में कहा जाता है कि
बिना विकिरण के भी कैंसर के विभिन्न प्रकारों से आजकल मरने वालों की जो ऊँची दर है, उसे देखते हुए 22 से 25 प्रतिशत लोग तब भी
कैंसर से मरते, जब चेर्नोबिल की परमाणु
दुर्घटना नहीं भी हुई होती।
क्षीण विकिरण से कैंसर दशकों बाद : क्षीण विकिरण के कारण
कैंसर वाले रोग क्योंकि वर्षों या दशकों बाद भी हो सकते हैं, इसलिए यह प्रमाणित कर सकना कि वे
रेडियोधर्मी विकिरण वाली किसी दुर्घटना का ही परिणाम हैं, बहुत ही कठिन है। इसीलिए, विश्व स्वास्थ्य संगठन WHO और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा अधिकरण IAEA ने 2006 में कहा कि चेर्नोबिल वाले विकिरण
के सीधे प्रभाव से 50 लोग मरे हैं। साथ ही उससे सबसे अधिक प्रभावित तीन देशों
यूक्रेन, रूस और बेलारूस में कैंसर से होने वाली
क़रीब 9000 अतिरिक्त मौतें हुयी हो सकती हैं। 5000 हज़ार मौतें सामान्य जनता के
बीच हुई हो सकती हैं और 4000 उन दो लाख साफ़-सफ़ाई, राहत और बचाव कर्मियों के बीच, जिन्हें क़रीब दो वर्षों तक वहाँ काम करना
पड़ा था। इससे कहीं अधिक मौतें भविष्य में होंगी।
सबसे अधिक थाइरॉइड कैंसर : अंतरराष्ट्रीय कैंसर अनुसंधान
अधिकरण IARC का तो यहाँ तक कहना है कि रेडियोधर्मी
प्रदूषण से सबसे अधिक प्रभावित हुए क्षेत्रों में गले में थाइरॉइड (अवटु) ग्रंथि
के कैंसर को छोड़ कर कैंसर के किसी अन्य प्रकार के ऐसे मामलों में कोई बढ़ोतरी
नहीं देखने में आयी है, जिन्हें रेडियोधर्मिता के
साथ जोड़ा जा सके। लेकिन, इस संस्था की मॉडल-गणनाओं
के अनुसार, यूरोप में 2065 तक, यानी अगले 54 वर्षों में, थाइरॉइड कैंसर के ऐसे क़रीब 16 हज़ार और
कैंसर के अन्य प्रकारों के 25 हज़ार मामले देखने में आ सकते हैं, जिन के लिए चेर्नोबिल के
परमाणु विकिरण को दोषी ठहराया जा सकता है।
कुछ ऐसा ही अनुमान फ़िनलैंड में पूर्वी फि़नलैंड
विश्वविद्यालय के विकिरण-विशेषज्ञ कीथ बावरस्टोक का भी हैः ”मैंने हिसाब लगाया है कि चेर्नोबिल की वजह
से कैंसर-पीड़ित होने के पूरे यूरोप में 30 से 60 हज़ार तक अतिरिक्त मामले होंगे।
कुछ दूसरे अनुमान इससे कम भी हैं और इतने ज़्यादा भी कि वे 10 लाख तक जाते हैं।” यहाँ यह बता देना भी अनुचित नहीं होगा कि
रेडियोधर्मी विकिरण से देर-सबेर केवल कैंसर ही नहीं होता, मनुष्यों और पशु-पक्षियों की आनुवंशिक
सामग्री (जीनों) में ऐसी विकृतियाँ भी आ सकती हैं, जो आने वाली कई पीढ़ियों को बाँझ, बीमार, नपुंसक,
विकृत या विकलांग बना सकती
हैं। 1945 में जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर गिराये गये दोनो अमेरिकी परमाणु
बमों के आनुवंशिकी प्रभाव यही दिखाते हैं।
परमाणु बिजलीघर भी बम से कम नहीं : कहने की आवश्यकता नहीं
कि किसी परमाणु बिजलीघर में विस्फोट का तात्कालिक प्रभाव परमाणु बम के विस्फोट
जितना विध्वंसकारी भले ही न लगे,
दीर्घकालिक आर्थिक और
शारीरिक प्रभाव परमाणु बम जैसा ही होता है। अकेले यूक्रेन के पड़ोसी देश बोलारूस
की एक-चौथाई ज़मीन चेर्नोबिल से आयी रेडियोधर्मी राख और धूल के कारण इतनी प्रदूषित
हो गयी है कि उसे पुरानी स्थिति में लौटने में 300 साल लगेंगे।
चेर्नोबिल परमाणु विभीषिका से हुए मानवीय नुकसानों जितना ही
कठिन है आर्थिक और सामाजिक नुकसानों का सही अनुमान लगा सकना। तत्कालीन संयुक्त
राष्ट्र महाचिव ख़ावियेर पेरेज़ दे क्वेल्यार के नाम एक पत्र में तत्कालीन सोवियत
वित्तमंत्र ने अनुमान लगाया था कि इस दुर्घटना से सोवियत संघ को 1989 तक 12 अरब 60
करोड़ डॉलर के बराबर प्रत्यक्ष नुकसान हुआ था। परोक्ष नुकसान तो अभी सदियों तक
होता रहेगा।
भोपाल गैस काण्ड
भारत के मध्य प्रदेश राज्य के भोपाल शहर मे 3 दिसम्बर सन्
1984 को एक भयानक औद्योगिक दुर्घटना हुई। इसे भोपाल गैस कांड, या भोपाल गैस त्रासदी के नाम से जाना जाता
है। भोपाल स्थित यूनियन कार्बाइड नामक कंपनी के कारखाने से एक ज़हरीली गैस का
रिसाव हुआ जिससे लगभग 15000 से अधिक लोगो की जान गई तथा बहुत सारे लोग अनेक तरह की
शारीरिक अपंगता से लेकर अंधेपन के भी शिकार हुए। भोपाल गैस काण्ड में मिथाइलआइसोसाइनाइट
(मिक) नामक जहरीली गैस का रिसाव हुआ था। जिसका उपयोग कीटनाशक बनाने के लिए किया
जाता था। मरने वालों के अनुमान पर विभिन्न स्त्रोतों की अपनी-अपनी राय होने से
इसमें भिन्नता मिलती है। फिर भी पहले अधिकारिक तौर पर मरने वालों की संख्या 2,259
थी। मध्यप्रदेश की तत्कालीन सरकार ने 3,787 की गैस से मरने वालों के रुप में
पुष्टि की थी। अन्य अनुमान बताते हैं कि ८००० लोगों की मौत तो दो सप्ताहों के अंदर
हो गई थी और लगभग अन्य 8000 लोग तो रिसी हुई गैस से फैली संबंधित बीमारियों से
मारे गये थे। २००६ में सरकार द्वारा दाखिल एक शपथ पत्र में माना गया था कि रिसाव
से करीब 558,125सीधे तौर पर प्रभावित हुए और आंशिक तौर पर प्रभावित होने की संख्या
लगभग 38,478 थी। ३९०० तो बुरी तरह प्रभावित हुए एवं पूरी तरह अपंगता के शिकार हो
गये।
भोपाल गैस त्रासदी को लगातार मानवीय समुदाय और उसके पर्यावास
को सबसे ज़्यादा प्रभावित करने वाली औद्योगिक दुर्घटनाओं में गिना जाता रहा।
इसीलिए 1993 में भोपाल की इस त्रासदी पर बनाए गये भोपाल-अंतर्राष्ट्रीय चिकित्सा
आयोग को इस त्रासदी के पर्यावरण और मानव समुदाय पर होने वाले दीर्घकालिक प्रभावों
को जानने का काम सौंपा गया था।
सन १९६९ मे यू.सी.आइ.एल.कारखाने का निर्माण हुआ जहाँ पर
मिथाइलआइसोसाइनाइट नामक पदार्थ से कीटनाशक बनाने की प्रक्रिया आरम्भ हुई। सन १९७९
मे मिथाइल आइसोसाइनाइट के उत्पादन के लिये नया कारखाना खोला गया।नवम्बर १९८४ तक
कारखाना के कई सुरक्षा उपकरण न तो ठीक हालात में थे और न ही सुरक्षा के अन्य
मानकों का पालन किया गया था। स्थानीय समाचार पत्रों के पत्रकारों की रिपोर्टों के
अनुसार कारखाने में सुरक्षा के लिए रखे गये सारे मैनुअल अंग्रेज़ी में थे जबकि
कारखाने में कार्य करने वाले ज़्यादातर कर्मचारी को अंग्रेज़ी का बिलकुल ज्ञान
नहीं था। साथ ही, पाइप की सफाई करने वाले हवा
के वेन्ट ने भी काम करना बन्द कर दिया था। सम्स्या यह थी कि टैन्क संख्या ६१० मे
नियमित रूप से ज़्यादा एमआईसी गैस भरी थी तथा गैस का तापमान भी निर्धारित ४.५
डिग्री की जगह २० डिग्री था।
२-३ दिसम्बर की रात्रि को टैन्क इ-६१० मे पानी का रिसाव हो
जाने के कारण अत्यन्त ग्रीश्म व दबाव पैदा हो गया और टैन्क का अन्तरूनी तापमान २००
डिग्री के पार पहुच गया जिसके तत पश्चात इस विषैली गैस का रिसाव वातावरण मे हो
गया। ४५-६० मिनट के अन्तराल लगभग ३० मेट्रिक टन गैस का रिसाव हो गया। ये विषैली गैसें दक्षिण पूर्वी दिशा मे भोपाल पर उड़ीं।
वातावरण में गैसों के बादल के प्रभाव की संभावनाओं की चिन्ता आज भी चर्चा का विषय
बना हुआ है। संभवत: मिक के उपरान्त गैस के बादल् मे फोस्जीन, हायड्रोजन सायनाइड, कार्बन मोनो-ऑक्साइड, हायड्रोजन क्लोराइड आदि के तथ्य पाये गये
थे। इस त्रासदी के उपरान्त भारतीय सरकार ने इस कारखाने में
लोगों के घुसने पर रोक दी, अत: आज भी इस दुर्घटना का
कोइ पुष्ट् कारण एवम तथ्य लोगो के सामने नही आ पाया है। शुरुआती दौर मे सी बी आइ
तथा सी एस आइ आर द्वारा इस दुर्घट्ना की छान-बीन करी गयी।
भोपाल की लगाभग ५ लाख २० हज़ार लोगो की जनता इस विशैलि गैस
से सीधि रूप से प्रभावित हुइ जिसमे २,००,००० लोग १५ वर्ष की आयु से
कम थे और ३,००० गर्भवती महिलाये थी, उन्हे शुरुआती दौर मे तो खासी, उल्टी, आन्खो मे उलझन और घुटन का अनुभव हुआ। २,२५९ लोगो की इस गैस की चपेट मे आ कर
आकस्मक ही म्रित्यु हो गयी। १९९१ मे सरकार द्वारा इस सन्ख्या की पुष्टि ३,९२८ पे की गयी। दस्तावेज़ो के अनुसार अगले
२ सप्ताह के भीतर ८००० लोगो कि म्रित्यु हुइ। मध्या प्रदेश सरकार द्वारा गैस रिसाव
से होने वालि म्रित्यु की सन्ख्या ३,७८७ बतलायी गयी है।
रिसाव के तुरन्त बाद चिकित्सा सन्स्थानो पर अत्यधिक दबाव
पडा। कुछ सप्ताह के भीतर ही राज्य सरकार ने गैस पीडितो के लिये कइ हस्पताल एव
चिकित्सा खाने खोले, साथ ही कइ नये निजि
सन्स्थान भी खोले गये। भयन्कर रूप से पीडित इलाको मे ७० प्रतीशत से ज़्यादा कम पढे
लिखे चिकित्सक थे, वे इस रसाय्निक् आपदा के
उपचार के लिये सम्पूर्ण रूप से तैयार न थे। १९८८ मे चालू हुए भोपाल मेमोरिअल
हस्पताल एव रिसर्च सेन्टर को ८ वर्षो के लिये ज़िन्दा पीडितो को मुफ्त उप्चार
प्रदान करा गया। १९८९ मे हुई जाँच से यह जानकारी प्राप्त हुई कि कारखानें के
समीप का पानी और मिट्टी मछ्लियो के पनपने के लिये हानिकारक है।
त्रासदी के २ दिन के पश्चात ही राज्य सरकार ने राहत का
कार्य आरम्भ कर दिया था। जुलाई १९८५ मे मध्य प्रदेश के वित्त विभाग ने राहत कार्य
के लिये लगभग एक करोड़ चालीस लाख डॉलर कि धन राशि लगाने का निर्णय लिया। अक्टूबर
२००३ के अन्त तक भोपाल गैस त्रासदी राहत एव पुनर्वास विभाग के अनुसार ५५४,८९५ घायल लोगो को व १५,३१० मृत लोगों के वारिसों को मुआवज़ा दिया
गया है। दुर्घट्ना के ४ दिन के पश्चात, ७ दिसम्बर १९८४ को यु सी सी के अध्य्क्ष
और सी ई ओ वारेन एन्डर्सन की गिरफ्तारी हुई परन्तु ६ घन्टे के बाद उन्हे २१००$ के मामूली जुर्माने पर मुक्त कर दिया गया।

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