लखनऊ: सरकार ने सेस वसूली के लिए जीआईएस सर्वे पर लगाई रोक

लखनऊ। उत्तर प्रदेश सरकार ने सेस वसूली के लिए जीआईएस (जियोग्राफिकल इन्फारमेशन सिस्टम) सर्वे का इस्तेमाल करने पर रोक लगा दी है। प्रदेश के पांच जिले लखनऊ, कानपुर नगर, मेरठ, गाजियाबाद और नोएडा में प्रयोग के तौर पर चार कंपनियों को नए बने मकानों का सर्वे करने का काम सौंपा गया था। सर्वे के अनुसार नए बने मकानों की जारी की गई नोटिसों में तमाम गड़बड़ियां पाई गईं।

अधिकारी बताते हैं कि जिन मकान मालिकों ने सेस का भुगतान कर दिया और जिन्होंने मकान नहीं बनाया उन्हें नोटिस दे दी गई। मकान का कम और ज्यादा मूल्यांकन कर सेस वसूली में अनियमितताएं पाई गईं। नोएडा और गाजियाबाद में तो करीब तीन लाख नोटिसें घर-घर पहुंचा दी गईं।

नोएडा व गाजियाबाद समेत इन पांचों जिलों में जारी हुई 10 लाख नोटिसों में बड़ी तादाद में गड़बड़ियां पाई गईं। मचे हड़कंप की गूंज मुख्यमंत्री कार्यालय तक पहुंची। इसके बाद सरकार ने इन जिलों में तो जीआईएस सर्वे पर रोक लगा दी। इसके साथ ही जीआईएस सर्वे आगे अन्य जिलों में न कराने का फैसला किया है।

भवन की लागत का एक फीसदी सेस की वसूली
भवन निर्माण में लगे श्रमिकों की कल्याणकारी योजनाओं का लाभ श्रमिकों को देने के लिए श्रम विभाग के तहत उत्तर प्रदेश भवन एवं अन्य सन्निर्माण कर्मकार कल्याण बोर्ड 10 लाख की कीमत से ऊपर के निर्माणाधीन सरकारी व निजी भवनों से कुल लागत का एक फीसदी सेस की वसूली करता है। प्रदेश सरकार के आदेश के तहत विकास प्राधिकरण में नक्शा पास कराने के दौरान एक फीसदी सेस की वसूली करते हैं।

नोटिसें भी पहुंचाने लगीं ये कंपनियां
साल 2016 में शासन स्तर पर लखनऊ, कानपुर नगर, मेरठ, गाजियाबाद और नोएडा में जीआईएस सर्वे कराकर सेस वसूली का फैसला लिया गया था। लखनऊ में सर्वे के लिए एचबीटीआई, कानपुर नगर में सीआईडीसी, नोएडा में आईटीआई और मेरठ व गाजियाबाद में मिलेनियम टेलीकॉम को जीआईएस सर्वे का काम सौंपा गया।

इन कंपनियों को 2009 के बाद से बने नवनिर्मित भवनों का सर्वे कराकर रिपोर्ट कर्मकार कल्याण बोर्ड को देनी थी। कपंनियां बोर्ड के साथ अनुबंध के विपरीत रिपोर्ट के आधार पर नोटिस भी घर-घर पहुंचाने लगीं। कंपनियों वे काम करने लगीं, जो उन्हें नहीं करना था। गड़बड़ी यहीं से शुरू हुई। बड़ी तादाद में नोटिसें गलत पाई गईं।