आशुतोष राणा की कलम से – “सब्र का फल और क़ब्र का फल”

ज एक परिवार के आनंदोत्सव में शामिल हुआ तो उसी परिवार के दो बुज़ुर्गों की भीषण बहस का मूक श्रोता रहा। आनंद के बहुरूपियापन को देख अचम्भित रह गया। एक ही परिवार के दो लोगों के मन में वही आनंद अलग-अलग भाव पैदा कर रहा था। एक का आनंद दूसरे का विषाद था, तो दूसरे के विषाद में ही एक को आनंद मिल रहा था।

दोनों बुज़ुर्गों के चहरे पर लालिमा थी, किंतु एक का चेहरा क्रोध के आवेश में लाल था तो दूसरे का चेहरा आनंद के आह्लाद से लाल पड़ गया था। #बड़े बुज़ुर्गवार ने अपने नाम में राम को पीछे रखा था सो वे ‘लालराम’ कहाते थे, तो #छोटे बुज़ुर्गवार ने राम को आगे कर लिया तो वे रामलाल हो गए। बहस का विषय था #सब्र का फल मीठा होता है। बड़े बुज़ुर्गवार ने छोटे बुज़ुर्गवार को लताड़ते हुए कहा की व्यर्थ की बात मत करो रामलाल की #सब्र का #फल #मीठा होता है। यह ग़लत शिक्षा है। सब झूठ है- एकदम बकवास !! तुम जानते हो मुझसे ज़्यादा #सब्र अपने परिवार में किसी ने नहीं किया, और इसका जो फल मुझे मिला ? इसका स्वाद कैसा है ? आज पूरी दुनिया देख रही है।

छोटे बुज़ुर्गवार ने उन्हें और बुरी तरह लताड़ते हुए कहा की तुम्हें सब्र का नहीं #क़ब्र का फल मिला है। तुम क़ब्र के फल को सब्र के फल के नाम से बदनाम मत करो। जब ज़िंदगी भर सब्र रखा था तो अंत में आपको किसी और की क़ब्र पर जाने की क्या ज़रूरत थी जी ? तुमको मिली असफलता- सब्र रखने का नहीं, क़ब्र पर जाने का फल है।

ये सुनकर लालराम जी का क्रोध लपलपाने लगा वे आहत स्वर में बोले, ज़्यादा ज्ञान मत बाँटो, तुमसे ज़्यादा दुनिया देखी है मैंने, मेरा किसी की क़ब्र पर जाना पाप है ? और तुम्हारा उसी जगह केक ले जाना पुण्य है ?

मैं मरे हुए आदमी के हाथ जोड़ूँ तो #पतित की कुख्याति पाऊँ ? और तुम ज़िंदा आदमी से हाथ मिलाओ तो #पति ( स्वामी ) की ख्याति से लब्ध हो ?? मेरा झुकना मेरी भूल है ? और तुम्हारा झुकना तुम्हारी हूल है ?

रामलाल जी भी उत्तेजित हो गए बोले किसी की क़ब्र पर जाना शोक की निशानी है सो तुमको शोक मिला। और किसी के यहाँ केक ले जाना आनंद की निशानी है सो मुझे आनंद मिला। अपने ही हाथों को अपने ही हाथ से मिलाकर ‘हाथ जोड़ना’ व्यक्ति के स्वार्थी होने की घोषणा है , किंतु अपने हाथ को दूसरे के हाथ से मिलाकर- ‘हाथ मिलाना’ व्यक्ति के परमार्थी स्वभाव को चिन्हित करता है। तुम स्वार्थ से प्रेरित थे और मैं परमार्थ से। इसलिए तुम दुःख भोग रहे हो और मैं सुख।

लालराम बोले कुतर्क मत करो !! मैं अपने आप नहीं उनके बुलाने पर गया था। तुम तो बिना बुलाए ही वहाँ पहुँच लिए।
रामलाल बोले, पड़ोसी बुलाएगा तभी तुम जाओगे ये तुम्हारे अहंकारी होने का प्रमाण है। और पड़ोसी के उत्सव में मेरा बिना बुलाए पहुँचना मेरे निरअहंकारी चित्त की घोषणा है।

लालराम जी दाँत पीसते हुए बोले चुप रहो रामलाल..तुम मुझपर स्वार्थी अहंकारी होने का आरोप लगा कर मेरे जीवन की पूरी तपस्या को भ्रष्ट साबित करना चाहते हो ? जबकि तुम्हें पता है की मैंने अपने नहीं, अपने परिवार के अहंकार की रक्षा की है, अपने स्वार्थों को ताक पर रखके परिवार के स्वार्थों को सिद्ध किया है। तुम्हारे पास आज जो चमक है, जो सफलता है, जिसके मद में तुम मदमस्त होकर घूम रहे हो, और ये आनंदोत्सव माना रहे हो, वह मेरे वर्षों के अथक परिश्रम का ही परिणाम है। तुम मेरा सत्कार करने की जगह मुझे धिक्कार रहे हो ? अपने से बुज़ुर्ग का सम्मान करना सीखो, क्योंकि तुम भी कभी बुज़ुर्ग होगे और तुम्हें वही व्यवहार मिलेगा जो तुमने अपने बुज़ुर्ग के साथ किया है।

ये सुनकर रामलाल बोले यदि आपके सिद्धांत को मान लूँ बुज़ुर्गवार- तो फिर आपको आज जो तकलीफ़, पीढ़ा, अपमान, तिरस्कार, मिल रहा है वह आपके द्वारा अपने बुज़ुर्गों के प्रति किए गए व्यवहार का परिणाम है। यदि ऐसा है तो फिर अपनी वर्तमान स्थिति का दोष मुझे क्यों दे रहें हैं ?? यह आपके किए हुए कर्मों के फल ही होंगे जो आज आप तक लौट रहें हैं ? आपको क़ब्र पर जाने का शौक़ था तो सबने सोचा की आप हमारे बुज़ुर्ग हैं, आपको अपने शौक़ की पूर्ति के लिए दूसरों की क़ब्र पर क्यों भटकने दें ? इसलिए हमने आपके लिए, आपकी ही क़ब्र खोद दी। इसमें बुरा मानने की क्या बात है ? और वैसे भी अपनों की क़ब्र अपने ही खोदते हैं, ये रिवाज है, संस्कृति है। कृपया इसे हमारी विकृति ना माने।

अजीब से तर्कों को सुन लालराम जी सन्न रह गए। उन्होंने विचार किया की रामलाल कुतर्क पर उतारू है, कुतर्क की प्रवृत्ति ‘कथ्य’ परक होती है, जिसमें तथ्य और सत्य का कोई स्थान नहीं होता। कथ्य, सुनने-समझने में नहीं सिर्फ़ कहने में विश्वास रखता है। इसलिए दुनिया का श्रेष्ठतम तर्क भी कुतर्क की भूमि पर परास्त हो जाता है। कुतर्क की विशेषता होती है की वह अपने चेहरे पर तर्क का मुखौटा लगा के बहस की भूमि पर खड़ा होता है, तर्क के ऊपर अपनी विजय के कारण यह लोगों को तर्क का परिष्कृत रूप दिखाई देता है जिससे कुतर्क को सु-तर्क की प्रतिष्ठा भी मिलती। कुतर्क शोर प्रधान होता है इसमें तर्क की, संवाद स्थापित करने वाली प्रवृत्ति नहीं होती। कुतर्क की शक्ति ही कथ्य है, सिर्फ़ कहना, इसलिए लगातार बोलते रहना इसका स्वभाव है। कुतर्क के कथ्य रूपी एकालाप, प्रलाप, विलाप की तीव्रता और शोर इतना भीषण होता है की इसमें तर्क के तथ्य और सत्य सुनाई ही नहीं पड़ते। इसलिए कुतर्क से निपटे का एक मात्र कारगर तरीक़ा है ‘मौन’। सो बेहतर है के रामलाल के कुतर्क के जवाब में मुझे #मुखर नहीं #मौन हो जाना चाहिए।
मुखर व्यक्ति जब मौन होता है तब भी, और मौन व्यक्ति जब मुखर होता तब भी, दोनों स्थितियों में यह समाज के आकर्षण और बदलाव का केंद्र होते हैं। सो लालराम जी #घोर #मौन में चले गए।

रामलाल जी अपने बुज़ुर्गवार को मौन देख चिंता में पड़ गए !! क्योंकि वे इस बात को जानते थे की #लालराम जी सच में इतने सब्र वाले हैं की वे क़ब्र में भी सब्र से #रामलाल की प्रतीक्षा करेंगे।

इस भीषण विचार के आते ही रामलाल जी ने अपने से छोटों को फुसफुसा कर आदेश दिया की लालराम जी की क़ब्र खुदी रहे, उन्हें दिखती रहे किंतु किसी भी क़ीमत पर लालराम को क़ब्र तक नहीं पहुँचना चाहिए। क्योंकि मैं इनसे बहुत प्रभावित हूँ , ये मेरे प्रेरणास्रोत हैं, ये जो करते हैं मुझे वही करने की इच्छा होती है, ये जहाँ पहुँचते हैं मैं वहीं पहुँचने को फड़फड़ाने लगता हूँ। इसलिए कहीं ये क़ब्र में पहुँच गए तो मैं भी क़ब्र में पहुँच जाऊँगा।

रामलाल जी के इस कथन से परिवार के उनसे छोटे बुज़ुर्ग, जो रामलाल के रहते परिवार में सबसे बड़े बुज़ुर्ग के #औहदे को प्राप्त नहीं कर सकते अव्यक्त अपूर्व आनंद की आभा से लाल हो गए। उन्होंने विचार किया की लालराम जी के विषाद और खिन्नता से उपजे इस मौन को #आमरण #अनशन की तर्ज़ पर #मृत्युपर्यन्त #मौन में बदलने के लिए प्रेरित करना चाहिए जिससे वे शीघ्र ही, स्वयं के लिए खुदे हुए खड्ड में प्रतिष्ठित हो जायें।

#लालराम समझ रहे थे की #रामलाल क्या कह रहे हैं उन #छोटे #बुज़ुर्गों से क्योंकि #उन्होंने भी #अपने प्रेरणास्रोत #बुज़ुर्ग को अभी तक उनके लिए खोदी गई क़ब्र में जाने से रोका हुआ है। अचानक लालराम जी ने देखा के परिवार के कुछ सदस्य उनके लिए खुदे खड्ड के बाज़ू से #एक #और खड्ड खोद कर तैयार कर रहे हैं। रामलाल के लिए अपने परिवार के ही कुछ लोगों को विषाद से भरा देख लालराम जी एक दिव्य आनंद की अनुभूति भर गए।
कहानी में स्मरण रखने योग्य शिक्षा
———————————
१- सब्र का फल हर कोई चाहता है, किंतु क़ब्र का फल कोई भी नहीं चाहता।
२- जिसने सब्र किया है वही उसके फल का आनंद उठाये यह आवश्यक नहीं, किंतु सब्र करने वाले के परिजन अवश्य ही उसके फल का आनंद उठाते हैं।
३- आज का प्रेरणास्रोत कल की प्रतारणा का स्रोत होता है।
४- लाल को राम बनाने में नहीं, बल्कि राम के लाल होने में ही भलाई है।
५- अपनी क़ब्र अपने ही खोदते हैं।
६- क़ब्र खुदने और क़ब्र में दफ़नाये जाने के बीच का समय ही नर्क है। इसलिए अपनों को साध कर रखिए ताकि वे आपके जीते जी ही आपकी क़ब्र ना खोद दें।
७- कुछ लोगों के जीते जी हाथ जोड़ें या मरने के बाद, वे दोनों ही सूरतों में आपके अकल्याण का कारण होते हैं।
८- अतीत और भूत में अंतर होता है। हमारे बुज़ुर्ग हमारा अतीत होते हैं इन्हें भूत मत बनाइए। क्योंकि भूत कैसा भी हो, किसी का भी हो, हमारे भय और परेशानी का कारण होता है।
९- ‘काल’ का अर्थ समय भी होता है और मृत्यु भी, इसलिए अपनी उपलब्धियों को, सफलताओं को, सामर्थ्य को स्वयं की नहीं, समय की सौग़ात मानकर “काल को याद रखिए।” क्योंकि काल को भूलने की सूरत में ये समय का सुदर्शन रूप छोड़ मृत्यु का भयंकर रूप धारण कर लेता है। परिणामस्वरूप हम संसार के द्वारा सदा के लिए भुला दिए जाते हैं।

यह लेख फिल्म अभिनेता आशुतोष राणा की फेसबुक पोस्ट से लिया गया है