इन 7 वजहों से बीजेपी ने एमसीडी में लगाई जीत की हैट्रिक

नई दिल्ली. 2014 में केंद्र में #नरेंद्र_मोदी के नेतृत्व में पूर्ण बहुमत की सरकार बनने के एक साल बाद 2015 में #भारतीय_जनता_पार्टी (बीजेपी) को दिल्ली में #करारी_हार झेलनी पड़ी थी. #अरविंद_केजरीवाल की पार्टी #आम_आदमी_पार्टी (आप) ने 70 में से 67 सीटें जीतीं जबकि बीजेपी 3 सीटों पर सिमट गई. देश में बीजेपी का नक्शा देखने पर भगवा रंगों के बीच दिल्ली एक सफेद निशान के रूप में नजर आ रही थी और बीजेपी यहां संघर्ष की भूमिका में आ गई थी. #दिल्ली_विधानसभा चुनाव के 2 साल बाद बीजेपी तीसरी बार राजधानी में एमसीडी चुनाव जीतने में कामयाब रही है. आइए जानते हैं कि वो क्या वजहें रहीं जिनसे बीजेपी ने एमसीडी में लगाई जीत की हैट्रिक… ( http://bit.do/dpiz9 )

पार्षदों को टिकट नहींः एमसीडी चुनाव से एक महीने पहले, दिल्ली बीजेपी अध्यक्ष और उत्तर पूर्व दिल्ली से पार्टी सांसद मनोज तिवारी ने यह ऐलान कर सभी को हैरान कर दिया कि बीजेपी अपने 138 पार्षदों में से किसी को भी टिकट नहीं देगी. सूत्रों ने बताया कि एमसीडी में खतरे को भांपते हुए बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने यह रणनीति तय की थी. बीजेपी यह समझ रही थी कि जनता एमसीडी में उसके 10 साल के शासन से खुश नहीं थी. पार्षदों को टिकट नहीं देने के अपने फैसले से बीजेपी ने मास्टरस्ट्रोक खेला. इसने सिर्फ एंटी इनकमबेंसी से लड़ने में पार्टी की मदद ही नहीं की बल्कि बीजेपी के पार्षदों के खिलाफ मोर्चा खोलने की तैयारी करके बैठे आप और कांग्रेस को भी मूक कर दिया.

मोदी बनाम अन्य की लड़ाईः बीजेपी ब्रैंड नरेंद्र मोदी की ताकत समझ रही थी. पार्टी ने प्रधानमंत्री की छवि और उपलब्धियों पर ध्यान दिया और बताने की कोशिश की कि मोदी की तुलना में आप और कांग्रेस नेताओं के पास कोई नेता नहीं है. आप के खिलाफ गुस्से को भुनाने के लिए बीजेपी ने एमसीडी को नरेंद्र मोदी सरकार के जनमत संग्रह के रूप में प्रस्तुत किया. इसने आप के कैंप में दर्द पैदा कर दिया. केजरीवाल ने एक इंटरव्यू में कहा भी था, ‘मैं बता देना चाहता हूं कि मोदीजी एमसीडी को नहीं चलाएंगे… एमसीडी को मैं चलाउंगा.’

पंजाब-गोवा का बुरा असरः दिल्ली के राजौरी गार्डन में आप कैंडिडेट की हार के बाद डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया ने कहा कि पूर्व विधायक जनरैल सिंह के पंजाब चले जाने से जनता गुस्से में थी. यह सिर्फ एक विधायक की बात नहीं है. पूरी पार्टी का चेहरा अरविंद केजरीवाल भी दिल्ली की जनता से 2015 में किए गए वादों को भुलाते दिखाई दिए. पंजाब में केजरीवाल को सीएम बनाए जाने के कुछ नेताओं के बयान ने दिल्ली की जनता को गुस्सा दिलाया. यह केजरीवाल के दूसरे विश्वासघात जैसा था. पहला वह 2014 में 49 दिन के सीएम बनने के बाद इस्तीफा देकर कर चुके थे.

हार का ठीकरा चुनाव आयोग परः चुनाव आयोग पर अरविंद केजरीवाल के सवाल उठाए जाने को एक संवैधानिक प्रतिष्ठान के अपमान के तौर पर देखा गया. एक संवैधानिक प्रतिष्ठान जिसने सालों से जनता का भरोसा हासिल किया था, उसपर सवाल उठने से जनता की नाराजगी बाहर आई. आप एक ऐसे हारे हुए खिलाड़ी के रूप में सामने आई, जो रेफरी को हार का जिम्मेदार ठहरा रही थी. आप ऐसी अहंकारी पार्टी के रूप में उभरी जो पंजाब-गोवा में हार पर आत्ममंथन को तैयार नहीं थी.

आप का नकारात्मक प्रचारः 2015 में आप की भारी जीत की बड़ी वजह अरविंद केजरीवाल का पार्टी को पीड़ित के तौर पर दिखाना भी था. लेकिन आज जनता केजरीवाल को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है, जो दो साल से सीएम हैं, पीड़ित के तौर पर… अगर बीजेपी जीतती है तो और डेंगू फैलेगा… ऐसे बयानों ने केजरीवाल के लिए नकारात्मक प्रचार का काम किया. प्रचार पोस्टर में विजेंद्र गुप्ता की छापी गई तस्वीर भी आप के खिलाफ गई.

आप सरकार में उथल-पुथलः मोहल्ला क्लीनिक, निजी स्कूलों में फीस का रेग्युलेशन, बिजली-पानी के बिल में कमी जैसी अपनी स्कीम्स पर फोकस करने की बजाय अरविंद केजरीवाल ने केंद्र और लेफ्टिनेंट गवर्नर से ट्रांस्फर और आरोप प्रत्यारोप पर झगड़े में वक्त बर्बाद किया. इसका परिणाम यह हुआ कि सरकार संकट में रही और उथल-पुथल का दौर बना.

कांग्रेस में भीतरघातः एमसीडी चुनाव कांग्रेस के लिए वापसी करने का मौका थे लेकिन पार्टी के कई पुराने नेताओं ने अजय माकन के नेतृत्व को स्वीकार नहीं किया. आपसी झगड़े को भूलकर पार्टी बहुत कुछ कर सकती थी. प्रमुख नेता शीला दीक्षित, एके वालिया, हारुन यूसुफ प्रचार अभियान से दूर रहे. टिकट बंटवारे से नाराज होकर वरिष्ठ नेता अरविंदर सिंह लवली ने पार्टी ही छोड़ दी.