अटल जी की इन पांच बातों से “सरकार और पार्टी” बन सकेगी अधिक प्रभावी 

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वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की जीवनी लिखी है. हार्पर कॉलिंस द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक का नाम है – हार नहीं मानूंगाः एक अटल जीवन गाथा. इस पुस्तक की भूमिका केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने लिखी है. पत्रकारिता में विजय त्रिवेदी का लंबा अनुभव है और इसलिए उनकी यह पुस्तक सूचनाओं का सागर लगती है.

इस पुस्तक में वाजपेयी के जीवन और कार्यशैली से संबंधित कई ऐसी बातें हैं, जिनसे मौजूदा पीढ़ी के नेता काफी कुछ सीख सकते हैं. यहां जिक्र उन पांच बातों का किया जा रहा है, जो भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से सीख सकते हैं. अगर वे अपनी ही पार्टी यानी भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेता रहे वाजपेयी की इन बातों को अपने व्यक्तित्व का हिस्सा बनाते हैं तो इससे न सिर्फ उनका कद और बड़ा होगा बल्कि उनकी सरकार और पार्टी भी अधिक प्रभावी और स्वीकार्य बन सकती है.

सहयोगियों को भी विरोधियों के सम्मान की सीख

मोदी सरकार के कार्यकाल में कई बार ऐसा देखा गया है कि न सिर्फ सरकार के बल्कि पार्टी के सहयोगी भी विपक्षी नेताओं पर निजी हमले करते नजर आते हैं. अब तो पार्टी के बड़े नेता भी ऐसे हमले करने वालों को समझाते नजर नहीं आते. जो लोग ऐसी स्थिति में प्रधानमंत्री से दखल की उम्मीद करते हैं, उन्हें भी सामान्यतः निराशा ही हाथ लगती है.

विजय त्रिवेदी इस पुस्तक में एक घटना का जिक्र करते हैं. मोदी सरकार में केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद वाजपेयी सरकार में भी मंत्री थे. उन्हें एक बार कोयला मंत्रालय का भी जिम्मा वाजपेयी ने सौंपा था. एक बार रविशंकर प्रसाद ने बिहार जाकर लालू यादव के खिलाफ कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया. रविशंकर प्रसाद की बात वाजपेयी को ठीक नहीं लगी. प्रधानमंत्री वाजपेयी ने रविशंकर प्रसाद को चाय पर बुलाया और पूरी मुलाकात के दौरान कुछ नहीं कहा. परेशान रविशंकर जब जाने लगे तो वाजपेयी बोले, ‘रवि बाबू! अब आप भारत गणराज्य के मंत्री हैं, सिर्फ बिहार गणराज्य के नहीं, इस बात का आपको ध्यान रखना चाहिए.’

संघीय ढांचे का सम्मान

प्रधानमंत्री मोदी सहयोगात्मक संघीय ढांचे और टीम इंडिया की बातें तो करते हैं लेकिन जिन राज्यों में विपक्षी दलों की सरकार है, उन राज्यों में से कई मुख्यमंत्रियों ने यह आरोप लगाए हैं कि केंद्र सरकार संघीय ढांचे की भावना का सम्मान नहीं कर रही. पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से लेकर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल तक इस तरह के आरोप केंद्र सरकार पर अक्सर लगाते रहते हैं. अभी अरुणाचल प्रदेश में जिस तरह से पूरा कांग्रेस विधायक दल भाजपा की अगुवाई वाले गठबंधन में आया उसमें भी यही कहा जा रहा है कि केंद्र सरकार ने मुख्यमंत्री प्रेमा खांडू को कह दिया था कि अगर वे उनके पाले में नहीं आए तो केंद्र सरकार राज्य सरकार के साथ किसी तरह का सहयोग नहीं करेगी.

विजय त्रिवेदी अपनी किताब में एक घटना का जिक्र करते हैं, जिससे मोदी और उनकी सरकार संघीय ढांचे के बारे में काफी कुछ सीख सकते हैं. कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री थे. सूबे के राज्यपाल से उन्हें कुछ दिक्कत हो रही थी. उन्होंने यह बात प्रधानमंत्री वाजपेयी को बताई. प्रधानमंत्री ने राज्यपाल को हिदायत दी कि वह चुनी हुई सरकार के कामकाज में दखल न दें. क्या नरेंद्र मोदी ऐसी हिदायत दिल्ली के उपराज्यपाल नजीब जंग और उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाईक को दे सकते हैं?

त्रिवेदी एक और घटना का उल्लेख करते हैं. 2002-03 में मध्य प्रदेश में सूखा पड़ा था. दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री थे. उनकी सरकार के दस साल पूरे होने वाले थे और कुछ महीनों बाद चुनाव होने वाले थे. भाजपा हरसंभव कोशिश कर रही थी कि अगले चुनाव में उसकी सरकार बन जाए. सूखा राहत के लिए केंद्र सरकार को भारी रकम जारी करनी थी. इसी बीच मध्य प्रदेश से भाजपा के कई नेता प्रधानमंत्री वाजपेयी से मिले और उनसे आग्रह किया कि आप पैसा जारी नहीं करें, क्योंकि पैसा केंद्र देगा और इसका फायदा चुनावों में राज्य सरकार को मिलेगा.

यह सुनते ही वाजपेयी नाराज हो गए और कहा, ‘आप लोगों ने इस तरह की बात सोच कैसे ली? दिग्विजय सिंह अभी चुने हुए मुख्यमंत्री हैं और सूखा राहत का पैसा राज्य का अधिकार है तो उसे कैसे रोका जा सकता है? मैं पैसा जारी करूंगा और चुनाव कैसे लड़ना है, यह आप लोग देखिए.’ आज केंद्र में वाजपेयी की पार्टी की सरकार है और उस पर आरोप लग रहे हैं कि अरुणाचल प्रदेश में केंद्र के पैसे की धौंस दिखाकर उसने पूरी कांग्रेस पार्टी को ही दल-बदल करने पर मजबूर कर दिया.

अपने पूर्ववर्तियों का सम्मान

प्रधानमंत्री मोदी औपचारिक तौर पर तो अपने से पहले के प्रधानमंत्रियों का सम्मान करने की बात कहते हैं लेकिन उनके कार्यकाल में सरकार के स्तर पर कई ऐसे कार्य हुए हैं, जिनसे सच्चाई कुछ और ही लगती है. मोदी सरकार के मंत्रियों और भाजपा के कई नेता भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू पर अक्सर निशाना साधते दिखते हैं.

अटल बिहारी वाजपेयी 1977 में मोरारजी देसाई की सरकार में विदेशी मंत्री बनाए गए थे. उस समय की एक घटना का इस पुस्तक में उल्लेख है. वाजपेयी जब पहले दिन अपने दफ्तर गए तो दीवारों पर नजर पड़ते ही लगा कि कुछ गायब है. वाजपेयी ने अपने सचिव से कहा, ‘यहां तो पंडित जी की फोटो लगी होती थी. पहले कई बार मैं इस दफ्तर में आया हूं, तब होती थी. अब कहां गई? उसे फिर से लगाइए.’ अफसरों को लगा था कि नए विदेश मंत्री को नेहरू की तस्वीर देखकर अच्छा नहीं लगेगा, क्योंकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को नेहरू पसंद नहीं थे. वाजपेयी भी नेहरू की नीतियों की आलोचना करते थे. लेकिन फिर भी वाजपेयी को यह ठीक नहीं लगा कि नेहरू की फोटो विदेश मंत्रालय से हटा दी जाए.

जोड़-तोड़ की राजनीति से तौबा

नरेंद्र मोदी और अमित शाह की अगुवाई वाली आज की भाजपा देश भर में सियासी जोड़-तोड़ में लगी दिखती है. लोकसभा चुनावों के दौरान भी दूसरे दलों के नेताओं को अपने यहां लाने का खेल चला और जिन राज्यों में चुनाव होने होते हैं, वहां दूसरे दलों से नेताओं को तोड़ना भी भाजपा की रणनीति का एक हिस्सा होता है.

इस बारे में भी वाजपेयी की बातें नरेंद्र मोदी और अमित शाह को राह दिखा सकती हैं. जब जनता पार्टी से अलग होकर भारतीय जनता पार्टी का गठन हुआ तो पार्टी के पहले अध्यक्ष वाजपेयी बने. अपने पहले भाषण में कहा था, ‘भाजपा अध्यक्ष का पद अलंकार का विषय नहीं है. यह पद नहीं, दायित्व है, प्रतिष्ठा नहीं, परीक्षा है. हम राजनीति को मूल्यों पर आधारित करना चाहते हैं. इसे सिर्फ कुर्सी का खेल नहीं रखना चाहते.’ उन्होंने आगे कहा, ‘अब शिखर की राजनीति के दिन लद गए. जोड़-तोड़ की राजनीति का कोई भविष्य नहीं है. पैसा और प्रतिष्ठा के लिए पागल होने वालों के लिए जगह नहीं है. जिनमें आत्मसम्मान का अभाव हो, दिल्ली के दरबार में मुजरे झाड़ने वालों के लिए यहां कोई जगह नहीं है.’

खुद से ऊपर पार्टी

नरेंद्र मोदी और अमित शाह की अगुवाई वाली भाजपा पर आज सबसे बड़ा आरोप यही लगता है कि इन दोनों ने पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र की सारी संभावनाओं को खत्म कर दिया है. आम धारणा यह है कि जो ये दोनों तय करते हैं, वही पार्टी में होता है. कहने वाले तो यह भी कहते हैं कि अमित शाह का जिस तरह का संबंध नरेंद्र मोदी से है, उससे भाजपा सिर्फ एक व्यक्ति के निर्णय पर चलने वाली ही पार्टी बन गई है.

इस विषय पर भी वाजपेयी से काफी कुछ नरेंद्र मोदी सीख सकते हैं. विजय त्रिवेदी ने अपनी इस पुस्तक में कई ऐसी घटनाओं का जिक्र किया है, जिसमें वाजपेयी खुद के ऊपर पार्टी को रखते हुए नजर आते हैं. हालांकि उनके ऐसा करने को कई बार मूल्यों के साथ समझौता करने के रूप में भी देखा जा सकता है. पहली घटना है लालकृष्ण आडवाणी के राम रथयात्रा से संबंधित. वाजपेयी ने इस रथयात्रा का यह कहते हुए विरोध किया था कि राजनेताओं को धार्मिक मसलों में दखल नहीं देना चाहिए. लेकिन जब पार्टी इस यात्रा के पक्ष में दिखी तो वाजपेयी ने पार्टी के फेसले को मानते हुए आडवाणी की यात्रा को दिल्ली के कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में हरी झंडी दिखाई.

जब संसदीय दल की बैठक होती और संसद के अंदर पार्टी की रणनीति के तहत यह तय होता था कि किसी मसले पर सदन के वेल में जाना है तो वाजपेयी अक्सर इससे असहमत रहते थे. वे कहते थे कि कुएं में कूदने की क्या जरूरत है? चर्चा कीजिए, बोलना सीखिये, इसका अभ्यास कीजिए. लेकिन यदि पार्टी में सबकी राय सदन की कार्यवाही में बाधा डालने या वेल में जाने की होती तो फिर वाजपेयी मान भी जाते थे और कहते थे कि जरूरी है तो कूदिए, कुएं में कूदिए.

गुजरात दंगों के बाद मुख्यमंत्री पद से नरेंद्र मोदी के इस्तीफे के मसले पर भी ऐसा ही हुआ. वाजपेयी मोदी का इस्तीफा लेना चाहते थे लेकिन आडवाणी इसके पक्ष में नहीं थे. आडवाणी की राय के साथ पार्टी का बड़ा वर्ग खड़ा होते हुए उन्हें दिखा. वाजपेयी ने इस बार भी पार्टी की बात मान ली.

Source – satyagrah.in

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