कॉफी विद डी

निर्देशक : विशाल मिश्रा

कलाकार : सुनील ग्रोवर, जाकिर हुसैन, पंकज त्रिपाठी, दीपानिता शर्मा, अंजना सुखानी, राजेश शर्मा

फिल्म में बस पांच-दस मिनट का स्तरीय हास्य है और बाकी जो कुछ भी है वह सिनेमा का उपहास है. इस कॉमेडी फिल्म में अर्नब नामक पत्रकार बने सुनील ग्रोवर देश-दुनिया के सबसे खतरनाक डॉन, दाऊद इब्राहिम (जाकिर हुसैन) का इंटरव्यू लेने निकलते हैं.

पांच-दस मिनट का यह मनोरंजन तब मिलता है जब कई तिकड़में लगाने के बाद फिल्म के अंतिम हिस्से में सुनील ग्रोवर का किरदार दाऊद इब्राहिम का इंटरव्यू लेता है. सुनील बाकी की फिल्म की तरह यहां भी मिसफिट होते हैं. लेकिन जाकिर हुसैन एक कैरीकेचरनुमा किरदार की तरह गढ़े गए दाऊद इब्राहिम की उम्दा एक्टिंग करते हैं.

पंकज त्रिपाठी की ही तरह अपनी अभिनय प्रतिभा से न्याय करते हुए इस दौरान वे सधी संवाद अदायगी और हाथ की उंगलियों का दिलचस्प उपयोग करते नजर आते हैं. इस हिस्से को लिखा भी बाकी फिल्म से बेहतर गया है. फिल्म के लेखकों ने मैच फिक्सिंग से लेकर फिल्म पायरेसी, मुंबई बम ब्लास्ट, कंधार हाइजैकिंग जैसे दाऊद से जुड़े कई सारे आरोपों को बेहतर और मनोरंजक तरीके से इस सीक्वेंस में पिरोया है.

लेकिन काल्पनिक साक्षात्कार वाले ऐसे आइडिया और स्क्रिप्ट पर सिर्फ यूट्यूब वीडियो बनाया जा सकता है. एक पूरी मनोरंजक फिल्म गढ़ने के लिए खराब निर्देशन, बेहद खराब अभिनय, सस्ते हास्य, दोयम दर्जे की प्रोडक्शन वेल्यूज से दूर रहना पड़ता है. ‘कॉफी विद डी’ के कई सीन ऐसे लगते हैं जैसे किसी नाटक का मंचन होने से पहले कलाकार रिहर्सल कर रहे हों.

यूट्यूब पर जिसे पांच मिनट का वीडियो होना था, उसे दो घंटे की लंबाई देने का करामाती काम करने वाली फिल्म का ही नाम ‘कॉफी विद डी’ है.

अनेक दृश्यों में लिपसिंक और बोले जा रहे संवादों का तालमेल ‘तू चल मैं देर से आया’ की तर्ज पर होता है. फिल्म की सिनेमेटोग्राफी इतनी अपरिपक्व है कि जहां किरदारों के करीब जाकर एक्सप्रेशन्स को सही फ्रेम में कैद करना हो वहां लांग-शॉट से काम चलाया गया है. और न्यूज चैनल का दफ्तर सिर्फ तीन-चार लोगों द्वारा मिलकर खोला हुआ कोई स्टार्टअप ही नजर आता है!

सुनील ग्रोवर खासतौर पर निराश करते हैं. वर्तमान समय में शायद ही कोई अभिनेता/कॉमेडियन ऐसा है जो उनसे बेहतर बहुरुपिया बन पाता है. वे इतने अलग-अलग तरह के रूप अपने टेलीविजन शो में धर चुके हैं कि कई बार उनकी प्रतिभा पर विश्वास कर पाना मुश्किल हो जाता है. कपिल शर्मा के टीवी शो में कई बार वे सिर्फ एक तिरछी मुस्कान भर से लंबे-चौड़े डायलॉग के बराबर प्रभाव छोड़ जाते हैं.

लेकिन जब वे कोई रूप नहीं धरते और सुनील ग्रोवर बनकर ही परदे पर आते हैं, कोई प्रभाव नहीं छोड़ पाते. ऐसा उनकी पिछली फिल्मों में भी हुआ है लेकिन ‘कॉफी विद डी’ में खुलकर नजर आता है. दूसरे चरित्रों से संवाद स्थापित करने वाले दृश्यों में वे उस नवागंतुक टीवी एक्टर की तरह जड़ हो जाते हैं जिसे हजार एपीसोड़्स में एक ही एक्सप्रेशन देने के लिए साइन किया गया हो.

कॉफी विद डी में मालिश से चमकता उनका चेहरा जरूरत से ज्यादा गंभीरता ओढ़ता है, अटपटा अभिनय करता है और कई बार क्लोजअप शॉट में शाहरुख खान की याद दिलाता है. आखिरी दृश्यों में उन्हें चिल्ला-चिल्लाकर अभिनय करते देख यह यकीन करना मुश्किल हो जाता है कि यह वही एक्टर है जिसे कपिल शर्मा के शो पर परफार्म करते देखकर कई सुपरस्टार अवाक रह जाते हैं.

‘कॉफी विद डी’ ने एक इस वजह से भी निराश किया कि बहुरुपिया बन जाने में पारंगत होने के बावजूद सुनील ग्रोवर, अर्नब गोस्वामी के उस रूप को अपने किरदार में उतारने में नाकाम रहे जो इस फिल्म को हास्य की दुकान बना सकता था. द वायरल फीवर वाले ‘बेयरली स्पीकिंग विद अर्नब’ शो की तरह, जिसमें बिश्वपति सरकार ने अर्नब को एकदम कमाल ही तरीके से इमीटेट किया था. सुनील ग्रोवर ने यह नहीं किया और जो किया वो पसंद आ सके ऐसा कुछ नया एक ग्राम भी नहीं किया.