आत्महत्या नहीं है संथारा

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सोमवार को देश के सर्वोच्च न्यायालय ने राजस्थान उच्च न्यायालय के उस फैसले पर रोक लगा दी जिसमें उच्च न्यायलय ने जैन धर्म की संथारा प्रथा की तुलना आत्मा हत्या से करते हुए उसे गैरकानूनी करार दिया था। उच्चतम न्यायलय की दो सदस्यीय पीठ ने राजस्थान उच्च न्यायलय के फैसले को स्थगित कर दिया और इस विषय को विस्तृत रूप से सुनने की बात कही। 
राजस्थान उच्च न्यायलय ने इस महीने की शुरुआत में संथारा को आत्महत्या का दूसरा रूप बताकर इसे एक आपराधिक प्रथा घोषित किया था। संथारा के अंतर्गत जैन समुदाय के किसी भी व्यक्ति को अपने गुरु से अनुमति हासिल करने के बाद उपवास के जरिए मोक्ष हासिल करने का मौका दिया जाता है। संथारा को अपनाने वाले व्यक्ति को अपने गुरु के समक्ष अपनी इच्छा रख कर उनकी अनुमति का इंतज़ार करना होता है। 
जैन धर्म के विशेषज्ञों का कहना है कि जैन गुरु और साधुओं द्वारा संथारा की अनुमति के पहले कई पहलुओं पर विशेष ध्यान दिया जाता है। कई सदियों से चली आ रही सामाजिक प्रथा संथारा के खिलाफ 10 अगस्त को आए फैसले के बाद देश भर में जैन समुदाय के लोगों द्वारा कई शहरों और गांवों में इस फैसले का विरोध किया गया। देश के बड़े शहरों में जैन समाज द्वारा शांतिपूर्ण प्रदर्शन किए गए थे जिनमें जैन समुदाय के लोगों के साथ अनेक विद्वान और विशेषज्ञ भी शामिल हुए। 
कई जगहों पर जैन साधुओं द्वारा क्षेत्रीय प्रशासन को संथारा प्रथा के बारे में पूरी तरह से जागरूक कर बारीक़ जानकारियां देने की कोशिश की गई। समुदाय के अनेक अग्रणी महानुभावों ने अपने अपने क्षेत्र के बड़े अधिकारियों और नेताओं से मिलकर उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ अपना ज्ञापन भी दिया था। जैन समुदाय इस प्रथा का पालन कई पीढ़ियों से करता आ रहा है और संथारा जैन समाज के लिए एक गर्व का प्रतीक है। ऐसे में उच्च न्यायालय द्वारा इस प्रथा को आत्महत्या के समान घोषित करना जैन समाज के लिए बड़ी पीड़ा की बात थी।
अब उच्चतम न्यायालय को अपनी कार्यवाही में बड़ी ही बारीक़ नज़र से प्रत्येक पहलू पर अपना ध्यान आकर्षित करना होगा। जैन समाज के करोड़ों लोगों की आस्था से जुड़े इस मामले के खिलाफ कुछ मानवाधिकार कार्यकर्तों ने अपना मोर्चा खोल दिया है और इस प्रथा को वे एक सामाजिक विफलता के रूप में देखते हैं। 
संथारा जैन समुदाय में त्याग का प्रतीक है इसलिए देश भर से यह मांग है कि इस मामले को विस्तार से सुनकर और सभी पहलुओं की जांच परख के बाद ही उच्चतम न्यायलय इस मामले में किसी भी तरह का फैसला सुनाए। राजस्थान उच्च न्यायलय द्वारा दिए गए फैसले के बाद जिस तरह जैन समुदाय ने अहिंसा के ज़रिए अपनी बात रखी वह सराहनीय है और उम्मीद है कि उच्चतम न्यायालय भी जैन समाज की आस्था को समझ कर इस मामले में कोई निर्धारित फैसला सुनाएगा।

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