लॉकडाउन : ठेले पर परिवार को बैठाकर घर के लिए पैदल ही निकला छोले-भटूरे वाला

कानपुर। लॉकडाउन में कोई पैदल तो कोई रिक्शे से ही अपने घर की ओर निकल पड़ा है। औरया के रहने वाने राजेश कुमार कानपुर से अपने परिवार को छोले भटूरे के ठेले पर बैठकर ही घर की ओर चल दिए। वह शुक्रवार दोपहर करीब 1:30 बजे औरैया के जालौन चौराहे से गुजरे तो पुलिस ने उन्हें रोक लिया। राजेश के काफी कहने के बाद भी पुलिस उन्हें आगे भेजने के लिए तैयार नहीं हुई।

मुहर दिखाई, कहा-कोरोना नहीं है
दिहाड़ी मजदूरों ने कहा कि बंगाल और झारखंड दोनों सीमा पर उनके स्वास्थ्य की जांच हुई है। रंजन ने हाथ दिखाते हुए कहा कि मुहर भी लगी हुई है। इसलिए कोई डरने की बात नहीं है। अमरजीत ने कहा कि जो भी मिनी बस चलती है वह इसलिए नहीं चढ़ाता है कहीं कोरोना का मरीज तो नहीं है।

कोलकाता से भरकर भेजा जा रहा दरभंगा
कोलकाता में दरभंगा के भी काफी मजदूर हैं। शुक्रवार को दो मिनी ट्रक पर लादकर इन लोगों को भागलपुर के रास्ते दरभंगा ले जाया गया। इस दौरान किसी भी मजदूरों के स्वास्थ्य की जांच नहीं की गई। दो दिन पहले भी कचहरी चौक पर मजदूरों को बिना जांच कराए ही भेज दिया गया था।

कोलकाता से 512 किमी पैदल चलकर पहुंचे भागलपुर
कोलकाता से 512 किमी का सफर पैदल चलकर भागलपुर पहुंचे सहरसा सोनवर्षा के 23 लोगों का गर्मी और भूख से बुरा हाल था। शुक्रवार को चिलचिलाती धूप में बायपास और फिर विक्रमशिला पुल को पार करना उनके लिए चुनौती थी। किसी के पांव में छाले पड़ गए थे तो कोई लंगड़ा कर चल रहा था। शाम ढलते-ढलते इन्हें महेशखूंट पहुंचना है। रात में आराम के बाद ये लोग शनिवार को सहरसा के लिए निकलेंगे।

हुगली जिले के नेताजी मोड़ भद्दोपट्टी में रहकर काम करने वाले दिलीप महतो बताते हैं कि 10 दिनों से कोई काम नहीं था। खाने के लिए कुछ नहीं मिल रहा था। जहां पर काम कर रहे थे, उसने जाने के लिए कह दिया। ट्रेन और बस नहीं चलने से उनलोगों ने पैदल ही घर पहुंचने को ठाना। 23 लोग एकजुट होकर निकल पड़े। रास्ते में बंगाल और झारखंड की पुलिस ने मदद की। खाने के लिए सामान दिया। रात में रुकने के लिए धर्मशाला की व्यवस्था कर दी। रंजन कुमार, सोने लाल, सुभाष, अमरजीत, अरुण महतो पत्थर-गिट्टी तोड़ने वाली मशीन पर काम करते हैं। उन्होंने बताया कि कोलकाता में बिहारी लोग खाने के लिए तरस रहे हैं। अगर हमलोग हिम्मत करके नहीं निकलते तो भूख से मर जाते।