बांग्ला देश सीमा पर ऐतिहासिक करार

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गनीमत है कि
कांग्रेस ने बांग्ला देश सीमा करार पर राज्यसभा में अपने प्रभाव का प्रदर्शन नहीं
किया,
एक ऐतिहासिक समझौता संसद के दोनों सदनों से पारित हो गया।
इसके मद्देनजर केन्द्र सरकार के प्रयासों की सराहना करनी चाहिए। इक्तालीस वर्ष बाद
इन्दिरा-मुजीब समझौता अमल में आएगा।
वर्तमान
केन्द्र ने इसको आसान बनाने के लिए असम सहित बांग्ला देश की सीमा से लगने वाले
प्रांतों से सकारात्मक सहयोग लिया था। कई महीने से सरकार इस दिशा में प्रयास कर
रही थी। महत्वपूर्ण यह है कि इससे भारत को पांच सौ एकड़ से अधिक जमीन का लाभ होगा।
इसके अलावा यह पड़ोसी राज्य से संबंध सुधारने का सार्थक प्रयास है। भारत ने अपने
कर्तव्य का निर्वाह किया।
अब बांग्ला
देश को तय करना है कि वह भारतीय सद्भावना को कितना महत्व देता है। वहां की प्रमुख
विपक्षी पार्टी और कट्टरपंथी भारत के प्रति सद्भावना नहीं रखते। यह उन सबके लिए
जबाव है। भारत सदैव अपने पड़ोसियों के साथ शांति, सहयोग और सौहार्द का हिमायती रहा है। लेकिन ये ताली एक हाथ
से नहीं बजती। पड़ोसियों को भी नेकनीयत के साथ हाथ बढ़ाना होगा।
विदेश मंत्री
सुषमा स्वराज नें लोकसभा में ठीक कहा कि भारत पर पड़ोसी देशों के साथ बिग ब्रदर का
व्यवहार करने संबंधी आरोप गलत है। यह अंग्रेजी शब्दों का भ्रम है। हिन्दी में इस
भाव को प्रकट करने हेतु केवल एक शब्द है-बड़ा भाई! जबकि अंग्रेजी में दो शब्द
हैं-बिग ब्रदर शब्द में अहंकार है, दूसरों पर वर्चस्व स्थापित करने का भाव है। जबकि बड़े भाई का
अनुवाद इल्डर ब्रदर है। इसमें स्नेह, कर्तव्य बोध और छोटे भाई की हित चिंता का भाव होता है। भारत
अपने पड़ोसियों से क्षेत्रफल और जनसंख्या में बहुत बड़ा है। लेकिन वह बिग ब्रदर नहीं,
बड़ा भाई है। इसलिए अपने साथ ही पड़ोसियों को भी सुखी देखना
चाहता है।
चार दशक से
लंबित किसी विषय पर अमल को बड़ी उपलब्धि मानना चाहिए। यह भी संयोग है कि सरकार ने
अपने कार्यकाल का एक वर्ष पूरा होने से पहले ही यह सफलता अर्जित की है।संसद में
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सोनिया गांधी के पास जाकर सहयोग हेतु धन्यवाद दिया।
उन्होंने फोन द्वारा बांग्ला देश की प्रधानमंत्री शेख हसीना को भी जानकारी दी। संसद की सहमति
ना मिलने के कारण इन्दिरा गांधी और शेख मुजीब के बीच हुए समझौते पर अमल नहीं हो पा
रहा था। सरकार के प्रयासों से पहले राज्यसभा तथा बाद में लोकसभा ने इसे सर्व
सम्मति से पारित कर दिया।
यह सही है कि
2013 में संप्रग सरकार ने इसको पारित कराने का प्रयास किया था। उस समय भाजपा
तृणमूल कांग्रेस और असमगण परिषद ने इसका विरोध किया था। इसका कारण था कि संप्रग
सरकार इन दलों द्वारा उठाए गए मसलों का समाधान नहीं कर सकी। जबकि वर्तमान सरकार ने
पहले से ही इस दिशा में प्रयास किए। उसने विभिन्न पार्टियों व संबंधित राज्य
सरकारों से पहले ही वार्ता की, उनके द्वारा उठाए गए मुद्दों का समाधान किया। इसके बाद
विधेयक पारित कराना संभव हुआ।
पश्चिम बंगाल
की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से सुषमा स्वराज्य ने कई बार बात की और पुनर्वास हेतु
तीन हजार आठ करोड़ रूपये की केन्द्रीय सहायता देने की मांग स्वीकार की। असम के
मुख्यमंत्री तरूण गोगाई ने पहले विधेयक का समर्थन किया था। बाद में पैंतरा बदल
लिया। कहा कि वह असम की एक इंच जमीन नहीं देंगे। किसी तरह सहमत हुए। इसमें
कांग्रेस पार्टी के साथ ही पश्चिम बंगाल, असम, त्रिपुरा और मेघालय के साथ केन्द्र ने सहमति बनाने का सफल
प्रयास किया। इस समझौते से भारत को 2777.038 एकड़ तथा बांग्ला देश को 2267.82 एकड़ जमीन
मिलेगी। पश्चिम बंगाल, असम, त्रिपुरा और मेघालय के क्षेत्रों की अदला-बदली हुई है।
सरकार को
विश्वास है कि सीमा का निर्धारण होने के बाद बांग्लादेश से होने वाली अवैध घुसपैठ
पर भी रोक लगेगी। इस विधेयक के पारित होने के सबसे सकारात्मक पहलू यह है कि इसमें
सत्ता और विपक्ष ने सर्व सम्मति दिखाई। इस पर अमल से दोनों देशों के संबंधित लोगों
को राहत मिलेगी।
पूरी तैयारी
के बाद केन्द्रीय मंत्रिमण्डल ने भारत-बांग्लादेश भू-सीमा समझौते को मंजूरी दी
गयी। इसके बाद इसे संसद के दोनों सदनों से पारित कराया गया। यह मानना पड़ेगा कि विपक्षी
दल सरकार की तैयारियों से सहमत हुए। उन्होंने संबंधित राज्य सरकारों से केन्द्र के
संवाद पर भी ध्यान दिया। इसके बाद उन्होंने लचक दिखाई। यह किसी देश को जमीन देने
का नहीं वरन् जमीन की अदला-बदली का मामला था।
इस बारे में
1974 में ही सहमति बन गयी थी। उस समय भारत में इन्दिरा गांधी और बांग्लादेश में
शेख मुजीब का शासन था। बांग्ला देश इस समझौते पर यथाशीघ्र अमल चाहता था। लेकिन
भारत इस पर सर्व सम्मति नहीं बना पा रहा था। हमको अपनी संवैधानिक और प्रजातांत्रिक
प्रक्रिया का पालन करना था। इसके लिए संसद के बाहर भी प्रयास करने की आवश्यकता थी।
संबंधित राज्यों व वहां के लोगों की भावनाएं भी देखनी थी। जाहिर है इन बाहरी
प्रयासों पर पहले ऐसी गंभीरता नहीं दिखाई गयी। इसीलिए यह विधेयक अधर में रहा। जबकि
अदला-बदली में आने वाले क्षेत्र ऐसे हैं, जहां दोनों देशों की पहुंच अधिक सुगम होगी।
पहले नागरिक
सुविधाएं उपलब्ध कराने में दोनों देशों को असुविधा हो रही थी। ऐसा भी नहीं कि
अदला-बदली से ही सरकार ने अपना कर्तव्य पूरा कर लिया। वह अब पुनर्वास पर भी ध्यान
देगी। वैसे यह आबादी की अदला-बदली नहीं है। फिर भी प्रभावित लोग क्षेत्र के अनुसार
जिस देश की नागरिकता लेंगे, उन्हें उसकी सुविधा बिना कठिनाई के दी जाएगी। इससे सीमा से
संबंधित विवादों का भी समाधान हुआ है। दोनों देशों को इस समझौते के बाद गतिशील
बनाना आसान हुआ है। क्योंकि भूमि संबंधी विवाद एक बाधा की तरह था। यह बाधा दूर
हुई। इसके बाद दोनों देशों के बीच जल विवाद के समाधान की भी संभावना बनी है।
केन्द्र सरकार,
सीमा निर्धारण मामले में दिखाई है,
वैसी ही सहमति व अव्यवस्थित सीमा होने के कारण घुसपैठ की
समस्या भी बहुत बढ़ गयी थी। इसका खामियाजा भारत को उठाना पड़ रहा था। क्योंकि
बांग्ला देशी घुसपैठी इस अव्यवस्थित व अनिर्धारित सीमा का लाभ उठा रहे थे। यदि यह
समझौता पहले हो जाता तो बांग्लादेश से होने वाली घुसपैठ की समस्या इतनी व्यापक ना
होती। जहां सीमा का स्पष्ट निर्धारण नहीं था, वहीं सर्वाधिक घुसपैठ होती रही है। अब निर्धारित सीमा पर
सुरक्षा बलों की गश्त सुनिश्चित होगी। इससे ना केवल अवैध घुसपैठ वरन् अवैध व्यापार,
तस्करी आदि पर भी रोक लगेगी।

यह भी अच्छा
है कि पचास हजार से अधिक लोग दोनों देशों में से किसी एक की मुख्यधारा में शामिल
होंगे। यह उनके लिए सुखद अनुभूति होगी। पहले इनकी नागरिकता ही सुनिश्चित थी। इसलिए
नागरिक सुविधाओं से वंचित थे। यहां मूलभूत सुविधाओं का अभाव था। ये एक प्रकार से
घेराबंदी में रहने को विवश थे। यह भी अच्छा है कि जनसंख्या का हस्तांतरण बहुत कम
होगा। क्षेत्र संबंध नियंत्रण का नुकसान नहीं होगा। यहां के लोगों को संवैधानिक
अधिकार प्राप्त होंगे। क्षेत्रीय निरंतरता कायम होगी। प्रभावित लोगों को अनिवार्य
रूप से नई नागरिकता नहीं लेनी होगी। यदि कोई व्यक्ति भारतीय क्षेत्र में आकर यहां
की नागरिकता लेना चाहेगा तो उसे छूट होगी। इसका मतलब है कि संबंधित क्षेत्र के
लोगों के मानवाधिकार का पूरा ध्यान रखा गया है। जाहिर है यह महत्वपूर्ण ऐतिहासिक
समझौता है। यह उपलब्धि मोदी सरकार के खाते में दर्ज हुई।

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