2017 विधानसभा चुनाव उत्तर प्रदेश: बहुजन समाज पार्टी की पराजय के कारण

विधानसभा चुनाव 2017 उत्तर प्रदेश का चुनाव बुरी तरह से हारकर बहुजन समाज पार्टी 403 में सिर्फ 19 सीटों पर सिमट कर रह गयी ,बहुजन समाज पार्टी जैसी मजबूत पार्टी का यह हश्र क्यों हुआ यह अत्यंत ही विचारणीय प्रश्न है। सपा की हार के बाद यदि बसपा जीती होती तो बात वही हो जाती जैसा पिछली बार बसपा को हराकर सपा ने किया था पर मामला तो एकदम उलट हुआ,समाजवाद और बहुजनवाद में बहुत बडा अंतर नही है क्योकि दोनों की मंजिल एक ही है,सिर्फ वहां तक पहुंचने के रास्ते अलग-अलग हैं।यह अलग बात है कि इन्हें इम्प्लीमेंट में लाने वाले लोग बेहतर न हों। बसपा ने अपने गठन के बाद 1989 में 372 स्थानों पर चुनाव लड़ के 13 सीटें हासिल की थीं और 9.41% वोट हासिल किया था।शेख सुलेमान उस वक्त इसके नेता विधानमंडल हुआ करते थे।

मायावती जी तब अपने राजनैतिक जीवन की दमदार शुरुआत कर रही थीं,1991 में बसपा ने 386 सीटों पर लड़के 9.44% वोट हासिल कर 12 सीटें जीती थीं तो 1993 में सपा/बसपा गठबंधन ने एकसाथ चुनाव लड़ा था जिसमे बसपा ने 164 मे 67 सीटें जीत ली थीं,तब 11.12% वोट मिले थे,1996 के चुनाव मे 296 मे भी 67 सीटें जीतते हुए बसपा ने 19.64% मत हासिल किये थे,2002 में 401 में से 98 सीटें जीतते हुए 23.06% मत प्राप्त किये फिर 2007 में 403 पर 206 सीटें हासिल कर खुद के बूते पर सरकार बनायी थी।इस चुनाव में बसपा को 30.43% मत मिले थे,इसके बाद 2012 में 25.91% मत हासिल कर बसपा ने 403 में 80 सीटें जीती थीं तो 2017 में 403 में लड़ते हुये 22.20% मत हासिल कर महज 19 पर सिमट के रह गयी है।

बसपा के उदय के बाद उसके क्रमशः उत्थान और फिर पराभव का किस्सा बहुत ही दिलचस्प है।कहा जाता है कोई मजबूत किला एकाएक भरभरा के नही गिर पड़ता है।पहले उसके प्लास्टर झरते हैं,छत दरकती है और फिर वह जमींदोज होता है।वक्त लगता है बनने और गिरने में जिसे समय से भांपने वाला होशियार और न भांपने वाला रोम के राजा नीरो जैसा होता है जो अपने खुद के महल जलने तक बंसी बजाता रहता है।

सबको याद है कांशीराम जी के संघर्षो का वह दिन जिन्होने साइकिल से चलके यूपी में संगठन खड़ा किया। देवरिया के बरवांमीर छापर के अताउल्लाह जी 1989 में बसपा से देवरिया से लोकसभा चुनाव लड़के राजमंगल पांडेय और मोहन सिंह से मुकाबला किये थे और निन्यानवे हजार वोट पाए थे।बसपा के वे क्या दिन थे जब नारे लिखने और बोलने पर मारपीट हो जाया करती थी।कांशीराम जी को उस दौर में नये कोट खरीदने की स्थिति न होने पर पुराना कोट खरीद कर ठंड से मुकाबला करना पडता था और उन्होंने संघर्ष करते हुये मजबूत बहुजन समाज पार्टी बनायी,मायावती जी को उन्होंने इस पार्टी का उत्तराधिकारी बनाके मुख्यमंत्री भी बना दिया ।

यूपी में मजबूत, प्रशिक्षित और तपे-तपाये नेताओ की लंबी फ़ौज मायावती जी को विरासत में कांशीराम जी ने दी,सोनेलाल पटेल ,बलिहारी चौधरी ,राजबहादुर प्रसाद ,आरके चौधरी ,श्यामलाल यादव ,स्वामी प्रसाद मौर्य ,सुखदेव राजभर ,युगल किशोर ,दारा सिंह चौहान ,श्रीनाथ प्रसाद ,रमाशंकर राजभर ,शिवचरन प्रजापति,दद्दू प्रसाद आदि अनेक नाम हैं जो बसपा की धुरी थे तो अपनी-अपनी जाति के मजबूत छत्रप भी थे।इन नेताओं की बदौलत इनकी जाति अपना वजूद देखती थी लेकिन मायावती जी ने अपने अनुशासन या अभिमान में धुत हो इन्हें एक-एक कर दल से निष्कासित कर डाला।मायावती जी ने समझा कि वे इन्हे निकालकर इकलौती मालकिन बन जो चाहें वह करती रहें,जहां चाहें वहां इन्हें हांकती रहें,ये पिछड़ी/दलित जातियां जाएंगी कहाँ?

अतीत में जो स्वामी प्रसाद मौर्य ,युगलकिशोर ,दारा सिंह चौहान आदि इनके सलाहकार हुआ करते थे वे शनैः-शनैः मायावती जी द्वारा आउट किये जाते रहे और सतीश मिश्र जी सारी जिम्मेदारी संभालते गये।बहुजन समाज पार्टी का कांशीराम संस्करण खत्म हो गया और सतीश मिश्र संस्करण नये तेवर और कलेवर में सामने आ गया।अब बहुजन समाज पार्टी ने बुद्ध,अम्बेडकर तथा कांशीराम जी के बहुजन हिताय को त्यागकर सर्वजन हिताय के नारे को आत्मसात कर लिया।

मायावती जी ने सर्वजनवादी बनने के चक्कर में पार्टी के कैडर प्रशिक्षण बन्द कर दिए,अपने प्रशिक्षित नेताओं के मुंह सिल दिए।सामाजिक न्याय की चर्चा-परिचर्चा बन्द हो गयी।पिछड़े और दलित वर्ग के प्रभावशाली नेता/कार्यकर्ता हाशिये पर डाल दिए गए।बहुजन समाज पार्टी दिशाहीन मतवाला हाथी बन गयी जिसका अंजाम यह हुआ कि बसपा अपने अस्तित्व के लिए आज सोचने को विवश है।

बसपा में विगत तीन-चार चुनावों से टिकट की मारामारी मची हुई थी।बसपा का टिकट बसपा कैडरों या नेताओ को न मिलके ब्यापारियों,पूंजीपतियों,ठेकेदारों,धन पशुओं को मिलने लगा था।बसपा ने यदि जमीनी कार्यकर्ताओ को टिकट दिया होता तो उसका इतना बुरा हश्र न होता।बसपा का वैचारिक विचलन तथा टिकटों की नीलामी ने जनता के बीच उसे ऐसा अविश्वसनीय बना दिया कि वह केवल जाटव/चमार की पार्टी बनके रह गयी।

पिछड़े और अन्य दलित जातियों के छत्रप बसपा से छिटक के दूर चले गए लिहाजा बसपा को पूर्व में मिलने वाले चौहान,कोरी,कुर्मी,कुम्हार, लोहार,राजभर,मल्लाह,धोबी,गोंड,पासी,खटिक,बाल्मीकि आदि जातियों के वोट घट गये और भाजपा की तरफ खिसक गये क्योकि भाजपा ने बड़े सलीके से ओमप्रकाश राजभर,अनुप्रिया पटेल,दारा सिंह चौहान,स्वामी प्रसाद मौर्य,आरके चौधरी पासी,युगल किशोर आदि को अपने पाले में खड़ा कर इन जातियों का सबसे बड़ा हितैषी खुद को सिद्ध कर डाला।

मायावती जी ने बसपा को कांशीराम जी,अम्बेडकर जी और महामना बुद्ध के रास्ते से दूर ले जाके खुद का बेड़ा गर्क कर लिया लेकिन इस चुनाव ने सिद्ध कर दिया कि चाहे मायावती जी हों या अखिलेश जी सवर्ण तभी तक उनके साथ या किसी पिछड़े/दलित/वंचित के साथ हैं जब तक वे रसदार और फलदार हैं वरना तो उनका मूल बृक्ष है ही भाजपा अथवा कांग्रेस।

बसपा के कैडर,कार्यकर्ता और शुभेच्छु अगर बसपा प्रमुख से बसपा को उसके मूल चरित्र को अपनाने हेतु बाध्य करेंगे और अपने एक-एक महत्वपूर्ण मोतियों को जो बिखर गए हैं एकजुट करने हेतु प्रयत्न करेंगे तभी बसपा का पुनर्जन्म संभव है अन्यथा सिर्फ अतीत ही याद रहेगा।

लेखक : संतोष चक्रवर्ती  (मित्रों की पोस्टों व गूगल से मिले तथ्यों के आधार पर)