अर्थी का अर्थ•••

सुबह उठा तो पता चला पड़ोसी गुज़र गए !! मैं बड़ी चिंता में पड़ गया की आज दफ़्तर में बहुत काम है अतिमहत्वपूर्ण मसलों पे मीटिंग है जिसमें मेरा रहना बहुत ज़रूरी है । पत्नी से कहा कैसा करूँ ? वे बोलीं पड़ोस का मामला है, सोच के देखो..वैसे जाने वाला तो चला गया, तुम्हारे रुकने से वे वापस तो आ नहीं जाएँगे ? मैंने कहा बात तो तुम्हारी ठीक है लेकिन यदि मैं अंतिम यात्रा में शामिल नहीं हुआ तो वे क्या सोचेंगे ? कमाल करते हो तुम भी..कौनसा वे तुमको देखने वाले हैं जो वे सोचेंगे । और वैसे भी जब जब उनको कोई ज़रूरत पड़ी तुम हमेशा उनके साथ खड़े रहे हो ।

कल शाम तक तो वे अच्छे भले थे ? मैंने कहा हाँ..मेरी चर्चा भी हुए थी उनसे, आज की मीटिंग के बारे में भी बताया था।लेकिन अचानक ऐसा हो जाएगा सोचा भी नहीं था।पत्नी बोलीं तुम भले ही उनके बिगड़े कामों को बनाओ लेकिन वे हमेशा तुम्हारा काम बिगाड़ते रहे हैं, तुम भले ही उनके दुःख को दूर करो लेकिन वे हमेशा तुम को दुःख ही देते रहे, अब देख लो ना,जब उनको तुम्हारी आज की मीटिंग के बारे में पता था जिसका सम्बंध तुम्हारे प्रमोशन से है ..वे निकल लिए..अरे एकाध दिन और ना जाते तो कौनसा पहाड़ टूट जाता ?? कोई बीमारी होती,अस्पताल में पड़े होते तो समझ आता, एकदम अच्छे भले थे , लेकिन नइ..भाई साहब का प्रमोशन ना हो जाए.. तुम्हारे बॉस को तो रोक नहीं सकते, और तुम जैसा आदमी जो ठंड गरमी बरसात में,१०४ डिग्री बुखार में भी दफ़्तर जाता है .. उसे कैसे रोकें ? सो ये पैंतरा अपनाया।

मेरी मानो तो तुम निकल लो .. वे तो अब past हो गए लेकिन तुम्हारे तो future का सवाल है।और कौनसा तुमको कर्मकांड करने हैं जी ? या तुम्हारे पास स्वर्ग का एंट्री पास है ? या भगवान तुमको देख लेंगे तो उनकी सज़ा कम हो जाएगी ? मुझे बात सही लगी बात सिर्फ़ मेरे future की ही नहीं कम्पनी के फ़्यूचर की भी है। मैं दबे पाँव घर से निकला, दिल धकधका रहा था कि कोई मुझे देख ना ले, और वही हुआ जिसका मुझे ख़तरा था .. बिल्डिंग से बाहर निकला ही था की मुझे आकाशवाणी सुनाई पड़ी ..कहाँ चले ? मैंने अपना सर उठा के देखा तो चौथी मंज़िल की अपनी बालकनी में भाई साहब खड़े थे, वे नस मँजन से अपने मसूड़ों की सफ़ाई कर रहे थे ये उनका नित्य का नियम था.. पूरी बिल्डिंग उनको भाई साहब कहती थी क्योंकि आज से ३० साल पहले जब ये बिल्डिंग बन के तैयार हुए थी तो सबसे पहला फ़्लैट भाई साहब ने ही लिया था।

कहते है जो जितना अच्छा समझता है वो उतना अच्छा लिखता है, ठीक यही बात फिल्म अभिनेता आशुतोष राना जी के लेखन मे आपको पढ़ने को मिलेगा । जीवन का दर्शन एवं उनकी क्षेत्रीय बुंदेली भाषा का प्रयोग, मन को मोहता है.

पूरी बिल्डिंग में उनका ख़ौफ़ था, किसी भी घर में मेहमान आने से लेके नए कप प्लेट आने तक की ख़बर उनके पास रहती थी .. मैंने कहा कहीं नहीं .. बस .. थोड़ा ..वे बोले क्या कहीं नहीं? कहीं तो .. और क्या थोड़ा पूरे के पूरे जा रहे हो और कहते हो थोड़ा। तुमको पता है तुम्हारा पड़ोसी चल बसा.. मैंने कहा अरे कब कैसे ? इतना सुनना था की उन्होंने अपने मुँह में भरी हुई मँजन की पीक को पूरी ताक़त से पिचकारी बना के छोड़ दिया पीक सन्नाते हुए मेरे कान के पास से निकल गई .. बोले मैं चाहता तो तुम्हारे मुँह पे पीक मारता, दीन दुनिया चीन जापान की ख़बर रखते हो लेकिन पड़ोस में क्या हो गया इसकी जानकारी नहीं है , अपने आपको गूगल कहते हो , पानीपत की लड़ाई कब हुई , बाबर कैसे मरा , अकबर के कितने बेटे थे RTI क्या है , फ़लाँ घोटाले में कौन था , देश की अर्थव्यवस्था सुधारने के लिए क्या करना चाहिए, नेताजी ज़िंदा हैं ,कहाँ छिपे रहे क्यों छिपे रहे, इन सब के बारे में एसे बात करते हो जैसे सब कुछ तुमसे पूछ कर हुआ हो..लेकिन पड़ोसी मर गया उसकी जानकारी नहीं है।मैं सब जानता हूँ आज तुम्हारा प्रेज़ेंटेशन है जिसपे तुम्हारा प्रमोशन टिका हुआ है तो ख़ुशी ख़ुशी दफ़्तर जा रहे हो , अपने सुख के लिए तुमको अपने पड़ोसियों का दुःख दिखाई नहीं दे रहा।तुम्हें चाहिए कि तुम उसकी ठठरी कसो उसको शमशान तक छोड़ के आओ .. तुम उसके साथ पिक्चर देखने जाते थे पान खाने जाते थे तो अब उसकी अंतिम यात्रा में भी उसका साथ दो। उसकी आत्मा को शान्ति मिलेगी ।

और तुम नहीं मरोगे क्या ? तब किस मुँह से लोगों से कंधा माँगोगे ? तुम्हारे जैसे लोगों के कारण देश की ये हालत है। मैंने देखा कि बिल्डिंग के चौकीदारों से लेकर कुछ अन्य लोग भी भाई साहब के भाषण से प्रभावित हो मुझे कुछ कुछ हिक़ारत की नज़र से देखने लगे.. मैं बिल्डिंग में वापस घुसने ही वाला था की ६ वीं मंज़िल जहाँ मैं रहता हूँ अपने घर की बालकनी में मुझे अपनी पत्नी दिखाई दी छूटते ही बोली तुम अभी तक यहीं खड़े हो दफ़्तर नहीं गए ? तुम्हारे इसी ढुलमुल रवैए के कारण तुम्हारा प्रमोशन अटका पड़ा है,इन चौथी मंज़िल वालों को तो कोई काम है नहीं, रिटायर हो चुके हैं .. ना ख़ुद काम करेंगे ना दूसरों को करने देंगे।क्या वो सिर्फ़ तुम्हारा पड़ोसी था ? अरे इनका भी तो है .. ये ख़ुद क्यों नहीं जाते मँजन छोड़ कर ? बड़े आए दूसरों को समाज शास्त्र पढ़ाने वाले नशेढी मंजनखोर कहीं के ।

अभी तक भाई साहब ऊपर से हमला कर रहे थे..अब भाई साहब के ऊपर हमला हो रहा था, वो भी ठीक उपर से .. दुश्मन उनके सर पे खड़ा था ६ वीं मंज़िल पर .. भाई साहब ऊपर से हुए प्रहार से तिलमिला गए और अपनी बालकनी में लगभग झूलते हुए शतुर्मुर्ग के जैसे अपनी गर्दन का रूख ऊपर की ओर किया वे अपनी मुँह की पीक से ऊपर की तरफ़ हमला करना चाहते थे लेकिन उनको अपने पीकास्त्र की अक्षमता का एहसास हुआ, पीक से ऊपर से नीचे या समांतर तो मारक चोट की जा सकती है, किंतु नीचे से ऊपर नहीं। वैसी स्थिति में गुरुत्वकार्शन के नियम के हिसाब से जितनी स्पीड से पीक ऊपर फेंका जाएगा उससे दुगनी स्पीड से वह नीचे आएगा और उनका ही काम तमाम कर देगा .. ये बिलकुल वैसा ही है जैसे अपना पालतू कुत्ता दूसरे पे गुर्राने की जगह अपने को ही काट दे ।

वे चिल्लाए पड़ोसी वो तुम्हारा था मेरा अड़ोसी था । पड़ोसी का कर्तव्य है दुःख में साथ देना और अड़ोसी का कर्तव्य है सलाह देना मैं अपने कर्तव्य का पालन कर रहा हूँ । आप चुप ही रहिए भाई साहब मेरा मुँह मत खुलवाइए .. दूसरों को ऑफ़िस जाते देख आपको मिर्ची लगती है ,रिटायर जो हो गए हैं .. आपका ख़ुद का प्रमोशन तो हुआ नहीं, चार बार ससपेंड हुए सो अलग..और ऊपर से ही मुझसे बोली ख़बरदार जो तुमने वी आर एस लेकर घर बैठने वाले इस निठल्ले की बात सुनी..तुरंत दफ़्तर के लिए निकलो.. किसी की अंतिम यात्रा के चक्कर में अपनी आरम्भिक यात्रा नष्ट मत करो। तुम्हारा कैरीअर अभी शुरू ही हुआ है, मरे पड़ोसी के लिए ज़िंदा घर वालों को मत भूलो..यहीं खड़े रहे तो , तुमको मुझे आइ लव यू जगह, आई मिस यू बोलना पड़ेगा।

ये कह के वो बालकनी से अंदर चली गई .. मैं बिल्डिंग से निकल आगे नुक्कड़ पे खड़ा हो गया मन में ये था की मेरा दफ़्तर शमशान के सामने ही है मैं यहाँ से अंतिम यात्रा में शामिल हो जाऊँगा और फिर वहीं से दफ़्तर पहुँच जाऊँगा.. मुझे ग्लानि नहीं रहेगी .. तभी मेरे कानो में राम नाम सत्य है सत्य बोलो मुक्ति है की आवाज़ सुनाई पड़ी.. मैंने लपक कर अपने पड़ोसी की अर्थी में अपना कंधा लगा दिया। पीछे पलट के देखा तो भाई साहब मुझे ही देख रहे थे, नस मँजन से अपने मसूड़ों को घिसते हुए ही,उन्होंने मुझे बालकनी से ही ख़ुश होते हुए वेलडन का सिग्नल किया,मुझे बहुत संतोष मिला।क्योंकि मैं इस सत्य को जानता था की पत्नी की प्रेम भरी नाराज़ी से कहीं अधिक घातक भाईसाहब का नफ़रत भरा प्रेम है, मेरे लिए पत्नी की अपेक्षा भाईसाहब को प्लीज़ करना ज़रूरी था।तभी अचानक मुझे लगा की जैसे कोई मुझसे कह रहा है की भाईसाहब को छोड़ के मेरी बात सुनो। अधिकतर जिनकी आत्मा मरी हुई होती है वे ही दूसरों की सोई हुई आत्मा को जगाने का काम करते हैं, जिससे वे ग्लानि मुक्त हो सकें।

ये भाईसाहब उन्हीं में से एक हैं,उनकी आत्मा सुप्त नहीं लुप्त हो चुकी है। मैंने देखा की मेरे पड़ोसी की एकदम ताज़ी मरी हुई आत्मा, मेरी बीमार पड़ी अंतरात्मा के सामने खड़ी है। पड़ोसी की आत्मा ने मुझसे कहा तुम आश्चर्य में पड़ गए ना,मरे हुए शरीर की ज़िंदा आत्मा को देख के ? मैंने कहा हाँ, लेकिन उससे ज़्यादा आश्चर्य मुझे अपने ज़िंदा शरीर की मरी हुई आत्मा को देखकर हो रहा है। तुम्हारे सामने मेरी आत्मा कितनी बीमार और कमज़ोर नज़र आ रही है। उसने ज़ोर का ठहाका मारा और कहा,उसका कारण है..मैंने अपने कल्याण के लिए इस मरे हुए शरीर को धारण किया था लेकिन इस शरीर ने मुझे अपने सुख की पूर्ति करने के लिए काम पे लगा दिया। मैंने बहुत प्रयास किया की भाई तू मेरे कल्याण में भी सहयोग कर,मैं तेरे सुख की पूर्ति करूँगा।पहले १२,१४ साल तक तो शरीर ने मेरी बात मानी लेकिन जैसे जैसे शरीर बड़ा होने लगा इसने मुझे छोटा करना शुरू कर दिया,और मेरे कल्याण को एक तरफ़ रख के, ये सिर्फ़ मुझसे स्वयं के सुख की पूर्ति कराने लगा।

अपने को इग्नोर होता देख,मैंने जब जब विद्रोह किया इसने तब तब मुझे मारा। शरीरों की एक अच्छी आदत होती है की वे संगठित होना जानते है।क्योंकि शरीर को ये पता है की वो अगर अकेला आत्मा से लड़ा तो परास्त हो जाएगा इसलिए जैसे ही कोई आत्मा जगी या उसने विद्रोह किया तो बहुत से शरीर मिलके उस आत्मा का गला घोंट देते हैं,उसको मारने का काम करते है,सो हम हार जाते हैं। इस मामले में हम आत्माएँ बहुत कमज़ोर हैं ,हम निजता को महत्व देते हैं इसलिए कभी कोई आत्मा किसी दूसरी आत्मा का साथ नहीं देती।

हम सुप्त पड़े हुए शरीर के कमज़ोर होने का इंतज़ार करते हैं,क्योंकि हमें शरीर के इस दुर्गुण की भी जानकारी है की कमज़ोर शरीर को कोई भी दूसरा शरीर सहायता नहीं करता। सो पहली फ़ुर्सत में ही हम शरीर को चित्त कर निकल लेते हैं।शरीर एक नम्बर का गधा और अहंकारी होता है वो ये भूल जाता है की उसकी एक सीमा होती है इसलिए वो हारता भी है और अंत में मरता भी है। हम जो आत्मा हैं असीम होते हैं , हमको आप सुप्त कर सकते हैं, सुला सकते हैं, कमज़ोर और बीमार कर सकते हैं लेकिन मार नहीं सकते हमारा अंत नहीं कर सकते, हमें मिला अमरता का यही वरदान हमारे लिए अभिशाप हो जाता है। हम आत्माएँ नरक की यातना शरीर के मरने बाद नहीं, शरीर के जीते जी ही भोगते हैं। मरने के बाद तो हम मुक्त हो जाते हैं। हम भटकें या अटकें ये हमारे ऊपर है।

अब तुम्हारी आत्मा को ही देख लो असीम है लेकिन शरीर की सीमा में फँसी हुई है बेचारी, इसलिए सुप्त अवस्था में पड़ी है। इस समय वो नर्क में है इसलिए बीमार, कमज़ोर और दुखी है। तुम्हारी आत्मा तो शरीर के सुख के लिए काम करती है लेकिन क्या तुम्हारा शरीर कभी आत्मा के कल्याण के लिए प्रयास करता है? नहीं ना ? जैसे राजनीति में दो विरोधी विचारधारा वाले या अलग उद्देश्यों के दल आपस में मिलके सरकार बना लें तो मजबूरी वश सरकार तो बनी रहेगी, लेकिन उसके परिणाम संतोषजनक और कल्याणकारी नहीं होंगे।

सिर्फ़ तंत्र का बने रहना ही स्वातंत्र नहीं होता। राजा को प्रजा के सुख के लिए और प्रजा को राजा के कल्याण के लिए तत्पर रहना पड़ता है। ऐसे ही शरीर और आत्मा हैं। यदि ये एक दूसरे के सहायक नहीं होंगे,तो सुखी होते हुए भी शरीर का कल्याण नहीं होगा,और कल्याण होते हुए भी आत्मा को सुख नहीं मिलेगा। तमाम भौतिक सफलताएँ उपलब्धियाँ पद प्रतिष्ठा धन सम्पत्ति हासिल करके तुम संसार को अपने ज़िंदा होने का सबूत तो दे दोगे लेकिन तुम्हारा ज़िंदा होना तुम्हारे जागे हुए होने का प्रमाण नहीं है।ज़िंदा होना और जागे हुए होने में फ़र्क़ होता है ।

जो सफलता के पीछे भाग के उन्हें हासिल कर ले वह ज़िंदा है, और जिसके पीछे सफलताएँ भागें और उसे छू भी ना पाएँ,वह जागा हुआ है। जो सफलता के सर पर खड़ा हो वह ज़िंदा है व उपलब्धियाँ जिसकी गोद में पड़ीं हों वह जागा हुआ। सफलताएँ तुम्हें तृष्णा देती है और उपलब्धियाँ तुम्हें तृप्ति से भरती है। ज़िंदा शरीर और मरी हुई आत्मा या ज़िंदा आत्मा और मरा हुआ शरीर दोनों ही अतृप्त रहते हैं। सिर्फ़ किसी एक को ही महत्व देना हमारे असंतोष का कारण होता है।शरीर की रुचि सफलता में होती है और आत्मा की उपलब्धि में।

अब देखो ना,मेरा शरीर भी असंतुष्ट ही समाप्त हो गया और मैं भी स्वतंत्र होने के बाद भी अतृप्त ही हूँ। जैसे तुमको अपने प्रमोशन के लिए आज प्रेज़ेंटेशन देना है वैसे ही मुझे भी अपने प्रमोशन के लिए आज से ही भागदौड़ करनी पड़ेगी। जैसे तुम्हारा शरीर प्रमोट होके कम्पनी का CEO बना चाहता है, वैसे ही तुम्हारी आत्मा भी प्रमोशन पा के परमात्मा बनना चाहती है। तुम अपनी आत्मा के प्रमोशन में सहयोग नहीं कर रहे हो,तो वो तुम्हारे प्रमोशन में अड़ंगा डालेगी।और ऐसे ही एक दिन मेरे शरीर के जैसा तुम्हारा शरीर भी नष्ट हो जाएगा लोग उसको अर्थी पर लाद देंगे। जीवन भर तुम चिंता में जलते रहे अंत में चिता में जला दिए जाओगे।

अर्थी का मतलब पता है ? मैंने उत्सुक मायूसी के साथ उस आत्मा की तरफ़ देखा और कहा की नहीं,नहीं पता। आत्मा ने मुस्कुराते हुए मेरी तरफ़ देखा और कहा जब जीवन से अर्थ की “इति” हो जाती है तब वो “अर्थी” कहलाता है। अचानक मेरी आँखों में घुआं घुसने लगा मैंने देखा की पड़ोसी का शरीर धुँधा कर आग में जल रहा है।और उसकी निश्चिन्त आत्मा, चिता से उठने वाले धूँए के साथ अपने भविष्य की चिंता लिए किसी दूसरे शरीर की तलाश में हवा में विलीन हो गई।

लेखक ~ फिल्म अभिनेता आशुतोष राणा

 यह पोस्ट फिल्म अभिनेता आशुतोष राना की फेसबुक पोस्ट से लिया गया है