विश्‍व हिन्दी सम्मेलन और हिन्दी दिवस

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अभी देश में विश्‍व हिन्दी सम्मेलन की आलोचना का दौर चल रहा है। अब-तक जिन लेखकों को इसमें तरजीह दी जाती थी उन्हें पूछा-तक नहीं गया। सो, लानत मलानत हो रही है। भला क्यों? क्या हिन्दी केवल साहित्य रचने वालों की समिधा बन कर रहे या अपनी वैश्‍विक छवि बनाने की दिशा में अग्रसर हो, अधिक से अधिक लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा बने? जब पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरागॉंधी ने विश्‍व हिन्दी सम्मेलन की परिकल्पना की थी तब भी इस आयोजन का उद्देश्य यही था। हॉं, इसबार प्रयास का स्वभाव कुछ बदला हुआ अवश्य था।
 इस आयोजन मेें भाषा के रूप में हिन्दी के प्रसार पर ध्यान केन्द्रित था। साहित्य, भाषा का एक हिस्सा भर ही तो है। अभी जरूरत है कि हिन्दी विज्ञान की भी भाषा बने। इसमें अभियंंत्रिक पुस्तकें भी शामिल हों, इसमें चिकित्सा की स्तरीय पुस्तकें उपलब्ध हों। हिन्दी समर्थ भाषा बने, महज साहित्य की भाषा नहीं। इसी नजरिये से भोपाल में हाल ही यह विश्‍व हिन्दी सम्मेलन संंचालित हुआ और इसी उद्वेश्य से पहली बार इंदिरा गांधी की पहल पर 10 जनवरी 1975 को नागपुर में पहला विश्‍व-हिन्दी सम्मेलन आयोजित हुआ था। उद्देश्य यही था कि हिन्दी जन-जन तक पहुँचे, अन्तर्राष्ट्रीय भाषा बने। तब से ही भारत सरकार के सभी विदेशी कार्यालयों में 10 जनवरी को विश्‍व हिन्दी दिवस मनाने की परम्परा शुरु हुई। दरअसल आलोचक इन तथ्यों को नजर अंदाज कर रहे हैं। वर्ष-2006 में मनमोहन सिंह की सरकार ने 10 जनवरी को विश्‍व हिन्दी दिवस मनाने का आधिकारिक ऐलान किया था।
भोपाल में आयोजित विश्‍व-हिन्दी सम्मेलन की यह कह कर आलोचना हो रही है कि इसका उद्घाटन राजनेता (प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी) और समापन अभिनेता (अमिताभ बच्चन) से कराया गया जिनका हिन्दी के लिए कोई योगदान नहीं रहा है। आलोचकों को यह ध्यान में रखना चाहिए कि मोदी ने अपनी धाराप्रवाह हिन्दी के कारण वैश्‍विक धूम मचाने में कामयाबी हासिल की है तथा सदी के महानायक कहे जाने वाले अमिताभ बच्चन के संवादों को गैर हिन्दीभाषी भी बहुत शौक से बोलते हैं। 
अभी इस तरह के प्रयासों की बड़ी जरुरत है कि हिन्दी को वैश्‍विक स्वीकार्यता हासिल हो सके। साहित्यकारों के लिए 14 सितम्बर को मनाया जाने वाला हिन्दी-दिवस तो है ही। करते रहें साहित्यिक आयोजन। कौन रोकता है उन्हें? 14 सितम्बर ही तो हिन्दी का जन्म दिवस है। 14 सितम्बर 1949 को संविधान सभा ने मान लिया था कि देवनागरी में लिखी जाने वाली हिन्दी राज भाषा होगी। यही कारण है कि इस दिन हिन्दी दिवस मनाया जाता है।
आलोचकों को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि नागपुर में भूतपूर्व प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी की पहल पर 10 जनवरी 1975 को पहली बार विश्‍व हिन्दी सम्मेलन आयोजित हुआ था। उसके बाद मौरिशस में दो बार, नई दिल्ली, त्रिनिडाड, टोबेगो, लंदन, सूरीनाम और न्यूयॉर्क में भी विश्‍व हिन्दी सम्मेलनों के आयोजन हुए। इन आयोजनों में साहित्यकारों का ही वर्चस्व था किन्तु उन आयोजनों से हासिल क्या हुआ? जरुरी यह है कि लानत-मलानत से उबर कर हिन्दी प्रेमी अपनी भाषा के परिमार्जन और उत्थान की ओर ध्यान दें।

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