मेक इन इंडिया बनाम मेक फॉर इंडिया

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केंद्र में
भारतीय जनता पार्टी की सरकार आ जाने के बाद से देश का संपूर्ण परिदृश्य बदला हुआ
है। पूरा देश केंद्र में आज स्थायी सरकार होने का लाभ उठा रहा है। देश के आम
नागरिक को भी लगता है कि अब जरूर अच्छे दिन आ गए हैं। विदेश नीति,
आंतरिक मोर्चे तथा अन्य मुद्दों पर ताबड़तोड़ सरकार अपने
स्वेतंत्र तरीके से फैसले ले रही है। जिसे देखकर कहा जा सकता है कि भारत के गौरवशाली
दिनों की यह अच्छी शुरूआत है। वस्तुत: जो बात सीधेतौर पर समझ में आती है वह यही है
कि स्वावलंबी और आत्मगौरव से पूर्ण भारत को ही दुनिया नमन करेगी,
इसलिए सरकारी और निजि स्तर पर इस दिशा में प्रयास भी चहुंओर
से किए जा रहे हैं। इन्हीं प्रयासों में से प्रधानमंत्री की एक महत्वपूर्ण कोशि‍श
देश में मेक इन इण्डिया को बढ़ावा देने की है। किंतु यहां बड़ा सवाल यह है कि क्या
हम मेक इन इंडिया की बदौलत आगे बढ़ेंगे या मेड इन इंडिया का नारा हमें विकास और
दुनिया के बीच अपनी धाक जमाने के लिए पहले   
चाहिए ?
यह सवाल
इसीलिए भी आज महत्वपूर्ण लगता है क्यों कि देश में आर्थियक शक्तियों का केंद्र और
उन्हें समन्वित करने वाली भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन इस मसले पर
प्रमुखता से अपने विचार रखने के लिए सामने आए हैं। निश्चित तौर पर कोई भी बात जब
ज्यादा अहम हो जाती है जब किसी शीर्ष पद पर बैठा व्यक्ति उस पर खुलकर अपने विचारों
को अभि‍व्यक्ति प्रदान करता दिखाई देता है। देश को मैन्यूफैक्चरिंग का केंद्र
बनाने की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुहिम पर उन्होंने कई सवाल खड़े किए हैं।
एक दृष्टिि से सीधे-सीधे आरबीआई गवर्नर की चिंताएं वाजिब भी लगती हैं,
हालांकि राजन ने कोई नई बात नहीं कही है,
उन्होंने वही कहा है जिसको लेकर पिछले कई वर्षों से
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तथा उससे जुड़े तमाम जनसंगठन कहते आए हैं। संक्षि‍प्त रूप
से सूत्र वाक्य में कहें तो स्वदेशी पर पूरा जोर देने का प्रयास उन्होंने किया है।
रघुराम राजन
आज सरकार को बता रहे हैं कि निर्यात के बूते आवश्यक नहीं कि जो मॉडल किसी अन्य देश
के लिए श्रेष्ठ हो वह हमारे लिए भी सफलतम साबित हो जाए। वह सीधे कह रहे हैं कि चीन
के विकास का फॉर्मूला जरूरी नहीं कि भारत पर भी लागू हो। भारत को व्यापक रूप से
सभी क्षेत्रों में विकास के लिए सबसे पहले “मेक इन इंडिया” की आवश्यकता की जगह उसे तो “मेक फॉर इंडिया” का विकल्प चाहिए।
सभी को पता है
कि जब पिछली बार एनडीएनीत भाजपा सरकार केंद्र में आई थी,
तब एफडीआई को लेकर उसका कितना अधि‍क उतावलापन देखने को मिला
था। अपने कार्यकाल में देश के घाटे को कम करने के लिए जिस तरह फायदे में चल रहे
सरकारी उपक्रमों और उनके अधि‍कतम शेयरों को बेचने की जल्दबाजी उसने की,
उसकी चहुंओर आलोचना हुई थी। एनडीए सरकार ने 2002 में बीस
होटलों का विनिवेश करने के साथ कई कंपनियों के शेयरों में बाहरी संस्थाओं और
व्यक्तियों को प्रवेश की अनुमति दे दी गई थी। इस बार फिर यही करने के संकेत केंद्र
सरकार ने दिए हैं। हालांकि राजकोषीय घाटे की स्थिति को सुधारने को लेकर यह भी कहा
है कि सरकार हड़बड़ाहट में सरकारी कंपनियों में विनिवेश नहीं करेगी।
सरकारी
कंपनियों में अपनी इक्विटी बेचकर बाजार से पूरा पैसा वसूलने की नीति के तहत ही
विनिवेश करने का प्रयास होगा। केंद्र सरकार ने चालू वित्त वर्ष 2014-15 के लिए 58
हजार करोड़ रुपये का विनिवेश लक्ष्य तय करने के साथ बाकी बची हिस्सेदारी को बेचकर
15,000 करोड़ रुपये जुटाने का लक्ष्य अपने सामने रखा है। लेकिन यहां यह भी जानना
जरूरी है कि एचएमटी जैसी तमाम कभी फायदे में चलने वाली कंपनियां सरकार की नीतियों
के कारण बंद हो गईं, आखि‍र अपनी खामियों से कैसे बची रह सकती है ये सरकार ?
सरकार की
नीतियों को देखकर तो सीधेतौर पर यही नजर आता है कि वह लाभ के उपक्रमों का भी
निजिकरण कर देना चाहती है। पिछले तीस साल से केंद्र में बहुमत की कोई स्थायी सरकार
नहीं होने के कारण जो काम नहीं हो पाया, लगता है अब उसे अमलीजामा पहनाने का कार्य पूरे जोर-शोर से
करने के प्रयास किए जायें। पिछले आंकड़े बताते हैं कि सरकार राजकोषीय घाटा कम करने
की कोशिश में पूंजीगत खर्चों में कटौती करती है जो उसने पिछले दिनों की भी है,
इसके बावजूद भी राजकोषीय घाटा कुछ सीमातक ही कम हो सका।
वर्षभर में इस प्रयोग से लगभग 40 हजार करोड़ रुपये की बचत संभव है,
किंतु यह कोई स्थायी समाधान नहीं। सरकार को चाहिए कि वह
आर्थिक सुधार के लिए उन अन्य विकल्पों पर विचार करे जिनके बारे में आरबीआई गवर्नर
अभी कह रहे हैं और रा.स्व.संघ एवं उससे जुड़े संगठन कई वर्षों से कहते आ रहे हैं।
वास्तव में
राजन और संघ से जुड़े तमाम जनसंगठनों का यही मानना है कि देश के विकास के लिए
घरेलू बचत को बढ़ाने पर जोर दिया जाए, इन्हीं के जरिये देश की तमाम परियोजनाओं की फंडिंग की जानी
चाहिए। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) को आकर्षित करने के लिए सरकार का किसी भी
हद तक चले जाने को यह दोनों ही सही नहीं मानते हैं। संघ विचार के संगठन तो इसके
लिए कई दफे सार्वजनिक रूप से कह भी चुके हैं कि देश के हितों के साथ समझौता किसी
भी सूरत में नहीं होना चाहिए।
केंद्र सरकार
को आज यह भी ध्यान रखना होगा कि दुनिया एक और चीन को जगह देने के लिए तैयार नहीं
दिखती । औद्योगिक देश खुद भी पूंजी प्रधान लचीली मैन्यूफैक्चरिंग गतिविधियों को
सुधारने में जुटे हुए हैं। कहीं तो वे इस हद तक पहुंच गए हैं कि आउटसोर्स के उलट
ऐसी गतिविधियों को “रीशोर” (वापस अपने देश में लाने के प्रयास) करने लगे हैं। तैयार
वस्तुओं को निर्यात करने के इच्छुक किसी भी उभरते देश को इस नए घटनाक्रम से होड़
करनी होगी। वास्तुत: आज भारत को इसके लिए तैयार होने की जरूरत है। ऐसा भी नहीं है
कि निर्यात के प्रति औद्योगिक देशों का नजरिया निराशावादी है,
लेकिन भारत पहले ही अपने लिए कुछ विशेष क्षेत्र बना चुका है,
जहां वह बेहद सफल है। आगे भी इसमें उसे टक्कर देने वाला कोई
नहीं दिखाई देता, पर इन दिनों सस्ते कच्चे माल के साथ निर्यातकों को सब्सिडी
देने वाली निर्यात प्रधान रणनीति जो सरकार ने बना रखी है मौजूदा स्थिति में इसके
कारगर होने पर सभी को संदेह है।
रघुराम राजन
यहां सही करते हैं कि मैन्यूफैक्चरिंग जैसे किसी एक क्षेत्र को भारत के लिए चुना
जाना सही नहीं है, इसे लेकर उन्होंने भारत और चीन की तुलना की है। उनका यह
मानना कहीं से गलत नहीं है कि भारत का मामला अलग है। जरूरी नहीं कि जो चीन के लिए
ठीक साबित हुआ, वह भारत के लिए भी सही रहेगा। बजाय किसी एक क्षेत्र को सब्सिडी देने के
प्रत्येक सेक्टर में सार्वजनिक उत्पादों की पहचान की जानी चाहिए। भारत में
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का “आओ भारत में बनाओ” (मेक इन इंडिया) पहल को ऐसा नहीं है कि कोई नकार रहा है या
उसका कोई विरोध कर रहा है, पर वह एक सीमा तक देश के विकास के लिए ठीक है किंतु यह
प्रयोग देश को स्थायी विकास नहीं दे सकता, यही इसका वास्तविक और कड़वा सच है।
वस्तुत: देश
के निरंतर और स्थायी विकास का मॉडलत भारत सरकार को अधि‍क से अधि‍क आरएसएस के बताए
रास्ते पर चलकर मिलेगा। उसे मेक इन इंडिया के स्थान पर मेन इन इंडिया और ‘भारत के लिए बनाओ’ यानी “मेक फॉर इंडिया” के फार्मुले पर चलना होगा। यही बात आज आरबीआई गवर्नर ने भी
कही है। वे सही कह रहे हैं कि यदि बाहरी मांग नहीं बढ़ती है तो भारत को घरेलू
आपूर्ति के लिए उत्पादन करना चाहिए। इसका मतलब यह है कि मजबूत एकीकृत बाजार तैयार
करने की दिशा में आगे बढ़ा जाए । इसमें देश भर में खरीद और बिक्री के लिए लेनदेन
की लागत में खासी कमी आएगी। यही बात वस्तु एवं सेवा कर के संदर्भ में लागु होती
है।
कहने का आशय
इतना ही है कि देश के संपूर्ण विकास के लिए सिर्फ विनिवेश,
एफडीआई एवं मेक इन इण्डिया के नारे और इसके लिए किए जा रहे
प्रयासों से ही काम नहीं चलने वाला है। केंद्र में कल कांगेसनीत संप्रग सरकार थी,
उसके पहले एनडीए और आज भाजपा की बहुमत सरकार है,
कल किसकी सरकार होगी अभी से कुछ कहा नहीं जा सकता। सरकारे
तो आती जाती रहेंगी, किंतु यदि निर्णय की यही प्रक्रिया निरंतर जारी रही तो वह
दिन दूर नहीं जब देश के सभी सरकारी उपक्रमों का निजिकरण हो चुका हो। आज सरकार जो
इन्हें दुधारू गाय समझकर व्यवहार कर रही है कल जब यह इन्हीं सरकारी नितियों के
कारण घाटे में आ गए तब वह अन्य किन विकल्पों पर विचार करेगी ?
निश्चिततौर पर किसी ना किसी पर तो अवश्य करेगी,
तब यह विचार और प्रयास आज से क्यों नहीं प्रमुखता के साथ
आरंभ किए जा सकते हैं।
एफडीआई और
मैन्यूफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों में ज्यादातर जिस बात का अंदेशा है,वह यही है कि कंपनियां सस्ती जमीन और सरकार से अन्य
सुविधाएं तो हासिल कर लेंगी लेकिन उससे देश का जितना लाभ होना चाहिए उसके बदले कुल
मिलाकर निष्कर्ष रूप में हानि ही देश के हाथ लगेगी, पूर्व से सही अनुभव सामने आ रहे हैं। ऐसे में जो सबसे अधि‍क
जरूरी है वह यही है कि केंद्र सरकार स्वदेशी कंपनियों का अधि‍क से अधि‍क विकास और
संवर्धन कैसे हो सकता है इस पर ध्यान दे। वास्तव में यही देश विकास का सही स्थायी
कारगर मॉडल होगा, क्यों कि इसी से देश की आंतरिक जरूरते सहजता से पूरी हो
सकेंगी। भारत को अपनी आवश्यकताओं के लिए किसी अन्य देश पर निर्भर नहीं रहना होगा।
रोजगार की अपार संभावनाओं का विकास होगा तथा इससे भारतीय धन किसी ना किसी रूप में
अधि‍कतम भारत में ही रहेगा जो यहां अधोसंरचना और विनिर्माण विकास में सहयोगी होगा।

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