घरनी से घर न कि घर से घरनी

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लघु – कथा 

एक नगर सेठ थे एक दिन सेठ सेठानी में बहस हो गई सेठानी ने कहा कि “आपकी नगर जो भी सम्मान है वह मेरी वजह से है आपके पास चाहे जितना धनी हो लेकिन घर की औरत प्रतिष्ठा बना भी सकती है बिगाड़ भी सकती है” | रही सही बात समाप्त हो गई |

एक दिन नगर सेठ ने अपने घर में एक समारोह रखा | समारोह चल ही रहा था कि घर के अंदर से कुछ तेज अवाज आई और सेठ की सेठानी अपने बच्चे को बुरी तरह उसे डांट रही थी | सेठ ने जोर से आवाज देकर पूछा कि क्या हुआ सेठानी क्यों डाँट रही हो ?

तो सेठानी ने अंदर से कहा कि देखिए न. . आपका बेटा खिचड़ी माँग रहा है और जबकि भर पेट खा चुका है| सेठ ने कहा कि दे दो थोड़ी सी और | सेठानी ने कहा घर में और भी तो लोग है सारी इसी को कैसे दे दूँ ?
पूरे समारोह में लोग शांत हो गए | लोग कानाफूसी करने लगे कि कैसा सेठ है ? जरा सी खिचड़ी के लिए इसके घर में झगड़ा होता है |

सेठ की पगड़ी उछल गई | सभी लोग चुपचाप उठ कर चले गए घर में अशांति हो रही है देख कर |
सेठ उठ कर अपनी सेठानी के पास आया और बोला ! कि “मैं मान गया तुमने आज मेरा मान सम्मान तो समाप्त कर दिया समारोह में आए मित्रगण कैसी-कैसी बातें कर रहे थे | अब तुम यही सम्मान वापस लाकर दिखाओ” |
सेठानी बोली ! “इसमे कौन सी बड़ी बात है आज जो मित्रगण समारोह में थे उन्हें आप फिर किसी बहाने से निमंत्रण दीजिए” |

ऐसे ही सेठ ने सबको बुलाया बैठक और मौज मस्ती के बहाने | सभी मित्रगण बैठे थे, हंसी मजाक चल रहा था कि फिर वही सेठ के बेटे की रोने की आवाज आई | सेठ ने आवाज देकर पूछा ! “सेठानी क्या हुआ क्यों रो रहा है हमारा बेटा” ? सेठानी ने कहा “फिर वही खिचड़ी खाने की हठ कर रहा है” | लोग फिर एक दूसरे का मुँह देखने लगे कि यार एक मामूली खिचड़ी के लिए इस सेठ के घर पर रोज झगड़ा होता है |

सेठ मुस्कुराते हुए बोला “अच्छा सेठानी तुम एक काम करो तुम खिचड़ी यहाँ लेकर आओ | हम स्वयं अपने हाथों से अपने बेटे को देंगे | वो मान जाएगा और सभी मित्रगणों को भी खिचड़ी खिलाओ” | सेठानी ने आवाज दी ! ”जी सेठ जी”
सेठानी बैठक में आ गई पीछे नौकर खाने का सामान सर पर रख आ रहा था | हंडिया नीचे रखी और अतिथियों को भी देना आरंभ किया अपने बेटे के साथ | सारे सेठ के मित्र हैरान – जो परोसा जा रहा था वो चावल की खिचड़ी तो कत्तई नहीं थी | उसमे खजूर-पिस्ता-काजू बादाम-किशमिश-गरी इत्यादि से मिला कर बनाया हुआ सुस्वादिष्ट व्यंजन था |

अब लोग मन ही मन सोच रहे थे कि ये खिचड़ी है ? सेठ के घर इसे खिचड़ी बोलते हैं तो मावा-मिठाई किसे बोलते होंगे ?
सेठ जी का सम्मान में चार-चाँद लग गए | लोग नगर में सेठ जी की रईसी की बातें करने लगे |

सेठ जी ने सेठानी के सामने हाथ जोड़े और कहा “मान गया मैं कि घर की औरत प्रतिष्ठा बना भी सकती है बिगाड़ भी सकती है और जिस व्यक्ति को घर में प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं उसे संसार में कहीं सम्मान नहीं मिलता” |

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