2014 का नोबेल का शांति पुरस्कार भारत के कैलाश सत्यार्थी और मलाला यूसुफजई को

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नई दिल्ली: नोबल शांति पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी ने इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की नौकरी छोड़कर पिछले तीन दशक से ज्यादा समय से बाल अधिकारों की रक्षा और उन्हें और मजबूती से लागू करवाने के लिए खुद को समर्पित कर दिया, 80 हजार बाल श्रमिकों को मुक्त कराया और उन्हें जीवन में नई उम्मीद दी।
नोबेल कमिटी ने पुरस्कार की घोषणा में सत्यार्थी की तारीफ करते हुए कहा कि उन्होंने महात्मा गांधी की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए बच्चों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया है। इस घोषणा के साथ ही सत्यार्थी का नाम उन भारतीयों में जुड़ गया है जिन्होंने अपनी उपलब्धियों से दुनिया का यह सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार प्राप्त किया है। उनके दृढ़ निश्चय एवं उत्साह के कारण ही गैर-सरकारी संगठन बचपन बचाओ आंदोलन का गठन हुआ। वह देश में बाल अधिकारों का सबसे प्रमुख समूह बना और 60 वर्षीय सत्यार्थी बच्चों के हितों को लेकर वैश्विक आवाज बनकर उभरे। वह लगातार कहते रहे कि बच्चों की तस्करी एवं श्रम गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा और जनसंख्या वृद्धि का कारण है।
दिल्ली एवं मुंबई जैसे देश के बड़े शहरों की फैक्टरियों में बच्चों के उत्पीड़न से लेकर ओड़िशा और झारखंड के दूरवर्ती इलाकों से लेकर देश के लगभग हर कोने में उनके संगठन ने बंधुआ मजदूर के रूप में नियोजित बच्चों को बचाया। उन्होंने बाल तस्करी एवं मजदूरी के खिलाफ कड़े कानून बनाने की वकालत की और अभी तक उन्हें मिश्रित सफलता मिली है। सत्यार्थी कहते रहे कि वह बाल मजदूरी को लेकर चिंतित रहे और इससे उन्हें संगठित आंदोलन खड़ा करने में मदद मिली। बाल मजदूरी कराने वाले फैक्टरियों में छापेमारी के उनके प्रारंभिक प्रयास का फैक्टरी मालिकों ने कड़ा विरोध किया और कई बार पुलिस ने भी उनका साथ नहीं दिया, लेकिन धीरे-धीरे उनके काम की महत्ता को पहचान मिली। उन्होंने बच्चों के लिए आवश्यक शिक्षा को लेकर शिक्षा के अधिकार का आंदोलन चलाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
राष्ट्रपति ने दी सत्यार्थी को बधाई, प्रधानमंत्री मिलेंगे शाम को
पुरस्कार की घोषणा के बाद एक तरफ जहां सोशल साइटों पर बधाईयों का तातां लग गया वहीं सरकार की ओर से भी संदेश सत्यार्थी को मिलने शुरू हो गए। राष्ट्रपति के साथ ही तमाम राजनीतिक दलों की ओर से बधाई संदेश दिए गए हैं। इसके साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शुक्रवार की शाम को सत्यार्थी से मुलाकात करेंगे।
सत्यार्थी को कई प्रतिष्ठित पुरस्कार मिले जिसमें डिफेंडर्स ऑफ डेमोक्रेसी अवार्ड (2009 अमेरिका), मेडल ऑफ द इटालियन सीनेट (2007 इटली), रॉबर्ट एफ केनेडी इंटरनेशनल ह्यूमन राइट्स अवार्ड (अमेरिका) और फ्रेडरिक एबर्ट इंटरनेशनल ह्यूमन राइट्स अवार्ड (जर्मनी) आदि शामिल हैं। उन्होंने ग्लोबल मार्च अगेन्स्ट चाइल्ड लेबर मुहिम चलाई जो कई देशों में सक्रिय है। उन्हें रुगमार्क के गठन का श्रेय भी जाता है जिसे गुड वेब भी कहा जाता है। यह एक तरह का सामाजिक प्रमाण पत्र है जिसे दक्षिण एशिया में बाल मजदूर मुक्त कालीनों के निर्माण के लिए दिया जाता है।
सत्यार्थी को बाल अधिकारों की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए पहले भी कई बार नोबल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया। सत्यार्थी भारत में जन्मे पहले व्यक्ति हैं जिन्हें नोबल शांति पुरस्कार से नवाजा गया है और नोबल पुरस्कार पाने वाले सातवें भारतीय हैं। सबसे पहले मदर टेरेसा को 1979 में नोबल शांति पुरस्कार दिया गया था जिनका जन्म अल्बानिया में हुआ था।

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