अपराध बढ़ रहा है और हर साल बढ़ने वाला निर्भया फंड सड़ रहा है

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इस बार के बजट में भी वित्त मंत्री ने निर्भया फंड में 1000 करोड़ रु जोड़ दिए. लेकिन इसका क्या फायदा जब इससे पहले के 1000 करोड़ रु जस के तस रखे हुए हों. वह भी तब जब महिलाओं के खिलाफ अपराध लगातार बढ़ रहे हैं.

बीती 28 फरवरी को जब मोदी सरकार ने अपना पहला आम बजट पेश किया तो इसको लेकर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आईं. वित्तमंत्री अरुण जेटली के इस बजट के कई प्रस्तावों की आलोचना हुई तो कई की सराहना भी. स्त्री सुरक्षा को लेकर वित्तमंत्री द्वारा लिया गया एक फैसला भी इसी श्रेणी में शामिल था. वित्तमंत्री ने उस ‘निर्भया फंड’ के लिए 1000 करोड़ रुपये बढ़ा दिए थे, जिसे दिसंबर 2012 में दिल्ली में घटी सामूहिक दुष्कर्म की शर्मनाक घटना के बाद तत्कालीन केंद्र सरकार ने बनाया था. इसे स्त्री सुरक्षा संबंधी गतिविधियों में खर्च किया जाना था. तत्कालीन वित्त मंत्री ने इस फंड के लिए 1000 करोड़ रुपये आवंटित किए थे. जेटली के फैसले के बाद यह राशि 2000 करोड़ रुपये हो गई है.

चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चुनावी रैलियों में ‘निर्भया फंड’ का उपयोग न करने को लेकर तत्कालीन केंद्र सरकार पर खूब निशाना साधा करते थे. लेकिन उनकी अपनी सरकार आने के नौ महीने बाद भी वह फंड जस का तस पड़ा है.

इस लिहाज से देखा जाय तो बहुत से लोगों को लग सकता है कि महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों पर अंकुश लगाने के लिए सरकार बहुत अच्छा काम कर रही है. लेकिन हकीकत का एक दूसरा पहलू भी है जो महिला सुरक्षा को लेकर सरकार के प्रयासों की एकदम उल्टी तस्वीर पेश करता है. दरअसल सरकार ने निर्भया फंड से अब तक एक भी रुपया खर्च नहीं किया है. यह स्थिति तब है जब 16 दिसंबर की उस घटना के बाद से अब तक महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही है.
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के ताजा आंकड़ों ने महिलाओं के खिलाफ होने वाले इन अपराधों की जैसी तस्वीर सामने रखी है, उसे देखने के बाद सवाल उठता है कि ‘निर्भया फंड’ का क्या फायदा जब इसकी एक पाई खर्च नहीं होनी है. इस मामले में जो हाल पिछली यूपीए सरकार का था वैसा ही अबकी भाजपानीत सरकार का भी है.
नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो के इन आंकड़ो के मुताबिक पिछले चार सालों के दौरान देश भर में दुष्कर्म के कुल एक लाख 12 हजार 981  तथा अपहरण के एक लाख 64 हजार 615  मामले सामने आए हैं. साल दर साल के हिसाब से देखा जाए तो 2014 में अकेले दिल्ली में ही दुष्कर्म की 1838 घटनाएं हुईं. इन घटनाओं का प्रतिदिन के हिसाब से औसत निकाला जाय तो मालूम पड़ता है कि रोजाना पांच महिलाओं के साथ दरिंदगी हुई. पूरे देश की बात करें तो पिछले साल अलग-अलग पुलिस थानों में बलात्कार के 30,136  मामले दर्ज किए गए.
इसमें भी सबसे चिंताजनक बात यह है कि महिलाओं के साथ होने वाले इस सबसे संगीन जुर्म का यह आंकड़ा 2012 के मुकाबले कहीं ज्यादा है. उस साल दिल्ली में 706 तथा देश भर में बलात्कार की 24 हजार 932 घटनाएं सामने आई थीं. इससे साफ हो जाता है कि दुष्कर्म की घटनाओं में किस  रफ्तार से बढोतरी हुई है. इसके अलावा पिछले सालों के दौरान अपहरण की घटनाओं ने भी महिला सुरक्षा को लेकर बेहद चिंताजनक तस्वीर सामने रखी है. अकेले दिल्ली की ही बात करें तो पिछले तीन सालों के दौरान लगभग अपहरण के करीब दस हजार मामले सामने आ चुके हैं. दिल्ली में 2014 में 3507, 2013 में 3609 तथा 2012 में 2160 अपहरण के मामले दर्ज किए गए. देश भर में यह संख्या क्रमश: 38,907, 51,881 तथा 38,262 रही.

साल दर साल के हिसाब से देखा जाए तो 2014 में अकेले दिल्ली में ही दुष्कर्म की 1838 घटनाएं हुईं. इन घटनाओं का प्रतिदिन के हिसाब से औसत निकाला जाय तो मालूम पड़ता है कि रोजाना पांच महिलाओं के साथ दरिंदगी हुई.

कुल मिलाकर यह कहना कहीं से भी गलत नहीं होगा कि 2012 की उस झकझोर देने वाली घटना के बाद भी महिलाओं के खिलाफ अपराध करने वालों के हौसले बुलंद हैं. हालांकि इस बात से भी इनकार नहीं किया जाना चाहिए कि ऐसे अपराधियों को पकड़ने के लिए पुलिस ने इन सालों में पहले के मुकाबले ज्यादा कामयाबी हासिल की है. लेकिन इन अपराधों की रोकथाम के लिए जिस तरह से जागरूकता कार्यक्रम अथवा अन्य उपाय किए जाने चाहिए थे, वे कहीं भी नजर नहीं आते. निर्भया फंड की स्थापना इन्ही तौर तरीकों को क्रियान्वित करने के लिए की गई थी. ऐसे में सरकार की मंशा पर सवाल उठना स्वाभाविक है.
निर्भया फंड का ऐलान होने के बाद तत्कालीन महिला बाल विकास मंत्री कृष्णा तीरथ की अध्यक्षता में एक समिति बनी थी. इसका काम यह सुनिश्चित करना था कि फंड के एक हजार करोड़ रुपए किस तरह खर्च किए जाएंगे. समिति ने इस काम के लिए एक टास्क फोर्स बनाने का फैसला किया. लेकिन तत्कालीन वित्तमंत्री का कहना था कि टास्क फोर्स की कोई जरूरत नहीं है. वे गृहमंत्रालय के साथ मिलकर इस फंड को नियंत्रित करना चाहते थे. लेकिन मंत्रालय भी यह काम अपने हाथ में लेने को तैयार नहीं था. इसके बाद मामला जस का तस रह गया.
पिछले साल लोक सभा चुनाव के प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चुनावी रैलियों में ‘निर्भया फंड’ का उपयोग न करने को लेकर तत्कालीन केंद्र सरकार पर खूब निशाना साधा करते थे. वे कहते थे कि इस फंड का उपयोग न करने वाली सरकार को डूब कर मर जाना चाहिए. तब उनकी यह बात लोगों को सही भी लगती थी. लेकिन अब जबकि पिछले नौ महीनों से देश की बागडोर उनके खुद के हाथ में हैं तब भी निर्भया फंड का जस का तस पड़े रहना, उनकी सरकार पर भी कई सवाल खड़े करता है.

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