आत्मग्लानि का बोझ – लाल बहादुर शास्त्री

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उसे सब नन्हॉं कहकर ही पुकारते थे। वह बचपन से ही छोटे कद का कम़जोर बालक था। अभी वह पूरे दो साल का भी नहीं हुआ था, कि उसके पिता का देहांत हो गया। वह अपनी मॉं के साथ ननिहाल में रहने लगा। अभी उसकी अवस्था छः वर्ष की थी, कि एक बार अपने साथियों के साथ मिलकर वह एक बाग में फल तोड़ने पहुँचा। बहुत कोशिश करने के बाद एक फल पर हाथ पहुँचा ही था, कि माली आ पहुंचा। माली ने आव देखा न ताव, उसे पीटना शुरू कर दिया।
नन्हें ने धीमी आवा़ज में कहा, “”मेरे पिता नहीं हैं, इसीलिए मुझको इस तरह मार रहे हो।” उसकी बात सुनकर माली का उठा हाथ वहीं रुक गया और गुस्सा न जाने कहां गायब हो गया। वह शांत होकर बोला, “”पिता के न होने से तो तुम्हारी जिम्मेदारी और भी अधिक बढ़ जाती है बेटा।” यह सुनकर नन्हॉं बिलख-बिलख कर रो पड़ा। इतनी मार खाकर भी जिसकी आँखों से एक आँसू न टपका, वही नन्हॉं इस वाक्य को सुनकर फूट-फूटकर रोने लगा। वह आत्मग्लानि के बोझ से दबने लगा था। वही नन्हॉं बड़ा होकर लाल बहादुर शास्त्री के नाम से जाना गया और देश का प्रधानमंत्री बनकर इन्होंने विशेष ख्याति प्राप्त की।

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