दंगों से बढ़ती आपसी दूरियां

0
35
“ईद खाया, बकरीद खाया, औ खाया तीसों रोजा, और एक दिन का फगुआ पड़ा तौ मागे आया गोझा (गुझिया)” प्रचीन समय में हर धर्म में आपसी एकता का परिचय हमें इस अवधी कहावत से मिलता है. जब हर समुदाय में आपसी सामंजस्य हुआ करता था तब सभी समुदाय के लोग किसी भी त्यौहार को एक साथ मनाया करते थे. क्योंकी तब लोगों में इतनी व्यस्तता नहीं थी. हर समुदाय अपनी खेती -किसानी के बाद किसी भी पर्व को ख़ुशी पूर्वक मनाने के लिए एक दुसरे के साथ शरीक हुआ करते थे. हिंदू अपने मुस्लिम साथियों के साथ ईद के जश्न में पूरे उत्साह से शामिल होते और उनके घरों में पके लजीज पकवानों का साथ मिलकर लुत्फ उठाते थे. मुसलमान भी दुर्गा पूजा इत्यादि में सक्रिय रूप से भागीदारी निभाते थे और इनमें से कई तो देवी दुर्गा की प्रतिमाएं भी बनाते थे.

अंग्रेजी शासन में हिन्दू -मुस्लिम दंगे बढ़ने लगे, लोगो में दूरिया बढ़ती गई. फिर देश विभाजन के बाद हुए दंगों में  तो हिंदू व मुस्लिम अपने-अपने धर्म के प्रति कट्टर हो गए. हरेक दंगे के साथ उनके बीच की दूरियां और बढ़ती गईं. और वे धीरे-धीरे दो अलग-अलग वोट बैंकों में तब्दील हो गए. हमारे राजनेता भी इसमें अपना राजनीतिक फायदा देखते हुए उनकी धार्मिक पहचानों पर जोर देने लगे.

बाबरी मस्जिद के गिरते ही भाजपा को बल मिला और वह हिंदुत्व की नई पार्टी उभर कर सामने आई. शिवसेना कट्टर हिन्दू वादी पार्टी बन कर उभरी. इसके बाद तो इस मुद्दे पर अंतहीन बहसों का दौर आज तक चला ही आ रहा है कि ‘कौन हमें विभाजित करता है’. इससे राजनेताओं का एक नया समूह निकलकर आया.

वर्ष 2002 में जब बाबरी मस्‍जि‍द वि‍ध्‍वंस की दसवीं बरसी थी, तब लोगों ने गुजरात में गोधरा कांड का दंश झेला. इस साल यानी वर्ष 2012 बाबरी वि‍ध्‍वंस के बीस साल पूरे हो रहे हैं। देश में एक पीढ़ी जवान हो चुकी है जि‍से मंदि‍र और मस्‍जि‍द विवाद से कोई लेना – देना नहीं है. फिर भी इस पीढ़ी को मंदि‍र और मस्‍जि‍द का मतलब समझने के लि‍ए फैजाबाद का दंगा उनके सामने आया . सांप्रदायि‍कता की इस सोच को पैदा करने के लि‍ए एक बार फि‍र से मस्‍जि‍द और मंदि‍र निर्माण का सहारा लि‍या गया है.

इसी साल फैजाबाद के कैंटोमेंट थाना क्षेत्र में आने वाले गांव मिर्जापुर में कुछ लोगों ने एक मस्‍जि‍द से सटाकर गैरकानूनी निर्माण करने की कोशि‍श की. प्रशासन ने इस हरकत पर वही कि‍या, जो बाबरी मस्‍जि‍द वि‍वाद के वक्‍त कि‍या गया था. कैंटोमेंट थाना प्रभारी ने मस्‍जि‍द में ताला लगा दि‍या.

देश की बि‍गड़ती फि‍जां बचाने में लोग आगे आना भी चाहे लेकिन राजनेताओं ने ऐसा होने नहीं दि‍या आखि‍रकार बीस साल बाद फैजाबाद में दोबारा कर्फ्यू लगा दि‍या गया. इससे पहले 6 दि‍संबर 1992 में बाबरी मस्‍जि‍द वि‍ध्‍वंस के बाद कर्फ्यू लगाया गया था. आज भी 6 दि‍संबर 2012 है पीएसी की एक कंपनी 24 घंटे सरयू नदी की सुरक्षा कर रही है ताकि असामाजिक तत्वों को नदी के रास्ते आने से रोका जा सके. इस प्रक्रिया में हमारा देश भीतर ही भीतर बंटने लगा . कही महाराष्ट्र बनाम यूपी, बिहार के दंगों से लोग विभाजित हुए है. तो कुछ 1984 के सिख-विरोधी दंगों ने भी खुशदिल सिखों को उनको एक अपने ही दायरे में समेट दिया.

परिवर्तन प्रकृति का नियम है और एक बार पुनः परिवर्तन हो रहा है. अब लोगों की सोच धीरे-धीरे सकारात्मक होती जा रही है. नई पीढ़ी में आश्चर्यजनक ढंग से बदलाव देखा जा रहा है. हम हर साल ज्यादा से ज्यादा चीजों का जश्न मना रहे हैं. पूजा और इबादतों का आकार बढ़ रहा हैं. नित -प्रतिनित  लोगों के सामने  नए उत्सवों को खोज-खोज कर बाहर निकाला जा रहा है. वेलंटाइन डे पर हर कोई अपनी प्रेमिका को याद करता है, चिल्ड्रेन डे पर सभी स्कूल के बच्चे ख़ुशी मनाते है, यहाँ तक की माता, पिता, गुरु, बच्चे, सभी का अपना दिन होता है. इसी तरह हरेक समुदाय भी अपने उत्सव मनाने के नए बहाने तलाश रहा है. कोई भी त्यौहार या पूजा किसी एक क्षेत्र की खासियत नहीं है.  देश के कई शहरों में इसका भव्य आयोजन होता है. इस तरह का हरेक मौका लोगों को एक दूसरे के करीब आने का अवसर देता है. हर त्योहार अपने जश्न मनाने वाले धर्म – समुदाय को बढ़ा रहा है. दूरिया एक दिन पुनः सिमटती है.

LEAVE A REPLY