एक दोस्ती अटल’ भरोसे की

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ये किस्सा है बलरामपुर जिले का – एक गरीब बूढ़ा किसान अपनी फरियाद लेकर जिलाधिकारी ऑफिस जाता है। लम्बे इंतजार के बाद डीएम साहब मिलते हैं। पूछते हैं बताइए दादा क्या दिक्कत है?

कवनो ना साहिब बस ऊ एजेंसी हमे दे देइत, त बड़ा किरिपा होत, बुढ्ढे ने कहा।

डीएम बुड्ढे का हुलिया देखते हैं जो अति सामान्य सा धोती-कुर्ता पहने खड़ा था।उसको समझाते हुए बोलते हैं- देखो बाबा इसमें झमेला है,बड़े-बड़े लोगों का प्रेशर है, सांसद-विधायक तक लाइन में हैं।ई तुमसे नहीं होगा।तुम्हारा कोई जान-पहचान है किसी नेता से?

ज्ञात हो कि कुछ रोज पहले अखबार में एक विज्ञापन आया है जिले के लिए,जिसमें किसी एजेंसी (शायद गैस एजेंसी) के लिए आवेदकों को जिलाधिकारी ऑफिस में रजिस्ट्रेशन करवाने को कहा गया था।

हाँ, एक हमारे मित्र हैं, उ जानते हैं हमको।ई वकत उ बहुते बड़ नेता हो गइस हैं,बुड्ढे ने दृढ़ता से कहा।

जान-पहचान से कुछ नहीं होता बाबा।नेता किसको नहीं जानते? उ जानते सबको हैं,पर तुम जैसे किसी को भी नहीं जानते।जाओ छोड़ो ई सब चक्कर।और कोई परेशानी हो तो बताओ? डीएम ने समझाने के लहजे में कहा।

लेकिन बुढ्ढा अड़ गया,कि नहीं मेरा रजिस्ट्रेशन करिए,मुझे बहुत बड़े नेता जानते हैं।उ हमारे मित्र हैं।

फिर डीएम ने खींझते हुए कहा, तो बात कराओ उनसे देखें तो कितने बड़े नेता हैं?

बुड्ढे ने पॉकेट से एक फ़टी हुई डायरी निकाली और डीएम साहब के ही फोन से नम्बर मिलाया गया।बुड्ढे ने अपना उद्देश्य और हाल-चाल बताते हुए कहा कि डीएम साहिब कहत हैं कि कवनो नेता से परिचय होय चाहिं, तबै काम होइस।हम त बस आपै को जानित हौ पण्डित जी! अब आपै समझी लौ।फिर उसने चोंगा डीएम साहब को पकड़ा दिया।

डीएम साहब ने हेल्लो बोला तो उधर से आवाज आयी… मैं #अटल_बिहारी_वाजपेयी बोल रहा हूँ,ये जो आदमी आया है मेरा मित्र है।यह बहुत ईमानदार है।ये कुछ गलत नहीं कर सकता,ये जो भी काम कहता है कर दीजिए।नमस्कार!

फोन कट गया।डीएम साहब सुन्न। कभी बुड्ढे को देखते हैं तो कभी उनके सामने रखे रिसीवर को।ये अटल जी का निजी फोन नम्बर था।

अटल जी उस समय प्रधानमंत्री बन गये थे।अटल जी 1955 में लखनऊ से उपचुनाव हारने के बाद जब 1957 में बलरामपुर से अपना पहला लोकसभा चुनाव लड़ रहे थे तब इसी बुड्ढे के घर रुका करते थे।लगभग चालीस सालों बाद बुढ्ढे ने पहली बार किसी काम के लिए उनसे सिफारिश की थी। उसका रजिस्ट्रेशन हुआ।बाद में एजेंसी भी मिल गयी। बुढ़ापे में उसके जवानी के मित्र ने उसे गरीबी से उबार लिया था। आज तो ग्राम प्रधान बन भी जाते हैं, तो दोस्त बैकवर्ड लगने लगता है.