बरसात का मौसम आते ही जनजीवन हुआ नर्क

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✍ आशीष शुक्ला

ह सही है कि जितना धन विकास कार्यों के नाम पर हर साल खर्च हो रहा है उसका आधा पचास फीसदी तो भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है। पचास फीसदी यानी आधी रकम से जो कार्य होते हैं उनकी मजबूती व गुणवत्ता का अंदाजा खुद लगाया जा सकता है। जलनिकासी के लिये जिन नालियों या नालों का निर्माण कराया जा रहा है वह दो चार साल में ही टूटकर बेकार हो जाती हैं। नालियां सफाई न होने से बरसात शुरू होते ही बजबजाने लगी हैं और उन नालियों की गंदगी व कीड़े वातावरण को प्रदूषित करने लगे हैं।

गाँवों में सफाई कर्मियों के न जाने से गाँव में गंदगी तो रहती ही है साथ ही स्कूलों की सफाई बच्चों या शिक्षकों को करनी पड़ती है। चालीस से पचास फीसदी ऐसे सफाई कर्मी हैं जो सिर्फ गाँव के स्कूलों की सफाई करके अपने कर्तव्यों की इति श्री कर लेते हैं। नब्बे फीसदी गाँव ऐसे हैं जहाँ पर कभी भी सफाई कर्मी नहीं जाते हैं और जिला व ब्लाक स्तर पर अधिकारियों की गणेश परिक्रमा लगाते रहते हैं। अधिकांश पढ़ें लिखे सफाई कर्मचारियों द्वारा अपने स्थान पर मजदूरों को तैनात कर रखा है और उन्हें प्रतिमाह अपने वेतन से उन्हें मजदूरी देते हैं।

बरसात का पानी तालाबों तक न पहुँचकर आबादी में तबाही मचाने लगता है फलस्वरूप बरसात के बावजूद इन तालाबों में पानी नहीं भर पाता है। जलनिकासी नालियों का निर्माण भी कुछ इस तरह होता है कि उनका लेविल ऊँचा होने से बरसाती पानी जल्दी उसमें पहुँच ही नहीं पाता है और अगर पहुँच भी जाता है तो उनकी सफाई न होने से सारा पानी इधर उधर फैलने लगता है। गिरते जल स्तर को यथावत बनाये रखने तथा जलभराव समस्या निदान के लिये अरबों रूपये अबतक खर्च करके तालाबों की खुदाई तो कराई गयी है किन्तु उनमें अधिकांश तालाब जल ग्रहण करने की स्थिति में नहीं हैं।

महानगरों में इस समय दस दस फुट पानी सड़कों गलियों मुहल्लों में भरा है। शहरों में जलभराव की समस्या भी जलनिकासी न हो पाने से पैदा हुयी है। जलनिकासी इसलिए नहीं हो पा रही है क्योंकि उनकी सफाई नहीं हुयी है। जब बरसात के पहले नालियों नालों सीवरों की सफाई नहीं होगी तो बरसात में तो वह छोक हो ही जायेगें।

न गाँवों की नालियां साफ हो पा रही है और न ही शहरों की साफ हो पा रही है। हर साल जलभराव व गंदगी के चलते संक्रामक व अन्य बीमारियों से तमाम लोगों की जान तक चली जाती है। हर स्तर पर जिम्मेदारी तय करके जलनिकासी नालियों व नालों सीवरों का निर्माण होना चाहिए। रोजाना नहीं तो कम से कम महीने में एक बार तो सफाई होनी ही चाहिए जबकि शहरों में सीवरों नालों नालियों की साप्ताहिक सफाई होनी चाहिए।