संस्कृत और रूसी भाषाओं के बीच अद्भुत समानता

हालाँकि यह बात सभी लोगों को मालूम है कि संस्कृत और रूसी भारोपीय कुल की ही भाषाएँ हैं, लेकिन अधिकांश लोग रूसी और संस्कृत के बीच भी उतनी ही दूरी मानते हैं, जितनी दूरी फ़ारसी और संस्कृत या लैटिन और संस्कृत के बीच है। भाषाविद व लेखक वीर राजेन्द्र ऋषि ने ‘भारत और रूस: भाषाई व सांस्कृतिक नाता’ नामक अपनी पुस्तक में लिखा है कि रूसी और संस्कृत के बीच की रिश्तेदारी इससे कहीं अधिक गहरी है।

वीर राजेन्द्र ऋषि के अनुसार — संस्कृत और रूसी के बीच बड़ा निकट का सम्बन्ध है। दोनों भाषाओं के बीच इतनी गहरी समानता है कि इसे केवल एक संयोग मात्र नहीं कहा जा सकता। इन बातों से हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि इतिहास के किसी दौर में संस्कृत और रूसी भाषाओं को बोलने वाले लोग जरूर साथ-साथ रहा करते थे।

वीर राजेन्द्र ऋषि ने भारोपीय भाषाओं के एक अन्य लक्षण की ओर ध्यान दिलाया है — वह है, इन भाषाओं में विभिन्न शब्दों के समास बनाने की क्षमता का विद्यमान होना। समास बनाने की यह प्रवृत्ति भारोपीय भाषाओं से ही यूनानी, संस्कृत तथा पुरानी ईसाई स्लाव भाषाओं में गई है।

संस्कृत और रूसी भाषाओं के बीच अद्भुत समानता से यह बात समझ में आती है कि इतिहास के किसी दौर में इन दोनों भाषाओं को बोलने वाले लोग साथ साथ रहा करते थे।

रूसी भाषा में शब्द ‘गोरद’ (पुरानी स्लाव भाषा में ‘ग्राद’) का अर्थ ‘नगर’ होता है। इस शब्द के मूल का पता लगाना कोई बहुत कठिन काम नहीं है। प्राचीन रूस और भारत में सुरक्षा के लिए तथा शत्रु के आक्रमण से रक्षा के उद्देश्य से शहरों को किले के रूप में बनाया जाता था। हिन्दी शब्द ‘गढ़’ का अर्थ ‘किला’ ही होता है। शहरों के नाम बनाने के लिए आधुनिक रूसी में ‘ग्राद’ प्रत्यय और आधुनिक हिन्दी में ‘गढ़’ प्रत्यय का उपयोग किया जाता है, जैसे लेनिनग्राद (लेनिन का नगर), पित्रोग्राद (प्योतर का नगर) और बहादुरगढ़ (बहादुर का नगर), चण्डीगढ़ (चण्डी का नगर) आदि।

रूसी और संस्कृत के बीच दो व्यापक समानताएँ भी पाई जाती हैं। पहली — रूसी यूरोप की इकलौती भाषा है, जिसका व्याकरणिक आधार संस्कृत से काफी मिलता-जुलता है।

दूसरी — रूसी और संस्कृत, दोनों ही भाषाएँ कर्णप्रिय हैं। ‘संस्कृत’ शब्द का अर्थ ही होता है — ध्यानपूर्वक तथा प्रणालीगत रूप से निर्मित, परिमार्जित व परिष्कृत। औपनिवेशिक युग के भाषाविद विलियम जोन्स ने लिखा है — संस्कृत भाषा की संरचना को देखकर आश्चर्य होता है; संस्कृत यूनानी की तुलना में अधिक त्रुटिहीन है, इसका शब्द भण्डार लैटिन से भी कहीं अधिक व्यापक है और सबसे बड़ी बात यह कि संस्कृत इन दोनों ही भाषाओं से अतुलनीय रूप से अधिक परिष्कृत है।

रूसी भाषा के प्रशंसकों के विचार भी कुछ इसी तरह के हैं। मार्च 1937 में लन्दन विश्वविद्यालय में व्याख्यान देते हुए वाड़मीमांसक व भाषाविद एन० बी० जैप्सन ने कहा था — हालाँकि यह बात बिल्कुल सहज है कि रूसी भाषा से पूरी तरह अनजान कोई आदमी जब मूल रूप से रूसी बोलने वाले लोगों की बातचीत पहली बार सुनता है, तो वह विस्मय से भरकर बरबस कह उठता है कि ’अरे, रूसी भाषा कितनी सुरीली है।’ रूसी उपन्यासकार इवान तुर्गेनिफ़ ने लिखा है — किन्तु इस बात पर विश्वास नहीं होता कि इस महान जाति को भाषा ही नहीं दी गई।

भाषाविद स्वितलाना झार्निकवा ने ’जीवन और विज्ञान’ नामक पत्रिका में प्रकाशित अपने एक लेख में लिखा था — संस्कृत भाषा की सहायता से हम अनेक रूसी नामों तथा रूसी भाषा के शब्दों के मूल तक बड़ी आसानी से पहुँच सकते हैं। उदाहरण के लिए, रूस की वोल्गा नदी के नाम के मूल तक भाषिक रूप से पहुँचना सम्भव है। हिरोडोटस ने वोल्गा नदी को ‘वारस’ कहकर पुकारा है। पानी के लिए संस्कृत शब्द ‘वारि’ की सहायता से इस शब्द की सर्वोत्तम व्याख्या की जा सकती है।

इन समानताओं के पीछे क्या कारण हो सकता है? वैदिक संस्कृत हालाँकि अभी 300 वर्ष ईसा पूर्व तक आम बोलचाल की भाषा थी, किन्तु सम्भव है कि इस भाषा का कालखण्ड उससे कई हजार साल पहले शुरू हुआ हो। सम्भव है कि प्राचीन भारत के निवासी सरस्वती नदी के तटों से अपनी भाषा व संस्कृति को लेकर ’ओब’ नदी के तटों तक गए हों और इसके फलस्वरूप रूसी भाषा उत्पन्न हुई हो। मध्य एशिया तथा रूस में शिव की प्रतिमाओं के पाए जाने से इस बात का संकेत मिलता है कि हिन्दू संस्कृति भारतीय उपमहाद्वीप से काफी दूर-दूर स्थित विभिन्न क्षेत्रों तक फैली हुई थी।

दूसरी अटकल यह है कि भारत में वैदिक संस्कृत को लाने का श्रेय दक्षिणी रूस के मूल निवासी श्वेतवर्णी आर्यों को जाता है। रूस सहित यूरोप में यह अवधारणा लोकप्रिय है, जबकि इस बात के स्पष्ट प्रमाण मौजूद हैं कि भारत पर आर्य आक्रमण की वर्तमान अवधारणा अँग्रेज़ व जर्मन विद्वानों द्वारा विकसित किया गया झूठ का एक पुलिन्दा मात्र थी।

हालाँकि डीएनए साक्ष्यों के सामने भारत में आर्यों के बाहर से आने की अवधारणा धीरे-धीरे दम तोड़ती जा रही है। श्रीकान्त तलागेरी जैसे विद्वानों ने वैदिक ग्रन्थों के अपने विश्लेषण से यह सिद्ध किया है कि वैदिक काल के पुराने ग्रन्थों में पूर्वी भारत के स्थानों का उल्लेख मिलता है, जबकि परवर्ती ग्रन्थों में पश्चिमोत्तर भारत की भौगोलिक स्थिति का वर्णन मिलता है। इसका सिर्फ़ एक ही मतलब हो सकता है कि प्राचीन भारत के निवासी पहले मध्य एशिया गए और शायद फिर वहाँ से आगे यूरोप की ओर बढ़े।

सम्भव है कि परस्पर विपरीत इन दोनों अवधारणाओं का निपटारा होने में अनेक दशकों का समय लग जाए, लेकिन इस बात को लेकर कोई विवाद नहीं है कि वैदिक हिन्दू सभ्यता एक विशाल परिक्षेत्र तक फैली हुई थी। बल्गारिया के भाषाविद व्लदीमिर गियोर्गिएफ़ के अनुसार किसी भी जनसमूह के एक प्रजाति का रूप धारण करने में भौगोलिक नामों की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इस प्रक्रिया के मूल में दो ही कारण