इन दिनों हिंदी माध्यम के 5% से ज्यादा विद्यार्थी “प्रशासनिक सेवा परीक्षा” को पास नहीं कर पा रहे हैं क्या इसके लिए संघ लोक सेवा आयोग को दोष देना सही है?

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संघ लोक सेवा आयोग की प्रतिष्ठित सिविल सेवा परीक्षा में हिंदी मीडियम का दर्द- 2011 में प्रीलिम्स के लिए नया परीक्षा पैटर्न लाया गया। इसके द्वितीय प्रश्न पत्र जिसे csat कहा जाता है में अजीब तरह के प्रश्न थे। अजीब से आशय है जिसका सिविल सेवा से कोई मतलब नहीं। मेडिकल और इंजीनियरिंग के प्रतियोगियों ने बाजी मार ली और बड़े स्तर पर तैयारी करने वाले फेल हो गये। एक इंटरेस्टिंग चीज और थी- अनुवादित प्रश्नों की।

इन अनुवादों में इतनी गलतियां थी कि अंग्रेजी में कुछ और लिखा था और हिंदी में कुछ और। आयोग की नीति है कि अगर ऐसी कोई समस्या आती है तो जो अंग्रेजी में लिखा है उसे सही माना जायेगा। इस प्रश्न पत्र में एक बड़ी समस्या यह भी थी कि यह कम्प्यूटर द्वारा अनुवादित टिपिकल हिंदी था।

2012 में लगभग हिंदी माध्यम वालों ने तय किया कि प्रीलिम्स के प्रश्नों को दोनों भाषों में पढ़ेंगे और जो पैराग्राफ में प्रश्न हैं उन्हें अंग्रेजी में ही पढ़कर उत्तर देंगे। साथ ही इन अभ्यर्थियों ने आयोग और सरकार की इस अंग्रेजी परस्त नीति के खिलाफ आंदोलन करने का निर्णय लिया।

यह बिडम्बना ही है कि जिस देश में हिंदी राजभाषा का दर्जा पाए हुए है उसमें अभ्यर्थियों को अंग्रेजी में प्रश्न पढ़ने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। समय सीमित होता है और अनेक प्रश्न पूरे एक पेज तक कि लंबाई वाले होते हैं। हिंदी में गलत और कठिन अनुवादित प्रश्न होते हैं तथा अंग्रेजी वो उतनी तेजी से नहीं पढ़ सकते जितनी हिंदी मीडियम के अभ्यर्थी।

इसका दर्द एक व्यक्तिगत अनुभव से बताता हूँ-
2013 में मैं इस परीक्षा का मेंस दे रहा था। मेरा ऑप्शनल भूगोल था। वह पहली बार था जब वर्तमान का नया मेंस पैटर्न शुरू हुआ था। किसी को नहीं पता था कि कैसे और कितने प्रश्न पूछे जाएंगे। प्रश्नपुस्तिका के ऊपर ही लिखा था ” उत्तरों की शब्द सीमा का ध्यान रखा जाना चाहिए।”

अंदर देखा तो gs में कुल प्रश्नों की संख्या लगभग 30 थी( बिल्कुल अभी याद नहीं आ रहा लेकिन लगभग 30 थी)। कुल मिलाकर 5000 शब्द 3 घंटे में लिखने थे। इसी तरह लगभग ऑप्शनल में भी।

भूगोल के प्रश्न पत्र में एक प्रश्न आया “हृदय स्थल सिद्धान्त को बताएं।” मैंने समय के अनुकूल कार्य करते हुए उत्तर लिख दिया और आगे बढ़ गया। अंग्रेजी में उस प्रश्न को इसलिए नहीं पढ़ा क्यों कि लिखना अधिक था, समय कम था और अंग्रेजी मीडियम वालों को हिंदी नहीं पढ़ना होता था। कुछ प्रश्न और करने के बाद पुनः मेरे सामने प्रश्न आया “हृदय स्थल सिद्धान्त को बताएं।” अब मैंने उस प्रश्न को अंग्रेजी में पढ़ा और थोड़ी देर पहले पीछे जो यही प्रश्न कर के आया था वापस पन्ने पलट कर देखा। सन्न रह गया।

दोनों की हिंदी तो एक ही लिखी थी लेकिन अंग्रेजी में अलग था और जो पिछला प्रश्न मैं लिख चुका था वह दूसरा सिद्धान्त लिखना था। बता दूं कि इस परीक्षा में कॉपी ऐसी मिलती है जिसमें ऊपर प्रश्न छपा होता है और उसके नीचे जगह छूटी होती है जिसमें हमें अपना उत्तर लिखना होता है। मैनें उस जगह में गलत उत्तर लिख कर भर दिया था जबकि वह प्रश्न भी मुझे अच्छी तरह से आता था। मैंने न केवल एक प्रश्न बर्बाद किया था बल्कि उसे लिखने में अपने समय को भी। और अब जो मेरा मूड खराब हुआ वह अलग।

यह इकलौता प्रश्न नहीं था जिसका हिंदी गलत पूछा गया था। आयोग के लोग प्रश्न अंग्रेजी में बनाते हैं और कोई दूसरा अनुवादक उसे हिंदी में अनुवाद कर देता है। प्रश्न पत्र छाप दिया जाता है तथा ऊपर लिख दिया जाता है कि ” किसी भी समस्या के लिए प्रश्न के अंग्रेजी वर्जन को माना जायेगा।” यह अनुवाद कम्प्यूटरीकृत होता है जिसका शब्द और वाक्य-विन्यास हिंदी माध्यम के लिए केवल विनाशकारी होता है। 2013 से अब तक हर बार मुझे इस तरह के अनुवाद से हानि होती आयी है।

जो बातें अंग्रेजी में काफी आसान शब्दों में लिखी गई होती हैं वही हिंदी में इतनी कठिन कि हम समझ ही नहीं पाते और दुबारा उसे अंग्रेजी में पढ़ते हैं। मतलब समय की बर्बादी जो कि सिविल सेवा परीक्षा में बहुत सीमित होता है।

इन सबके अलावा न तो हिंदी में अच्छी किताबें हैं, न अच्छे नोट्स, और न ही अच्छी मैगज़ीन। सरकारी योजनाएं भी मंत्रालयों की वेबसाइट पर ठीक से अंग्रेजी में ही होती हैं। इसलिए हिंदी मीडियम को अपनी तैयारी का एक बड़ा हिस्सा अंग्रेजी में पढ़ना होता है। अब हम सिविल सेवा में जा रहे हैं तो अंग्रेजी से डर नहीं होना चाहिए। लेकिन हम उतनी तेजी से अंग्रेजी की किताबों को न तो पढ़ पाते हैं और न ही समझ पाते हैं। अगर अंग्रेजी हमें इतनी ही आती तो यहां यह लेख नहीं लिख रहा होता बल्कि मेरा मीडियम ही अंग्रेजी होता।

एक और बात करना चाहूंगा- अंग्रेजी और हिंदी की लिपि ऐसी है कि आप अंग्रेजी में लिखेंगे तो जल्दी लिख पाएंगे। क्योंकि एक तो 26 अक्षर ही होते हैं और दूसरे अक्षरों को एक में ही मिलाकर घसीट कर लिखा जाता है। हिंदी में कलम को एक ही शब्द में बार-बार उठाना पड़ता है।