महानगरीय स्‍तर पर संपत्ति कर का दोहन अतिरिक्‍त राजस्‍व सृजन के लिए किया जा सकता है

नई दिल्ली: आज केन्‍द्रीय वित्‍त मंत्री श्री अरुण जेटली द्वारा संसद में पेश किए गए आर्थिक सर्वेक्षण 2016-17 में बताया गया है कि शहरी स्‍थानीय इकाइयां (यूएलबी) जिनका प्राथमिक दायित्‍व शहरों का विकास और सेवा प्रदान करना है,बड़े संरचनात्‍मक कमी,अपर्याप्‍त वित्‍त और खराब शासन की क्षमता से संबंधित बड़ी समस्‍याओं से जूझ रहीं हैं। प्रत्‍येक भारतीय महानगर आज पानी,बिजली आपूर्ति,अपशिष्‍ट प्रबंधन सार्वजनिक परिवहन,शिक्षा स्‍वास्‍थ्‍य सेवा और प्रदूषण की समस्‍या से संबंधित चुनौतियों का सामना कर कर रहा है।

सर्वे के लिए किए गए विश्‍लेषण से पता चला है कि बेहतर सेवा डिलीवरी और संसाधनों, स्‍व राजस्‍व, कर्मचारियों की संख्‍या और प्रति व्‍यक्ति पूंजी व्‍यय के बीच गहरा संबंध है। (चित्र 1ए,1बी) विश्‍लेषण से शासन और सेवा डिलीवरी के बीच कोई साफ संबंध न होने के संकेत मिलते हैं।

इस समय कर राजस्‍व की समस्‍या यूएलबी के अपर्याप्‍त कर लगाने के अधिकारों के कारण नहीं है। इनमें एक संभावनाओं वाला स्रोत संपत्ति कर है। सर्वे के लिए किए गए अध्‍ययन दर्शाता है कि संपत्ति कर के क्षेत्र में बड़ी संभावना है और महानगर के स्‍तर पर अतिरिक्‍त राजस्‍व सृजन के लिए इसका दोहन किया जा सकता है। उपग्रह के प्राप्‍त चित्रों का शहरी शासन में सुधार लाने के लिए एक उपयोगी उपकरण के रूप में इस्‍तेमाल किया जा सकता है जो संपत्ति कर की अनुपालना की बेहतर सुविधा प्रदान कर सकता है। अध्‍ययन में दर्शाया गया है कि बंगलुरु और जयपुर इस समय क्रमश: 5-20 प्रतिशत से अधिक संभावित संपत्ति कर की वसूली नहीं कर रहे हैं।

प्रतिस्‍पर्धा बदलाव और प्रगति का एक शक्तिशाली वाहक बन रही है और इस प्रतिस्‍पर्धा का विस्‍तार राज्‍यों और महानगरों के बीच आवश्‍यक रूप से होना चाहिए। महानगरों जिन्‍हें उत्‍तरदायित्‍व दी गई है, संसाधनों से सशक्‍त बनाया गया और जवबादेही दी गई वे प्रस्पिर्धी संघवाद के प्रभावी वाहक हो सकते हैं और तब वास्‍तव में उप संघवाद की शुरुआत होगी।