क्यों ऐपल के लिए यह सबसे जोखिम भरा समय है
 
सिर्फ एक साल पहले की बात है जब ऐपल के एक शेयर की कीमत अधिकतम 132 डॉलर तक पहुंच गई थी. लेकिन आज यह 94 डॉलर के आसपास है. यह गिरावट इस लिहाज से ज्यादा चौंकाने वाली है कि हाल ही में दुनिया के दिग्गज निवेशक वारेन बफेट की कंपनी बर्कशर हैथवे ने ऐपल के तकरीबन 98 लाख शेयर खरीदे थे फिर भी शेयरों की कीमत पर कोई असर नहीं पड़ा. पिछले साल से तुलना करें तो कंपनी की कुल पूंजी में 25 करोड़ डॉलर की कमी आ चुकी है.
हालांकि अभी भी ऐपल का मार्केट कैपिटलाइलेजशन (शेयरों के आधार पर कुल कीमत) 500 अरब डॉलर के आसपास है. इस आंकड़े को ध्यान में रखें तो 25 करोड़ का घाटा न कुछ के बराबर है लेकिन, इससे कंपनी के लिए कुछ नकारात्मक संकेत जरूर निकलते हैं. इस साल की शुरुआत में ऐपल ने यह जानकारी सार्वजनिक की थी कि पहली बार उसके स्मार्टफोन की बिक्री में गिरावट आई है. इसकी कई वजहें थीं; सैमसंग द्वारा स्मार्टफोन बाजार के और बड़े हिस्से पर कब्जा किया जाना (स्मार्टफोन की बिक्री के मामले में सैमसंग 2010 में ही ऐपल को पछाड़ चुका है) और इसके साथ-साथ बीते सालों के दौरान भारत और चीन जैसे बड़े बाजारों में सस्ते स्मार्टफोन बनाने वाली दर्जनों कंपनियों का अस्तित्व में आना.

अब ऐपल के सामने चुनौती है कि अगले स्तर पर वह किस तरह बाजार के नियम बदलकर अगुवा बनी रह सकती है या दूसरा बाजार ढूंढ़ सकती है

यदि हम अतीत पर नजर डालें तो इससे ऐपल के भविष्य से जुड़ी कुछ आशंकाएं सामने आती हैं. इस शताब्दी के पहले दशक में फिनलैंड की कंपनी नोकिया का विश्व के मोबाइल फोन बाजार पर एकतरफा कब्जा था. एक समय उसका मार्केट कैपिटलाइलेजशन 269 अरब डॉलर तक पहुंच चुका था. फिर उसके शेयरों में गिरावट का दौर शुरू हुआ. आज यह कंपनी अपनी अधिकतम कीमत के दसवें हिस्से की कीमत रखती है. इसबीच 2011 में वह मोबाइल बाजार से भी बाहर हो चुकी है.
उस समय नोकिया की तबाही में ऐपल की भी अहम भूमिका थी. स्टीव जॉब्स के नेतृत्व में कंपनी ने पर्सनल कंप्यूटर के क्षेत्र से निकलकर मोबाइल बाजार में आने का फैसला किया था. ऐपल के लिए यह सिर्फ मोबाइल फोन का बेचने मामला नहीं था. उसने स्मार्टफोन आधारित संगीत, ऐप्स और दूसरे कंटेंट की कारोबारी संभावनाएं भी समझ ली थीं. फिर ऐपल ने मोबाइल बाजार के पूरे नियम ही बदल दिए. उसने उपभोक्ताओं के लिए स्मार्टफोन को एक ऐसा जादुई यंत्र बना दिया जो सिर्फ बात करने के लिए नहीं था. वहीं दूसरी तरफ कंपनी के प्रतिस्पर्धियों को यह बात काफी बाद में समझ आई.
अब ऐपल के सामने चुनौती है कि अगले स्तर पर वह किस तरह बाजार के नियम बदलकर अगुवा बनी रह सकती है या दूसरा बाजार ढूंढ़ सकती है. इस समय कंपनी के पास तकरीबन 200 अरब डॉलर की भारी-भरकम नकदी है. इसका बड़ा हिस्सा उसके पास आईफोन की बिक्री से आया है. बीते सालों में उसने आईफोन पर काफी ज्यादा मार्जिन (प्रति डॉलर मुनाफा) रखा था और अपनी ब्रांड की ताकत के चलते वह स्मार्टफोन को बेच भी पा रही थी. अब ऐसी स्थिति नहीं है.
आज ऐपल के प्रतियोगी उससे और अपने आप बहुत कुछ सीख चुके हैं तो वहीं इनकी तुलना में कहा जा सकता है कि ऐपल संघर्षरत है. मोबाइल फोन बाजार में गिरावट के चलते अब वह अपने उत्पादों पर पहले की तरह मार्जिन नहीं ले सकती. ऐपल के लिए चिंता की बात यह है कि उसके प्रतिस्पर्धी अब कीमतों को और नीचे लाएंगे जिससे कंपनी को और नुकसान उठाना पड़ सकता है.

ऐपल के लिए चिंता की बात ये है कि उसके प्रतिस्पर्धी अब कीमतों को और नीचे लाएंगे जिससे कंपनी को और नुकसान उठाना पड़ सकता है

मोबाइल के बाद ऐपल के लिए कौन सा क्षेत्र अगली दुधारू गाय साबित हो सकता है?
हाल के हफ्तों में कई बार यह कयासबाजी सुर्खियों में आई है कि ऐपल के लिए भविष्य की क्या योजनाएं हो सकती हैं. वहीं बीते सालों में विशेषज्ञ कई बार इस नतीजे पर पहुंच चुके हैं कि मोबाइल उद्योग अपने अधिकतम विस्तार के आसपास पहुंच चुका है और पहले की तरह यहां मुनाफा नहीं कमाया जा सकता. इस संभावना को ध्यान में रखते हुए ऐपल ने अनुसंधान और विकास से जुड़े खर्च में भारी बढ़ोत्तरी की है. 2012 में जहां वह इसके लिए तीन अरब डॉलर खर्च कर रही थी तो अब 2016 में उसकी 10 अरब डॉलर खर्च करने की योजना है. इसी के तहत भारत की यात्रा पर आए कंपनी के सीईओ टिम कुक ने हैदराबाद में मैप्स डेवलपमेंट सेंटरका उद्घाटन किया है. यहां आईफोन, आईपैड, मैक और ऐपल वॉच समेत कंपनी के तमाम उपकरणों के लिए मानचित्र (ऐपल मैप्स) के अनुसंधान और विकास का काम किया जाएगा.
ऐपल के बारे में चल रही कयासबाजियों में यह भी कहा जा रहा है कि कंपनी इस समय एक ऐसी योजना पर चल रही है जिसका लक्ष्य उसे आज की तुलना में पूरी तरह बदल देना है. एक बार फिर हालिया अतीत पर नजर डालें तो साफ होता है कि कंपनी ने इसी रणनीति पर चलते हुए आज का मुकाम हासिल किया है. 2007 में वह पर्सनल कंप्यूटर के बाजार से मोबाइल फोन बाजार और म्यूजिक के क्षेत्र में आई थी और फिर उसने खुद को पूरी तरह बदल लिया.
लेकिन क्या वह इसबार भी ऐसा करके सफल हो पाएगी? कहा जा रहा है कि ऐपल आनेवाले समय में अगली पीढ़ी की इलेक्ट्रिक कार निर्माण के क्षेत्र में एक बड़ा खिलाड़ी बनना चाहती है. लेकिन यहां पहले ही उसकी टक्कर का एक और खिलाड़ी टेस्ला, मौजूद है. टेस्ला के संस्थापक एलन मस्क के बारे में कहा जाता है वे भी स्टीव जॉब्स की तरह काबिल हैं. दिलचस्प बात है कि दोनों की जिंदगी का एक हिस्सा एक दूसरे से काफी मिलता-जुलता भी है. अपने-अपने करियर में एक समय दोनों लगभग सबकुछ खो चुके थे. स्टीव जॉब्स के लिए यह स्थिति 1986 में तब बनीं जब वे ऐपल से बाहर निकाल दिए गए तो वहीं 20 साल बाद आर्थिक मंदी की वजह से मस्क को भारी घाटा हुआ था. लेकिन बाद में दोनों ने ही इनोवेशन को तवज्जो देते हुए बाजार के लिए नए तरह के उत्पादों पर अपना सबकुछ दांव पर लगा दिया और चमत्कारिक रूप से सफल हुए.

कहा जा रहा है कि ऐपल आनेवाले समय में अगली पीढ़ी की इलेक्ट्रिक कार निर्माण के क्षेत्र में एक बड़ा खिलाड़ी बनना चाहती है. लेकिन यहां पहले ही उसकी टक्कर का एक और खिलाड़ी टेस्ला, मौजूद है

इस समय ऐपल के सामने सबसे बड़ी चुनौती है
कोई भी कंपनी और उसका कारोबार एक चक्र के हिसाब से चलता है. पहले किसी उद्योग का जन्म होता है, फिर वह कारोबारी सफलता के शीर्षबिंदु पर पहुंचता है और फिर उसमें गिरावट आने लगती है. गिरावट आने से पहले कोई कंपनी मुनाफा समेटकर बाजार से हट जाए तो यह समझदारी भरा फैसला कहा जा सकता है. लेकिन व्यवहार में ऐसा नहीं होता.
आईफोन के बाद अब भविष्य की संभावनाओं को समझना और उसपर खर्च करना इस समय ऐपल के सामने सबसे बड़ी चुनौती है. आज उसके तमाम कारोबारी मूल्य इसी एक उत्पाद और उससे संबंधित कारोबार से जुड़े हुए हैं. इस समय कंपनी के हिस्सेदारों और बाजार विश्लेषकों के लिए भी यह सबसे बड़ा सवाल है कि वह अपने विस्तार के लिए अगला कौन सा क्षेत्र चुनने वाली है.
ऐपल की चुनौती यह भी है कि वह जल्दी से जल्दी खुद में बदलाव करके आगे बढ़े. और जाहिर है कि बदलाव का मतलब अब आईफोन 7, आईफोन 8 या आईफोन 9 का निर्माण नहीं है. बल्कि एक तरह से यह इस उत्पाद से पीठ फेरने की प्रक्रिया शुरू करने को लेकर है. इसका मतलब होगा कि किसी नए क्षेत्र में प्रवेश करके उसे वहां अगुवा बनना पड़ेगा और ऐपल ऐसा कर पाई तो वह फिर इतिहास बना सकती है.
(ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी में कॉलेज ऑफ बिजनेस एंड इकॉनॉमिक्स के लेक्चरर निगेल मार्टिन और यूनिवर्सिटी ऑफ न्यू इंग्लैंड के प्रोफेसर जॉन राइस का यह आलेख मूल रूप से दकनवर्जेशन पर प्रकाशित हुआ है)