सरकारी मुआवजे से किसानों को राहत क्यों नहीं मिलती?

फसल बर्बाद होने पर किसानों को मुआवजा देने वाली सरकारी व्यवस्था में इतने पेंच हैं कि फिलहाल इससे किसानों को राहत मिलना मुमकिन नहीं है

जब खेती-किसानी की बात हो तो हमारे देश में पहले आपदा आती है और इसके बाद राजनीतिक बयान आने लगते हैं. यानी राजनीति शुरू हो जाती है. इस साल कई राज्यों में लगातार तीसरी फसल तबाह हुई है. खरीफ की यह फसल सूखे की वजह से तबाह हुई. बीते महीनों में हमने देखा कि केंद्र की राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार किसानों को राहत देने और सहायता राशि उपलब्ध कराने के दावे करने में व्यस्त रही है.
कांग्रेस के लिए भी यह एक राजनीतिक मौका है. उसने घोषणा की है कि इस महीने के अंत तक पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी उत्तर प्रदेश के सूखाग्रस्त बुंदेलखंड का दौरा करेंगे. लेकिन दावों-घोषणाओं के बीच जमीनी स्तर पर किसान अब भी कुछ ठोस राहत पाने का इंतजार कर रहे हैं.

जब सूखा पड़ता है तो इससे हुए नुकसान और राहत राशि को आंकने के राज्यों के अलग-अलग तरीके हैं जो किसानों तक जरूरी राहत पहुंचाने की दिशा में बड़ी बाधा साबित होते हैं

इसबार मॉनसून कमजोर रहने से देश के दस राज्यों ने अपने को आंशिक या पूर्ण रूप से सूखाग्रस्त घोषित किया है. भारत की कुल भूमि का 40 फीसदी या कुल 676 जिलों में से एक तिहाई इसबार सूखा प्रभावित हैं.
बीते पखवाड़े में केंद्र सरकार ने दस में से सात राज्यों को राहत उपलब्ध कराने का आश्वासन दिया है. दिसंबर में उसने महाराष्ट्र को 3,050 करोड़ रुपये के अनुदान को मंजूरी दी है. महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फणनवीस ने इसे ‘महाराष्ट्र को केंद्र सरकार से अब तक मिली सबसे बड़ी राहत राशि’ बताते हुए प्रधानमंत्री का आभार जताया है. कुछ दिन बाद छह जनवरी को केंद्र ने उत्तर प्रदेश को 1,304 करोड़ रुपये का अनुदान देने की घोषणा की तो राज्य सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों की तरफ से उसे भारी आलोचना का सामना करना पड़ा. उनके मुताबिक राशि कहीं से भी पर्याप्त नहीं कही जा सकती. इससे पहले पिछले साल जब 15 राज्यों में बेमौसम बारिश और ओले पड़ने से रबी की फसल खराब हुई थी तब भी राज्य सरकारों ने केंद्र पर अपर्याप्त और बिना सोचे-समझे अनुदान बांटने का आरोप लगाया था. केंद्र सरकार के दावे और उसपर इस तरह के आरोप कोई नई बात नहीं हैं. ऐसे में कुछ सवाल अपने आप उठते हैं, जैसे : राज्यों को मिलने वाली राहत का पैमाना क्या होता है? मुआवजा या राहत केंद्र सरकार के विवेक पर कितना निर्भर है? क्या फसलों के बर्बाद होने के बदले दिया जाने वाला मुआवजा पर्याप्त माना जा सकता है?
राहत राशि देने के लिए केंद्र और राज्य की व्यवस्थाएं
किसी भी तरह की आपदा के बाद राहत देने की प्राथमिक जिम्मेदारी राज्य सरकारों की होती है. इसके लिए पैसे दो स्रोतों से आते हैं – राष्ट्रीय आपदा राहत कोष और राज्य आपदा राहत कोष. पहले में पूरी तरह केंद्र सरकार का योगदान होता है. दूसरे में केंद्र का 75 फीसदी और 25 फीसदी राज्य का योगदान होता है (विशेष वर्ग में शामिल राज्यों के लिए यह अनुपात 90:10 का है).

किसी भी तरह की आपदा के बाद राहत देने की प्राथमिक जिम्मेदारी राज्य सरकारों की होती है. इसके लिए पैसे दो स्रोतों से आते हैं – राष्ट्रीय आपदा राहत कोष और राज्य आपदा राहत कोष

राज्य आपदा राहत कोष में कुल कितनी राशि होगी यह आंकड़ा राज्यों के हिसाब से अलग-अलग होता है. हर पांच साल में गठित होने वाला वित्त आयोग तय करता है कि आपदा राहत कोष में प्रति वर्ष कितनी राशि होनी चाहिए. आयोग ही वह व्यवस्था तय करता है जिसके मुताबिक केंद्र के द्वारा राज्यों को राहत राशि मिलनी है.
जब प्राकृतिक आपदाएं आती हैं तो यह अपेक्षा की जाती है कि राज्य अपने कोष का इस्तेमाल करेगा. यदि आपदा बहुत बड़ी है तो राज्य केंद्र सरकार से अतिरिक्त वित्तीय मदद और राष्ट्रीय आपदा राहत कोष से अन्य संसाधनों की मांग करता है. 13वें वित्त आयोग (2010-2015) ने राष्ट्रीय आपदा राहत कोष के लिए 33,580.9 करोड़ रुपयों की व्यवस्था की थी. वहीं पिछले यानी 14वें वित्त आयोग ने तकरीबन दोगुने – 61,219 करोड़ रुपये की व्यवस्था राष्ट्रीय राहत आपदा कोष के लिए की है.
आपदा से नुकसान के आकलन के तरीके
जब सूखा पड़ता है तो इससे हुए नुकसान और राहत राशि को आंकने के राज्यों के अलग-अलग तरीके हैं. इसके लिए किस प्रशासनिक इकाई को लिया जाएगा इसमें भी राज्यों के बीच अंतर है. कुछ राज्य ब्लॉक स्तर पर नुकसान आंकते हैं तो कुछ संभाग या जिले को इसका आधार बनाते हैं. राज्य का राजस्व विभाग जब केंद्रीय कृषि मंत्रालय के सामने अपनी रिपोर्ट पेश कर देता है तब मंत्रालय की एक टीम राज्य का दौरा करती है और देखती है कि केंद्र के नियमों के हिसाब से राज्य द्वारा नुकसान का आकलन कितना सही है.
इसके बाद मंत्रालय राष्ट्रीय आपदा राहत कोष से राज्यों को अनुदान की मंजूरी देता है और इसके पहले गृह मंत्रालय के तहत आने वाले राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण और वित्त मंत्रालय के उच्चाधिकारियों से मिलकर बनी समिति भी इसे मंजूरी देती है. अंत में राहत राशि चेकों के माध्यम से किसानों के बीच बांटी जाती है. राशि कितनी होगी यह इस बात पर निर्भर करता है कि किसान की कितनी फीसदी फसल बर्बाद हुई है. हालांकि यहां भी राज्य किसानों के नुकसान का आकलन अलग-अलग पैमानों पर करते हैं.

उत्तर प्रदेश में पटवारी खेत देखकर अनुमान लगाते हैं कि किसान का कितना नुकसान हुआ और इसी आधार पर जिला स्तर और राज्य स्तर पर नुकसान का आंकड़ा निकाला जाता है

पिछले साल नवंबर में दिल्ली स्थित संगठन सेंटर फॉर साइंस एंड एनवॉयरमेंट (सीएसई) ने एक रिपोर्ट जारी की थी. इसके मुताबिक उत्तर प्रदेश की न्याय पंचायतों ( एक न्याय पंचायत में छह से सात पंचायत होती हैं) में पटवारी की ‘आंखों से अनुमान’ यानी उसने खेत की फसल देखकर जो अनुमान लगाया, के आधार पर नुकसान का आकलन किया गया. सीएसई की टीम ने पाया कि पटवारी के साथ कृषि विभाग का तकनीकी अधिकारी भी होना चाहिए लेकिन व्यवहार में ऐसा नहीं हुआ. पटवारी ने फिर गिरदावरी (रकबे का रिकॉर्ड) के आधार पर तहसीलदार को अपनी रिपोर्ट दी. जिले के अलग-अलग हिस्सों के आधार पर फिर जिला स्तर का आंकड़ा तैयार किया गया और फिर इनसे मिलकर राज्य स्तर पर नुकसान का आंकड़ा निकाला गया.
दूसरे अन्य राज्य भी नुकसान का जायजा के लेने के लिए यही पटवारी की ‘आंखों से अनुमान’ वाली पद्धति उपयोग में लाते हैं. हालांकि राजस्थान में हर किसान से उसकी फसल का ब्योरा अलग से लिया जाता है और राज्य में हुआ कुल नुकसान इस आंकड़े के आधार पर तय किया जाता है. यह इसलिए भी जरूरी होता है कि पटवारियों के लिए निश्चित समयसीमा में हर पंचायत के हर किसान का रकबा देखना संभव नहीं हो पाता.
महाराष्ट्र में सरकारी अधिकारियों का कहना है कि वे दो तरीके प्रयोग करते हैं. पहला है आंखों देखी अनुमान और दूसरा है फसल की उत्पादकता. ओस्मानाबाद जिले के एक राजस्व अधिकारी हमें बताते हैं, ‘खरीफ सीजन की शुरुआत में ग्राम समिति जिसमें पटवारी, कृषि सहायक, पुलिस पाटिल और सरपंच शामिल हैं, फसलों के देखकर उसका जायजा लेते हैं. फिर एक महीने बाद वे फिर दौरा करते हैं कि फसलें ठीक हुईं या और खराब हो गईं.’ मराठवाड़ा के इस जिले में 737 गांव हैं और इसबार इन सभी गांवों में 50 फीसदी से ज्यादा फसल बर्बाद हुई है. राजस्व अधिकारी अपनी बात आगे बढ़ाते हैं, ‘इसके बाद कृषि विभाग देखता है कि उत्पादकता क्या रही. इस आधार पर आकलन किया जाता है कि उत्पादन 50 फीसदी से ज्यादा रहा या कम और इसी आधार पर जिले के हर गांव की रिपोर्ट तैयार की जाती है.’

नुकसान मापने के लिए चाहे प्रशासनिक इकाइयों के निर्धारण की बात हो या उसके तरीके की, हमारे यहां कोई एक मानक व्यवस्था नहीं है इसलिए राज्य और केंद्र एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाते रहते हैं

नुकसान मापने के लिए चाहे प्रशासनिक इकाइयों के निर्धारण की बात हो या उसके तरीके की, हमारे यहां कोई एक मानक व्यवस्था नहीं है और यही वजह है कि राज्य और केंद्र एक दूसरे पर राहत राशि देने के मामले में आरोप-प्रत्यारोप लगाते रहते हैं.
राहत या मुआवजा
ज्यादातर राज्य सरकारें कहती हैं कि राष्ट्रीय राहत कोष से कोई राहत नहीं मिलती.
पिछले साल अप्रैल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्राकृतिक आपदा से फसल बर्बाद होने वाले किसानों के लिए मुआवजा राशि बढ़ाई है. मुआवजा पाने के लिए दावे करने के नियमों में भी ढील दी गई है. अब उन किसानों को भी मुआवजा मिल सकता है जिनकी कम से कम 33 फीसदी फसल का नुकसान हुआ है. इससे पहले यह सीमा 50 फीसदी थी. सिंचित क्षेत्रों में मुआवजे की रकम 9000 से बढ़ाकर 13,500 प्रति हेक्टेयर की गई है. लेकिन प्रति किसान दो हेक्टेयर जमीन से ज्यादा पर यह मुआवजा नहीं दिया जा सकता.
लेकिन क्या यह मुआवजा पर्याप्त कहा जा सकता है? राजस्व और कृषि अधिकारी इस सवाल का जवाब ‘न’ में देते हैं. इस समय खेती की लागत देखते हुए वे इसे पर्याप्त नहीं मानते. राजस्थान के एक राजस्व अधिकारी कहते हैं, ‘हालांकि सरकार ने राहत राशि बढ़ा दी है लेकिन जमीन पर देखें तो इसका मतलब है कि प्रति बीघा किसानों को अब 2,200 रुपये के बदले 3,300 रुपये मिलेगा. पुरानी दर 1982 से 2015 तक लागू थी. नई दर के हिसाब से मुआवजे की अधिकतम सीमा 27,000 हो गई है. लेकिन अब भी ज्यादातर मामलों में यह रकम खाद, बीज या फिर मजदूरी की लागत पूरी नहीं करती.’
खेती की बढ़ी हुई लागत के साथ यदि हम बीते सालों में महंगाई के अनुपात में मुआवजा राशि देखें तो भी हमें यही नतीजे दिखते हैं. केंद्र सरकार इस बात का श्रेय ले रही है कि उसने सूखा राहत राशि को 50 फीसदी बढ़ा दिया. लेकिन मुद्रास्फीति के आंकड़े बताते हैं कि 1982 के 2,200 रुपये की कीमत आज 20,209 रुपयों के बराबर हो गई है. यह 820 प्रतिशत की बढ़ोतरी है. यही वजह है कि सरकार द्वारा राहत राशि के नाम पर बांटे जानेवाले चेकों से किसानों को कोई खास राहत नहीं मिलती लेकिन राजनीतिज्ञों को यह जताने का मौका जरूर मिल जाता है कि वे किसानों के कितने बड़े हितैषी हैं.
शायद यही वजह है कि ‘सूखा मुआवजा’ के आसपास होने वाली राजनीति को देखते हुए भारतीय मौसम विभाग ने घोषणा की है कि वह अब बारिश में भारी कमी के लिए ‘सूखा’ शब्द का इस्तेमाल नहीं करेगा. अब देश में ‘कम वर्षा वाला साल’ और ‘सामान्य से बहुत कम वर्षा वाला साल’ जैसे शब्द ही इस्तेमाल होंगे. हालांकि इससे किसानों की मुसीबतें कितनी कम होंगी यह नहीं कहा जा सकता.
अनुमेहा यादव – सत्याग्रह