उज्जैन में संतों की ‘गोमूत्र व गोबर’ वाली दिगंबर होली
रंगों के त्योहार होली का अपना अलग मिजाज है और देश भर में अलग-अलग तरीके से होली खेलने का रिवाज है। कहीं रंगों से होली खेली जाती है तो कहीं गुलाल उड़ाकर रंगों का त्योहार मनाया जाता है। कहीं लड्डू मार होली खेली जाती है तो कहीं धुलेंडी मनाई जाती है। पर उज्जैन में साधु संत दिगंबर होली खेलेंगे। जिसमें सभी नंगे होकर एक दूसरे के साथ गोबर के साथ होली मनाते हैं। साधु-संतों के मुताबिक दिगंबर होली उनकी परंपरा है। साधु-संतों ने होली की तैयारी भी शुरू कर दी है।
अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के प्रमुख नरेंद्र गिरी ने इस बारे में जानकारी देते हुए बताया, ‘गाय के गोबर और गोमूत्र के साथ होली खेलने की हमारी परंपरा काफी पुरानी है और हम लंबे वक्त से इसका पालन करते आ रहे हैं। यहाँ १३ अखाड़ों के संतों ने एक साथ मिलकर ये फैसला लिया है। भारतीय संस्कृति में गाय का महत्त्व का सन्देश भी लोगों तक पहुंचेगा।
अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष हर सिंहस्थ वाले साल उज्जैन को साधु संतों की इस दिगंबर होली को देखने का सौभाग्य मिलता है। उनके मुताबिक क्या वैष्णव और नागा संन्यासी सभी ये दिगंबर होली खेलते हैं। इस तरह की होली खेलने में उनमें कोई बुरा नहीं मानता है। सभी अपना सौभाग्य समझते हैं। जो संत वृद्ध या बीमार होते हैं उन्हें गाय के गोबर का टीका लगाकर होली मनाई जाती है।
उज्जैन में राजाधिराज अवन्तिका नाथ बाबा महाकाल खेलते है सबसे पहले होली 
महाकाल में होली राजाधिराज अवन्तिका नाथ बाबा महाकाल सबसे पहले होली खेलते है । सबसे पहले महाकाल के दरबार में होली जलाई जाती है। संध्या आरती में भक्तों ने फूलों गुलाल उड़ाकर भगवान के संग होली खेलते है। गर्भगृह में भांग-सूखे मेवे और चांदी के आभूषणों से सुसज्जित महाकाल की झांकी के साथ रोज भस्मी रमाने वाले भूतभावन जब रंग-गुलाल से सराबोर होते हुए आरती में सैकड़ों लोग उमड़ पड़ते है और महाकाल को देखने का नजारा अलग ही रहता है आप प्रभु को अपलक निहारते ही रह जायेंगे। होली पर एक दिन पहले से ही शहर में होलिका दहन के साथ रंग-गुलाल उड़ना शुरू हो जाता है।
शास्त्रोक्त विधि से यहाँ बनाई जाती है अतिप्राचीन “होली
विश्व की सबसे बडी और अतिप्राचीन “होली” लगभग 5000 गाय के शुद्ध कण्डो से निर्मित जो की देवताओ की नगरी अवन्तिका (उज्जैन) के सिह्पुरी क्षैत्र मे बनाई जाती हे । और सबसे खास बात यह हे के इसे आज भी शास्त्रोक्त विधि से प्रातः 4 बजे चकमक के पत्थरो की रगड से उत्पन्न चिन्गारि से जलाया जाता हे । सिंहपुरी में विश्व की सबसे प्राचीन होली पर्यावरण संरक्षण आैर संवर्धन का भी संदेश देती है। वनों को बचाने के लिए यहां लकड़ी से नहीं, बल्कि गाय के गोबर से बने कंडों से होलिका का दहन किया जाता है।
सिंहपुरी की होली विश्व में सबसे प्राचीन आैर बड़ी है। पंं. व्यास के अनुसार सिंहपुरी की होली में राजा भर्तृहरि भी शामिल होते थे। यह होली राजा के देखरेख में तैयार होती थी। होलिका के ऊपर लाल रंग की एक ध्वजा भी भक्त प्रहृलाद के स्वरूप में लगाई जाती थी जो आज भी चलन में है। यह ध्वजा जलती नहीं है, जिस दिशा में यह ध्वजा गिरती है, उसके आधार पर ज्योतिष मौसम, राजनीति आैर देश के भविष्य की गणना करते हैं।
समस्त पाठकों को होली की शुभकामनायें