प्रियंका के एक फोन ने करवा दिया सपा-कांग्रेस में गठबंधन

काफी ऊठापटक के बाद आखिरकार समाजवादी पार्टी (सपा) और कांग्रेस ने मिलकर यूपी विधानसभा चुनाव में उतरने का साहसिक फैसला ले लिया है. ऐसे में हर किसी के जेहन में सवाल उठ रहे हैं कि भला ऐसा क्या हुआ कि लगभग टूट चुकी बातचीत के बाद सपा और कांग्रेस में गठबंधन हो गया? सूत्रों का कहना है कि इस अखिलेश यादव और प्रियंका गांधी के बीच हुई एक फोन कॉल के बाद इस गठबंधन पर मुहर लग गई. तय हुआ कि सपा 298 सीटों और कांग्रेस 105 सीटों पर चुनाव लड़ेगी.

सपा के कई नेता शुरू से ही कह रहे थे कि कांग्रेस का कोई भी बड़ा नेता इस गठबंधन के लिए सपा के शीर्ष स्तर के नेताओं से बातचीत नहीं कर रहे हैं. कांग्रेस की जिद्द के बाद शनिवार को सपा के कड़े रुख के बाद ऐसा लगा कि दोनों दल अलग-अलग चुनाव में उतरेंगे, लेकिन इस पूरे मसले में प्रियंका गांधी की एंट्री के बाद पूरा मामला पलभर में सुलझ गया.

सूत्रों का कहना है कि प्रियंका गांधी और अखिलेश यादव के बीच हुई बातचीत में तय हुआ है कि जिन सीटों पर कांग्रेस के विधायक हैं, सपा वहां से अपने उम्मीदवार वापस लेगी. साथ ही यह भी तय हुआ है कि राहुल गांधी और अखिलेश यादव मंच साझा कर सकते हैं.

प्रदेश कांग्रेस प्रभारी गुलाम नबी आजाद ने भी इस बात को मानते हुए कहा कि प्रियंका गांधी की पहल पर ही गठबंधन हो पाया. अखिलेश-प्रियंका की बातचीत से ही ये संभव हो पाया. इसके लिए हम उनका धन्यवाद करते हैं.
गठबंधन कराने में प्रशांत किशोर भी रहे फेल

मालूम हो कि सीटों को लेकर मतभेद गठबंधन को लेकर प्रशांत किशोर और धीरज श्रीवास्तव की मुलाकात अखिलेश से शनिवार शाम हुई थी, लेकिन उस बैठक में कुछ खास नतीजा नहीं निकला. रविवार को घोषणापत्र ऐलान के बाद अखिलेश की कई राउंड दिल्ली में राहुल गांधी और प्रियंका गांधी से बातचीत हुई, जिसके बाद आखिरकार गठबंधन पर सहमति बन गई.

शुरुआत में कांग्रेस ने 120 सीटें मांगी, लेकिन अखिलेश 100 सीटों से अधिक देने को तैयार नहीं थे. लेकिन जैसे—जैसे बात आगे बढ़ी, कांग्रेस को 105 और सपा को 298 सीटों पर जाकर सहमति हो गई.

रायबरेली ओर अमेठी के अलावा पश्चिम उत्तर प्रदेश की कई सीटों को लेकर गतिरोध बना हुआ था. दरअसल, कांग्रेस चाहती है कि इन जिलों की सारी सीटें गठबंधन के तहत कांग्रेस को मिले. वहीं समाजवादी पार्टी इस बात को इस आधार पर खारिज कर रही है कि वहां सपा के जीते विधायक हैं.

इससे पहले गठबंधन को लेकर आखिरी वक्त तक कांग्रेसी नेताओं ने उम्मीद नहीं छोड़ी थी. पार्टी के यूपी प्रभारी और महासचिव गुलाम नबी आजाद ने साफ किया कि वैसे तो पार्टी ने पहले और दूसरे चरण के प्रत्याशी फाइनल कर दिए हैं. इन सभी सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने की तैयारियां हो चुकी हैं, लेकिन बातचीत के रास्ते अभी बंद नहीं हुए हैं.

सात चरणों में होना है चुनाव
उत्तर प्रदेश में 11 फरवरी से 8 मार्च के बीच सात चरणों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं. कांग्रेस, राष्ट्रीय लोक दल और समाजवादी पार्टी के अखिलेश धड़े के बीच गठबंधन अगर होता भी है तो इसके बावजूद भी बहुकोणीय मुकाबला देखने को मिलेगा.

केंद्र में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने के बाद जिस तरह से बीजेपी को दिल्ली और बिहार में करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा है, वैसे में उत्तर प्रदेश का चुनाव प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है. मुख्यमंत्री चेहरे को सामने न लाकर एक बार फिर बीजेपी ने पीएम मोदी के चेहरे पर दांव खेला है. इसका कितना फायदा उसे इन चुनावों में मिलेगा वह 11 मार्च को सामने आ ही जाएगा.

यूपी विधानसभा में कुल 403 सीटें
इस बार उत्तर प्रदेश चुनावों में समाजवादी पार्टी में मचे घमासान के अलावा प्रदेश की कानून व्यवस्था, सर्जिकल स्ट्राइक, नोटबंदी और विकास का मुद्दा प्रमुख रहने वाला है. जहां एक ओर बीजेपी और बसपा प्रदेश की कानून व्यवस्था को लेकर अखिलेश सरकार को घेर रही हैं, वहीं विपक्ष नोटबंदी के फैसले को भी चुनावी मुद्दा बना रहा है.

यूपी विधानसभा में कुल 403 सीटें हैं. 2012 के विधानसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी ने 224 सीट जीतकर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी. पिछले चुनावों में बसपा को 80, बीजेपी को 47, कांग्रेस को 28, रालोद को 9 और अन्य को 24 सीटें मिलीं थीं.