सिहोरा : पुलिस थाना सिहोरा में हुआ शस्त्र पूजन ,विजय दशमी को क्यों पूजे जाते है शस्त्र 

शस्त्र पूजा के शस्त्रों को इकट्ठा किया जाता है फिर उनपर गंगाजल छिड़का जाता है। इसके बाद सभी शस्त्रों को हल्दी व कुमकुम का तिलक लगाकर फूल अर्पित किए जाते हैं। शस्त्र पूजा में शमी के पत्ते का बहुत महत्व है। शमी के पत्तों को शस्त्रों पर चढ़ाकर उनकी पूजा की जाती है। शस्त्र पूजा में नाबिलग बच्चों को शामिल नहीं किया जाता है क्योंकि बच्चों को किसी भी तरह का प्रोत्साहन ना मिले।

प्राचीन काल से चली आ रही है “शस्त्र पूजन” की परंपरा

दशहरे के दिन शस्त्र पूजा करने की परंपरा आज से नहीं बल्कि प्राचीन काल से चली आ रही है। प्राचीन समय में राजा अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने के लिए इस दिन शस्त्र पूजा किया करते थे। साथ ही अपने शत्रुओं से लड़ने के लिए शस्त्रों का चुनाव भी किया करते थे।

भारतीय सेना(Indian ARMY) भी करती है शस्त्र पूजा

भारतीय सेना भी हर साल दशहरे के दिन शस्त्र पूजा करती है। इस पूजा में सबसे पहले मां दुर्गा की दोनो योगनियां जया और विजया की पूजा होती है फिर अस्त्र-शस्त्रों को पूजा जाता है। इस पूजा का उद्देश्य सीमा की सुरक्षा में देवी का आशीर्वाद प्राप्त करना है। मान्यताओं के अनुसार रामायण काल से ही शस्त्र पूजा की परंपरा चली आ रही है।

सिहोरा थाना में सम्पूर्ण पुलिस बल ने किया “शस्त्र पूजन”

जबलपुर जिले के सिहोरा थाने में विजयादशमी (दशहरा पर्व ) पर “शस्त्र पूजन” का आयोजन हुआ। जहा पुलिस के अधिकारियों ने शस्त्र की विधि विधान से पूजा की। इस मौके पर सिहोरा थाना प्रभारी गिरीश धुर्वे ,एस आई जी पी द्विवेदी ,रॉबिन कन्नौज , प्रधान आरक्षक रामा धुर्वे ,आरक्षक राममिलन रजक ,राजेश पटेल, ओम प्रकाश दुबे, संतोष भालेकर ,राधेश्याम छारी ,संत कुमार मरकाम, धनेश्वर सिंगोरे,महिला आरक्षक प्राची सिंह परिहार ,रुबीना शामिल थे।

रावण के पुतले को आज जलाया जाता है

देश के कई सारे हिस्सों में इस दिन रावण के पुतले को जलाया जाता है, क्योंकि भगवान श्रीराम ने आश्विन शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि के दिन लंकापति रावण का वध किया था. … विजयादशमी पर मां दुर्गा ने महिषासुर का नाश किया था इसलिए इस दिन शस्त्र की पूजा होती है और इश दिन शमी के शमी के पेड़ की पूजा की जाती है।

पुरानी कथा के अनुसार

एक कथा के अनुसार राम ने रावण पर विजय प्राप्त करने हेतु नवरात्र व्रत किया था, ताकि उनमें शक्ति की देवी दुर्गा जैसी शक्ति आ जाए अथवा दुर्गा उनकी विजय में सहायक बनें। चूँकि दुर्गा शक्ति की देवी हैं और शक्ति प्राप्त करने हेतु शस्त्र भी आवश्यक है, अतऱ राम ने दुर्गा सहित शस्त्र पूजा कर शक्ति संपन्न होकर दशहरे के दिन ही रावण पर विजय प्राप्त की थी। तभी से नवरात्र में शक्ति एवं शस्त्र पूजा की परंपरा कायम हो गई। ऐसी मान्यता है कि इंद्र भगवान ने दशहरे के दिन ही असुरों पर विजय प्राप्त की थी।

महाभारत का युद्ध भी इसी दिन प्रारंभ हुआ था तथा पांडव अपने अज्ञातवास के पश्चात इसी दिन पांचाल आए थे, वहाँ पर अर्जुन ने धनुर्विद्या की निपुणता के आधार पर, द्रौपदी को स्वयंवर में जीता था। ये सभी घटनाएँ शस्त्र पूजा की परंपरा से जुड़ी हैं।राजा विक्रमादित्य ने दशहरा के दिन ही देवी हरसिद्धि की आराधना, पूजा की थी। छत्रपति शिवाजी ने भी इसी दिन देवी दुर्गा को प्रसन्न करके तलवार प्राप्त की थी, ऐसी मान्यता है। तभी से मराठा अपने शत्रु पर आमण की शुरुआत दशहरे से ही करते थे।महाराष्ट में शस्त्र पूजा आज भी अत्यंत धूमधाम से होती हैं।