ताना शाहा बने दूल्हा

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ताना शाह को अब भी समझ नहीं आ रहा था कि यह सब क्या हो रहा है? अब्दुल्लाह ने आगे बढ़कर ताना शाह को गले से लगा लिया।
ताना शाह को महल ले जाया गया और कुछ ही समय में वह शाही दामाद की तरह तैयार हो गया। शादी की तैयारियां पूरी हो चुकी थीं, सिर्फ आखरी क्षण में दूल्हा बदल गया था।
उधर सैय्यद सुल्तान दूल्हा बना महल से इस संदेशे की प्रतीक्षा कर रहा था कि कब उसे बारात लेकर महल पहुंचना है। शुभ मुहूर्त भी निकल गया, पर महल से कोई संदेशा नहीं आया। फिर उसे महल से पटाखे छूटते दिखाई दिए और उसके बाद तोपों की आवा़ज। जब उसके परिवार वालों ने उसे समझाया कि तोप की आवा़जों का मतलब नए दूल्हा-दुल्हन को सलामी देना है, तो उसे समझ आया कि महल में शादी हो चुकी है, पर किससे, वह तो यहां था!
शीघ्र ही इस बात की खबर आ गई। नाटक पर से पर्दा उठ चुका था। सैय्यद सुल्तान गुस्से से भड़कने लगा, पर अब कुछ नहीं हो सकता था, निकाह हो चुका था। उसने तत्काल अपने सलाहकारों को बुलाया और दूल्हे का लिबास बदलकर युद्घ की पोशाक पहन ली। अपने कुछ गिने-चुने विश्र्वसनीय लोगों को साथ में लेकर वह रातों-रात शहर से निकल गया, क्योंकि वह जानता था कि अब वह वहॉं सुरक्षित नहीं रहेगा।
गोलकोन्डा का बहिष्कृत दामाद दो सप्ताह बाद औरंगाबाद पहुंच गया। वहां उसने मुगल शासक औरंगजेब को जब अपनी कहानी सुनाई तो ज्यादातर खामोश और गंभीर रहने वाला औरंगजेब भी उसकी कहानी सुनकर हंसे बिना न रह सका। उसने सहानुभूति दिखाते हुए कहा, “”तुम चिन्ता मत करो। हम तुम्हारी शादी मीर-जुमला की बेटी से करेंगे। जो उस बूढ़े कमजोर कुतुब-उल-मुल्क की बेटी से शादी करने से बेहतर ही होगा।”
वह था सन् 1660, समय अपनी रफ्तार से गुजरता गया और देखते ही देखते अब्दुल्लाह का सबसे छोटा दामाद अपने सरल स्वभाव के कारण अब्दुल्लाह और सब घरवालों का चहेता बन गया। इतने साल खानकाह में सीधी-सादी और कठोर ज़िन्दगी बिताने के बाद महल की आरामदायक ज़िन्दगी का वह पूरा आनंद उठाने लगा। उसके पुराने शौक पूरे जोश के साथ फिर वापस लौटने लगे। लोगों की सादर आवभगत करना वह अच्छी तरह जानता था। दूसरी खास बात उसमें यह थी कि वह हर प्रकार के व्यक्ति के साथ आराम से घुल-मिल जाता। इसी के कारण वह दरबारियों और शहर के खास लोगों के दिलों पर भी राज करने लगा। अब्दुल्लाह का बड़ा दामाद जो कि ताना शाह के स्वभाव से बिल्कुल उल्टा था, किसी को खास पसंद भी नहीं था। वह प्रायः अकेला ही रहता और सबसे इस तरह बर्ताव करता, जैसे वह ही गोलकोन्डा का सुल्तान है। इस स्वभाव के कारण जहां लोग निजामुद्दीन से दूर ही रहना पसंद करते थे, वहीं ताना शाह का स्वभाव लोगों को अपने करीब लाने लगा। अब तो सब उसे प्यार से ताना शाह बुलाने लगे थे।
दो अलग-अलग इंसान, दोनों का स्वभाव अलग, लेकिन दोनों का लक्ष्य एक ही था। दोनों की ही ऩजरें गोलकोन्डा के सिंहासन पर टिकी थीं। निजामुद्दीन की नीयत किसी से छिपी नहीं थी। उसकी ताजपोशी तो महज एक औपचारिकता भर थी, क्योंकि सियासी मामलों में उसका नियंत्रण पूरी तरह से था। सारे दरबारी उससे डरते थे, लेकिन उसे लगता था कि वे उसकी इज्जत करते हैं। शाही महलों की जिम्मेदारी उसकी पत्नी ने संभाल रखी थी। ताना शाह ने किसी भी चीज पर कभी भी अपना हक नहीं जमाया था। हालांकि वह जानता था कि मन ही मन अब्दुल्लाह उसे निजामुद्दीन से ज्यादा पसंद करता है। अब्दुल्लाह में भी इतनी हिम्मत नहीं थी कि वह खुल कर अपनी पसंद बता सके। ताना शाह लोगों का दिल तो पहले ही जीत चुका था, इसके साथ-साथ दहेज में मिले गहनों और राशि से उसने भाड़े के सैनिक भी इकट्ठे कर लिए। हालांकि शारीरिक और अन्य मामलों में वह निजामुद्घीन से कमजोर था, लेकिन एक चीज उसके पास थी जो निजामुद्दीन के पास नहीं थी और वह थी उसकी असली शक्ति, उसका गुरु शाह राजू। उसे यकीन था कि उसकी यही एक शक्ति, उसका बेड़ा पार कर देगी।
सन् 1672, अप्रैल में अब्दुल्लाह बीमार पड़ गया। 21 अप्रैल, प्रातःकाल जब ताना शाह उसका हाल-चाल पूछने के लिए महल में जाने लगा, तो निजामुद्दीन के सिपाहियों ने उसे अंदर जाने से रोक दिया। उस बात को लेकर हुई लड़ाई में निजामुद्दीन के सैनिकों ने ताना शाह के घोड़े को घायल कर दिया। ताना शाह ने इसकी शिकायत सेनापति सैय्यद मुजफ्फर से की, जो ताना शाह से काफी सहानुभूति रखता था। शाही न्यायाधीश भी ताना की तरफ था।

सैय्यद मुजफ्फर ने सारी स्थिति का नियंत्रण अपने हाथों में लेते हुए सभी मुख्य नागरिक और सैनिक केन्द्रों पर कब्जा कर लिया। उसने निजामुद्दीन की हवेली पर धावा बोलकर दोनों पति-पत्नी को नजरबंद कर दिया।

एक ओर अब्दुल्लाह आखिरी सांसें ले रहा था, तो दूसरी ओर महल और सड़कों पर उसके उत्तराधिकार को लेकर लड़ाई छिड़ी हुई थी। इन सबसे बेखबर अब्दुल्लाह ने उसी दोपहर इस संसार से विदा ले ली। दो दिन के बाद ताना शाह को गोलकोन्डा का सुल्तान घोषित कर दिया गया। ससुर के कफन को कांधा देते समय अचानक तानाशाह को शाह राजू की वह बात याद आ गई जो उसने आश्रम में अब्दुल्लाह के जाने और ताना शाह के आते वक्त की थी, “एक राजा गया और दूसरा राजा आया’। और शाह राजू ने कहा था कि उसने ऐसा कहकर ठट्ठा नहीं किया था। वास्तव में शाह राजू ने बड़े ही हल्के ढंग से इतनी बड़ी भविष्यवाणी कर दी थी।

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