धर्मनिरपेक्षता की राह पर भारत के पड़ोसी

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भारत का पड़ोसी देश नेपाल 20 सितंबर को अपना नया संविधान अंगीकार कर लेगा। इसके बाद नेपाल विश्‍व का एक धर्मनिरपेक्ष-लोकतांत्रिक गणराज्य बन जाएगा। नेपाल को अपने नये संविधान के लिए लम्बी जद्दोज़हद से गुजरना पड़ा है। हाल तक वहॉं के सभी हिन्दूवादी संगठन नेपाल को हन्दू-राष्ट्र बनाये रखने की जिद पड़ अड़े थे। 
अंततः संविधान के स्वरूप निर्धारण के लिए संविधान-सभा ने मतदान का सहारा लिया। हिन्दूवादी संगठनों को मुँह की खानी पड़ी। इनके पक्ष में महज दस प्रतिशत मत पड़े। इस तरह धर्म-निरपेक्ष संविधान प्रबल बहुमत के साथ स्वीकार्य बन गया। इससे पहले नेपाल में जो संविधान लागू था उसमें राजा विष्णु का अवतार था तथा वहॉं हिन्दू राजशाही थी। इस संविधान को तिलांजलि देकर नेपाल की जनता ने एक वैश्‍विक इतिहास रच लिया है।
निरस्त किया गया नेपाल का संविधान, जिसमें हिन्दू-राष्ट्र और हिन्दू राजशाही की घोषणा है, 1962 में लागू हुआ था। माओवादियों के कारण हुए राजशाही के पतन के बाद से ही नये संविधान के लिए नेपाल में राजनीतिक कश्मोकश की स्थिति वर्ष 2008 में ही बनी।्रआंदोलन भी हुए। अब भी हो रहे हैं और आगे भी होने के आसार हैं। राजशाही के खात्मे के बाद ही नेपाल के हिन्दू राष्ट्र होने की पहचान भी मिटा दी गई। तब से लेकर अब-तक नेपाल राजनीतिक उथल-पुथल और उहापोह का शिकार होता रहा। 
नरेश को सत्तात्युत किये जाने के बाद शासन की बागडोर माओवादी नेता पुष्प कमल दहल उर्फ प्रचंड ने अपने हाथों में ले ली। बंदूक छोड़ चुके माओवादियों को नेपाल की सेना में शामिल करने का जब उन्होंने प्रयास किया तो उन्हें व्यापक विरोध का सामना करना पड़ा। प्रचंड को,सत्ता छोड़नी पड़ी। वर्ष 2009 में उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दे दिया। बेशक,इसके बाद भी नेपाल को निर्वाचित सरकार ने ही चलाया किन्तु नये संवधान का प्रारूप भी तैयार होता रहा। संविधान में धर्मनिरपेक्ष शब्द के विरोध में वहॉं हन्दूवादी संगठनों ने जोर-आजमाईश शुरु कर दी थी। 
संविधान सभा में भी में भी राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी ने संविधान से धर्म-निरपेक्ष शब्द हटाने तथा नेपाल के हिन्दू-राष्ट्र वाले स्वरूप को बनये रखने की मांग रखीजिसके कारण संविधान-सभा को मतदान कराना पड़ा। इससे तुरंत पहले नेपाल के तराई क्षेत्र में भी मधेशियों का उपद्रव होता रहा। नेपाल के मैदानी भू-भाग को तराई कहा जाता है। इसी तराई क्षेत्र में नेपाल के अधिकांश संसाधन हैं। अभी नेपाल में जिस नये संविधान को अंगीकृत किया जाने वाला है उसमें नेपाल में सात राज्यों का प्रावधान किया गया है। मधेशी चाहते हैं कि तराई वाले क्षेत्र को मिला कर एक या दो राज्य का रूप दे दिया जाए अन्यथा नेपाल में प्रत्येक राज्य में पहा़ड़ियों का वर्चस्व हो जाएगा। 
काठमांडू से चलने वाली सरकार में वे अपना हक और हिस्सा चाहते हैं मगर उनकी इस मॉंग का विरोध भी हो रहा है। विरोधियों का मानना है कि ऐसा होने से नेपाल के सारे संसाधन मधेशी राज्य में रह जाएंगे। संसाधनों का केन्द्रीकरण हो जाएगा। स्वाभाविक है कि नेपाल की मधेशी पार्टियां भी संविधान का विरोध कर रही हैं क्योंकि यह संविधान नेपाल को,सात ऐसे राज्यों का संघ राष्ट्र घोषित करेगा जिसमें मधेशियों का एक भी राज्य नहीं है। अर्थ यह है कि नये संविधान को अंगीकार करने के बाद भी,नेपाल में हिन्दूवादियों और मधेशियों के नित नए विरोध और नित नए आंदोलन सामने आते रहने के आसार बन रहे हैं। अच्छी बात यह है कि वहॉं अब संविधान सम्मत सरकार आने वाली है। 
नेपाल के प्रधानमंत्री सुशील कोइराला नई सरकार आते ही उसे अपना पदभार सौंप देने के लिए राजी हैं।भारत विश्‍व का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने के नाते पड़ोस में हो रहे इस परिवर्तन का स्वगत करेगा, इसमें कोई संदेह नहीं है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पहले ही कह चुके हैं कि भारत नेपाल के बड़े भाई जैसा है। अब भी यह ब़ड़ा भाई उसके दुख-सुख में साथ देता रहेगा।

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