अपराजिता (कोयल) के गुण, फायदे, नुकसान एवं औषधीय प्रयोग

पराजिता का वृक्ष बेल की तरह झाड़ीदार होता है। अपराजिता याने जो कभी पराजित नहीं होती इसलिए इसे अपराजिता कहा गया है। कहा जाता है कि जब इस वनस्पति का रोगों पर प्रयोग किया जाता है तो यह हमेशा सफल होती है। इस पर फूल विशेषकर वर्षा ऋतु में आते हैं। इस आयुर्वेदिक जड़ी बूटी का वैज्ञानिक नाम क्लिटोरिया टर्नेटे है। इसे पौधे को हिंदी में कॉयाला, अंग्रेजी में वटरफ्लाई पिया और संस्‍कृत में गिरिकर्निका के नाम से भी जाना जाता है। यह उष्णकटिबंधीय पौधा है जिसका फूल से लेकर जड़ तक लाभकारी है।

औषधीय गुणों वाली जड़ी बूटी है जो कि आम घरेलू पौधों की तरह घरों में उगाई जाती है। अपराजिता पौधे को बहुत ही कम देखभाल की आवश्‍यकता होती है। अपराजिता के फायदे इस पौधे के संपूर्ण भाग के औषधीय उपयोग के लिए हैं। विशेष रूप से इस पौधे की जड़ जो ल्यूकोडर्मा के इलाज के लिए उपयोग की जाती है। अपराजिता के फायदे विषहर के रूप में भी उपयोग के लिए जाने जाते हैं। इसके फूलों का आकार गाय के कान की तरह होता है, इसलिए इसको गोकर्णी भी कहते हैं। अपराजिता सफेद और नीले रंग के फूलों के भेद से दो प्रकार की होती है।

नीले फूल वाली अपराजिता भी दो प्रकार की होती है :-
(1) इकहरे फूल वाली
(2) दोहरे फूल वाली।

अपराजिता के बीज सिर दर्द को दूर करने वाले होते हैं। दोनों ही प्रकार की अपराजिता बुद्धि बढ़ाने वाली, वात, पित्‍त, कफ को दूर करनी वाली है। सिरदर्द, बुखार, मधुमेह, सफ़ेद दाग, पथरी, मासिक धर्म, गर्भस्थापन, सुखप्रसव, बच्चों का पेट दर्द, पीलिया, श्वांस, तुण्डिकेरी शोथ, तिल्ली, जलोदर, पेशाब की जलन, अंडकोष की सूजन, हांथी पाँव, डिब्बारोग आदि बिमारियों के इलाज में अपराजिता औषधीय चिकित्सा प्रयोग किये जाते है अपराजिता के इस्‍तेमाल से सााधारण से लेकर गंभीर बीमारियों का उपचार किया जा सकता है। यह शरीर के विभिन्‍न अंगों में होने वाले सूजन के लिए भी लाभप्रद है।

 

 

अपराजिता में पाये जाने वाले पोषक तत्व
अपराजिता स्वास्थ के लिए बहुत लाभदायक होता है। अपराजिता के फूलों में कैल्शियम, पोटेशियम, मैग्नीशियम, आयरन, जस्ता, और मैंगनीज अधिक मात्रा में उपलब्ध होते हैं। अपराजिता सोडियम में भी समृद्ध होते हैं। अपराजिता के पौधे में बहुत से विटामिन और एंटीऑक्सीडेंट प्रचुर मात्रा में पाई जाती है।

सिरदर्द में अपराजिता के फायदे एवं सेवन विधि:
सिरदर्द की शिकायत रहती है तो अपराजिता के सेवन के बारे में जरूर सोचें। सिरदर्द आम बीमारी बन गयी है ऐसे में आप हर बार सिरदर्द के लिए दर्दनाशक (Painkiller) का उपयोग नहीं कर सकते। जरूरत से ज्यादा दर्दनाशक दवाओं का उपयोग सेहत के लिए अच्छा नहीं है। ऐसे में आपको चिंता करने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि अपराजिता सिरदर्द का शर्तिया घरेलू उपचार हो सकता है। सिरदर्द में अपराजिता की फली के 8-10 बूँद रस का नस्य अथवा जड़ के रस का नस्य प्रातः खाली पेट सेवन करने से सिरदर्द में लाभदायक होता है। अपराजिता की जड़ को कान में बाँधने से भी लाभ होता है। इसके बीजों के 4-4 बूँद स्वरस को नाक में टपकाने से अधकपारी में गुणकारी होती है।

 

 

अपराजिता का फायदा डिप्रेशन में 
अवसाद (Depression) से निपटना जटिल होता है लेकिन गौरतलब है कि अपराजिता का सेवन इस समस्या को और बढ़ने से रोकने या कम करने में मदद कर सकता है। अपराजिता में चिंता कम करने और अवसाद-रोधी गुण होने की भी पुष्टि हुई है। अपराजिता करता है तंत्रिका तंत्र को दुरुस्त करता है अपराजिता में कुछ ऐसे तत्व होते हैं जो तंत्रिका तंत्र को दुरुस्त कर सकते हैं। दूसरे अर्थों में यह फूल मस्तिष्क के लिए बहुत फायदेमंद है।

बुखार में अपराजिता के फायदे एवं सेवन विधि:
बुखार में लाल सूत्र के 6 धागों में अपराजिता की जड़ को कमर में धारण करने से तीसरे दिन आने वाला बुखार नष्ट हो जाता है।

मधुमेह रोग में अपराजिता के फायदे एवं सेवन विधि:
मधुमेह रोग में अपराजिता के फायदे आर्श्चजनक हैं क्योंकि यह रक्त शर्करा के स्तर को कम करने में मदद करते हैं। तथा मधुमेह में आकाश बल्ली (अमर बेल) के फायदे भोजनोपरांत अपराजिता के फूलों की चाय बनाकर सेवन करने से रक्त शर्करा के स्तर को नियंत्रित करने में मदद करती है साथ ही यह आपके शरीर में शुगर लेवल को नियंत्रित रखने में सहायक बाध्य होती है।

सफ़ेद दाग में अपराजिता के फायदे एवं सेवन विधि:
श्वेतकुष्ठ (सफ़ेद दाग) सफ़ेद दाग तथा मुँह की झांई पर अपराजिता की जड़ को दो भाग, तथा चक्रमर्द की जड़ 1 ग्राम, शुद्ध जल के साथ पीसकर लेप करने से लाभ होता है। इसके साथ ही इसके बीजों को देशी घी में भूनकर सुबह-शाम साफ जल के साथ सेवन करने से डेढ़ दो महीने में सफ़ेद दाग में लाभदायक होता है। अपराजिता की जड़ की राख या भस्म को मक्खन में घिसकर लेप करने से मुँह की झाई नष्ट हो जाती है।

पथरी में अपराजिता के फायदे एवं सेवन विधि:
पथरी में अपराजिता की 5 ग्राम जड़ को चावलों के धोवन के साथ पीस-छानकर एक सप्ताह सुबह-शाम पिलाने से मूत्राशय की पथरी कट-कट कर निकल जाती है।

मासिक धर्म में अपराजिता के फायदे एवं सेवन विधि :
मासिक धर्म में अपराजिता का स्वरस 10 ग्राम निकालकर 10 ग्राम मिश्री में मिलाकर देने से मासिक धर्म में लाभदायक होता है।

गर्भस्थापना में अपराजिता के फायदे एवं सेवन विधि:
गर्भस्थापन में सफ़ेद अपराजिता की लगभग 5 ग्राम छाल को अथवा पत्रों को बकरी के दूध में मिलाकर, छानकर तथा शहद के साथ पिलाने से गिरता हुआ गर्भ ठहर जाता है तथा किसी प्रकार की पीड़ा नहीं होती है।

सुख प्रसव में अपराजिता के फायदे एवं सेवन विधि:
सुख प्रसव में अपराजिता कोयल की बेल को स्त्री की कमर में धारण करा देने से शीघ्र ही प्रसव होकर पीड़ा शांत हो जाती है। अपराजिता की 5 ग्राम जड़ को चावलों के धोवन के साथ पीस-छानकर एक सप्ताह सुबह-शाम पिलाने से मूत्राशय की पथरी कट-कट कर निकल जाती है।

उदर शूल (बच्चों के पेट दर्द) में अपराजिता के फायदे एवं सेवन विधि:
बच्चों के उदर शूल, पेट दर्द में अपराजिता के 1-2 बीजों को धीमी आग पर भूनकर, माता या बकरी के दूध अथवा देशी घी के साथ चटाने से बच्चों के पेट में होने वाला दर्द शीघ्र नष्ट हो जाता है।

पीलिया रोग में अपराजिता के फायदे एवं सेवन विधि:
पीलिया में अपराजिता के भुने हुये बीजों के 1/2 ग्राम की मात्रा में महीन चूर्ण को उष्णोदक के साथ दिन में दो बार सेवन कराने से लाभ होता है। अपराजिता की जड़ का 3-6 ग्राम चूर्ण छाछ (मठ्ठा) के साथ सेवन करने से लाभदायक होता है।

श्वांस में अपराजिता के फायदे एवं सेवन विधि:
कास श्वास में अपराजिता की जड़ का काढ़ा थोड़े-थोड़े समय के बाद चटाने से श्वास और बालको की कुक्कुर खांसी में लाभ होता है।

तुण्डिकेरी शोथ में अपराजिता के फायदे एवं सेवन विधि:
मुख की गुठलियां में अपराजिता 10 ग्राम पत्र 500 ग्राम जल में काढ़ा बनाकर, आधा शेष रहने पर सुबह-शाम गण्डूष करने से, टांसिल, गले के व्रण तथा स्वर का भारीपन में आराम मिलता है। अथवा सफ़ेद अपराजिता की जड़ के 1 से 2 ग्राम चूर्ण को देशी घी में मिश्रण कर पीने से अथवा कटु फल के चूर्ण को गले के अंदर घर्षण करने से गलगण्ड रोग नष्ट होता है।

तिल्ली में अपराजिता के फायदे एवं सेवन विधि:
तिल्ली में अपराजिता की जड़ को दूसरी रेचक और मूत्रजननकर औषधियों के साथ देने से बढ़ी हुई तिल्ली और जलंधर आदि रोग मिटते हैं। मूत्राशय की दाह में लाभ होता है।

जलोदर में अपराजिता के फायदे एवं सेवन विधि:
जलोदर में अपराजिता के भुने हुये बीजों के 1/2 ग्राम के लगभग महीन चूर्ण को उष्णोदक के साथ सुबह-शाम सेवन करने से लाभ होता है।

पेशाब की जलन में अपराजिता के फायदे एवं सेवन विधि :
मूत्रकृच्छ्र (पेशाब की जलन) में अपराजिता की सुखी जड़ के चूर्ण प्रयोग से मूत्राशय की जलन में लाभदायक होता है। इसका 1-2 ग्राम चूर्ण गर्म पानी या दूध से दिन में 2 या 3 बार प्रयोग करने से गुणकारी होता है।

अंडकोष की सूजन में अपराजिता के फायदे एवं सेवन विधि:
अंडकोष वृद्धि, की सूजन में अपराजिता के बीजों को पीसकर हल्का गर्म ही गर्म लेप करने से अंडकोष की सूजन बिखर जाती है।

श्लीपद (हांथी पाँव) में अपराजिता के फायदे एवं सेवन विधि :
श्लीपद हांथी पाँव में अपराजिता 10-20 ग्राम जड़ों को जल के साथ पीसकर, गर्म कर लेप करने से तथा 8-10 पत्तों के कल्क की पोटली बना सेंकने से लाभ होता है।

डिब्बारोग में अपराजिता के फायदे एवं सेवन विधि:
डिब्बारोग में अपराजिता के भुने हुये बीजों के 1/2 ग्राम की मात्रा में महीन चूर्ण बनाकर उष्णोदक के साथ दिन में दो बार सेवन कराने से डिब्बा रोग में लाभ होता है।

फोड़ा फुंसी में अपराजिता के फायदे एवं सेवन विधि:
फोड़ा फुंसी में कांजी या सिरके के साथ अपराजिता की 10-20 ग्राम जड़ को पीस कर लेप करने से उठते हुये फोड़े फूटकर नष्ट हो जाते है।

अपराजिता के सेवन से दूर होती है आंखों की समस्‍या
सफेद अपराजिता तथा पुनर्नवा की जड़ की पेस्‍ट में बराबर भाग में जौ का चूर्ण मिलाकर अच्छी तरह से घोंट लें। अब इसकी बाती बनाकर सुखा लें। इस बाती को पानी से घिसकर अंजन (आंखों में लगाने) करने से आंखों से जुड़ी सभी बीमारियों का उपचार होता है।

कान दर्द में करें अपराजिता के पत्‍ते का इस्‍तेमाल
अपराजिता (aparajita tree) के पत्‍तों के रस को सुखाकर गर्म कर लें। इसे कानों के चारों तरफ लेप करने से कान के दर्द में आराम मिलता है।

दांत दर्द में अपराजिता से फायदा
अपराजिता की जड़ की पेस्‍ट तैयार करें। इसमें काली मरिच का चूर्ण मिलाकर मुंह में रखें। इससे दांत दर्द में बहुत ही आराम मिलता है।

गले के रोग में अपराजिता से लाभ 

  • 10 ग्राम अपराजिता के पत्‍ते को 500 मिलीलीटर पानी में पकायें। इसका आधा भाग शेष रहने पर इसे छान लें। इस तरह से तैयार काढ़े से गरारा करने पर टांसिल, गले के घाव में आराम पहुंचता है। गला खराब होने यानी आवाज में बदलाव आने पर भी यह काढ़े से गराना करना उपयोगी होता है।
  • सफेद फूल (aparajita flower) वाले अपराजिता की जड़ की पेस्‍ट में घी अथवा गोमूत्र मिलाकर सेवन करें। इससे गले के रोग (गलगण्ड) में लाभ होता है।
  • सफेद फूल वाले (aparajita phool) अपरजिता की जड़ को घृतकुमारी या एलोवेरा (Aloe Vera) के रेशों में पिरोकर हाथ में बांधें। इससे हाल ही में हुआ गण्डमाला ठीक होता होता है।
  • 1 ग्राम सफेद अपराजिता की जड़ को पीसकर सुबह में पीने से तथा चिकना भोजन करने से गलगण्ड में लाभ होता है।
  • सफेद अपराजिता की जड़ के 1 से 2 ग्राम चूर्ण को घी में मिला कर खाएं। इसके अलावा कड़वे फल के चूर्ण को गले के अन्दर घिसने से गलगण्ड रोग शान्त होता है।

अपराजिता का परिचय
अपराजिता, विष्णुकांता गोकर्णी आदि नामों से जानी जाने वाली श्वेत या नीले वर्ण के पुष्पों वाली कोमल वृक्ष आश्रिता बल्लरी उद्यानों एवं गृहों के शोभा वृद्धनार्थ लगाई जाती है। इस पर विशेषकर वर्षा ऋतु में फलियां और फूल लगते है।

अपराजिता के बाह्य-स्वरूप
अपराजिता सफेद और नीले रंग के पुष्पों के भेद से दो प्रकार की होती है। नीले फूल वाली अपराजिता भी दो प्रकार की होती है इकहरे फूल वाली तथा दोहरे फूल वाली। इसके पत्ते छोटे और प्रायः गोल होते हैं। इसकी पर्वसंधि से एक शाखा निकलती है, जिसके दोनों ओर 3-4 जोड़े पत्र युग्म में निकलते है और अंत में शिखाग्र पर एक ही पत्र होता है। इस पर मटर की फली के समान लम्बी और चपटी पलियां लगती हैं, जिनमें से उड़द के दोनों के समान कृष्ण वर्ण के चिकने बीज निकलते हैं।

अपराजिता के गुण-धर्म
दोनों प्रकार की अपराजिता, मेधा के लिये हितकारी, शीतल, कंठ को शुद्ध करने वाली, दृष्टि को उत्तम करने वाली, स्मृति व बुद्धि वर्धक, कुष्ठ, मूत्र दोष, आम, सूजन, व्रण तथा विष को दूर करने वाली है। यह विषध्न, कण्ठ्य, चक्षुष्य, मस्तिष्क रोग, कुष्ठ, अर्बुद, शोथ जलोदर, यकृत प्लीहा में उपयोगी है।

अपराजिता को लेने की सही खुराक क्या है?
अपराजिता को औषधी के रूप में सेवन या इस्तेमाल करने की सही मात्रा हर व्यक्ति के लिए अलग-अलग हो सकती है। क्योंकि, यह उम्र, स्वास्थ्य जैसे अन्य वजहों पर निर्भर करता है। अपराजिता के औषधीय प्रयोग किये जाने वाले भाग-अपराजिता की जड़, अपराजिता की पत्ती, अपराजिता का तना, अपराजिता का फूल, अपराजिता के फल, अपराजिता का तेल आदि घरेलू दवाओं में प्रयोग किये जाने वाले अपराजिता के भाग है। सेवन की मात्रा  – ग्रीन चाय की तरह ही उपयोग किया जाता है। 1. पत्र स्वरस – 3 से 6 M L ( मि.ली. ) ( इससे अघिक वामक होती है )  2. मूल ( जड़ ) चूर्ण – 2 से 3 ग्राम, बीज चूर्ण – 1 से 2 ग्राम। हमेशा ध्यान रखें कि, किसी भी चीज का अत्यधिक इस्तेमाल या सेवन करने से कई समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए, अपने लिए इस जड़ी-बूटी की सही खुराक जानने के लिए डॉक्टर या हर्बलिस्ट से संपर्क करें। 

अपराजिता के नुकसान ( साइड इफेक्ट्स )
अपराजिता से किन-किन साइड इफेक्ट्स का सामना करना पड़ सकता है? दवा के रूप में अपराजिता के अतिरिक्त सेवन से आपको डायरिया व उलटी की समस्या हो सकती है। इसके अलावा गर्भपात में स्त्रियों को अपराजिता का प्रयोग अधिक मात्रा में नहीं करना चाहिए। नहीं तो गर्भपात में नुकसान दायक साबित हो सकता है।या बच्चे को स्तनपान करवा रही हैं, तो आपको इसके इस्तेमाल से बचना चाहिए बिना डॉक्टर की सलाह से सेवन न करें। पहले डॉक्टर या हर्बलिस्ट से चर्चा करके पूरी जानकारी प्राप्त कर लेनी चाहिए। वहीं, अगर आपको किसी खाद्य पदार्थ या ड्रग से एलर्जी है या फिर आपकी कोई सर्जरी हुई है, तो आपको बिना डॉक्टरी सलाह के इसका उपयोग नहीं करना चाहिए। क्योंकि, यह खतरनाक साबित हो सकता है। हर्बल सप्लीमेंट हमेशा सुरक्षित नहीं होते, इसलिए इनसे मिल सकने वाले दुष्प्रभावों के बारे में जानने के लिए डॉक्टर या हर्बलिस्ट की मदद लें।