सुविधाएँ लेता रहा, वोट देता रहा, ग़रीब तो ग़रीब बना रहा

बाबासाहेब आम्बेडकर ने 1949 में संविधान सभा में अपने एक भाषण में राजनीति में ‘भक्ति’ का सवाल उठाया था. क्या कहा था आम्बेडकर ने और क्यों कहा था? आम्बेडकर ने कहा था कि धर्म में भक्ति भले ही आत्मा को मोक्ष प्रदान करती हो, लेकिन राजनीति में भक्ति दुर्दशा और अन्ततः तानाशाही ही लाती है. आम्बेडकर ने गाँधी को कभी न ‘महात्मा’ माना और न कहा.

लोकतंत्र व्यक्तियों का या परिवारों का तंत्र नहीं होता. लेकिन कम्युनिस्ट पार्टियों को छोड़ कर समूचे देश में लोकतंत्र के प्रतीक या तो कुछ व्यक्ति हैं या कुछ परिवार! यही वह दुर्दशा है, जिसके ख़तरे से आम्बेडकर 1949 में देश की संविधान सभा को आगाह करा रहे थे. तब किसी ने उस पर ध्यान नहीं दिया. तब से चली आ रही उसी दीर्घ ‘भक्ति-परम्परा’ का नतीजा है कि आज सड़सठ साल बाद हम लोकतंत्र को कुछ व्यक्तियों और परिवारों की निजी दुकानदारी में बदलते देख रहे हैं. क्या यह वाक़ई लोकतंत्र की दुर्दशा नहीं है?

बीजेपी में नेताओं की कमी नहीं, लेकिन नरेन्द्र मोदी के बिना बीजेपी कहाँ? वह भारत के लिए ‘ईश्वर की देन’ हों न हों, इस पर सबकी अलग-अलग राय हो सकती है, लेकिन बीजेपी के लिए तो वह वाक़ई ‘ईश्वर की देन’ ही साबित हुए हैं. लेकिन मोदी के बाद बीजेपी में ऐसा कौन है, जो पार्टी को ऐसी सफलता दिला सकने का माद्दा रखता हो? काँग्रेस, समाजवादी पार्टी, द्रमुक, टीआरएस और अकाली दल जैसी पार्टियाँ अगर एक व्यक्ति नहीं, तो एक परिवार पर केन्द्रित हैं.

मार्केटिंग, पैकेजिंग और ब्रांडिंग
इसीलिए समूची राजनीति आज मार्केटिंग, पैकेजिंग और ब्रांडिंग के नियमों से चलने लगी है. नारे कैसे आकर्षक हों, मुद्दों को किस तरह के रैपर में पेश किया जाये, नेता के कपड़े कैसे हों, चाल-ढाल, संवाद, बॉडी लैंग्वेज, एटीट्यूड कैसा हो, नेता की कैसी चित्ताकर्षक और महान छवि गढ़ी जाये, विरोधियों को कैसे निखट्टू सिद्ध किया जाये, यह सब कारपोरेट मार्केटिंग के तौर-तरीक़ों से तय होने लगा है.

राजनीतिक विमर्श इसमें कहाँ है? वह हो भी नहीं सकता. क्योंकि वह गम्भीर और उबाऊ विषय है. राजनीतिक सन्देशों के अब बिलकुल नये हथकंडे हैं. दक्षिण के नेताओं ने उनका सफल प्रयोग किया. सस्ता चावल, सस्ती बिजली, मुफ़्त टीवी, लैपटॉप से लेकर जाने क्या-क्या. फिर देश के दूसरे हिस्सों में भी इसे अपनाया जाने लगा. जयललिता इसे बढ़ा कर अम्मा नमक, अम्मा पानी और अम्मा कैंटीन तक ले गयीं. इससे हुआ क्या? जयललिता लोगों के लिए ‘आदि परा शक्ति’ बन गयीं. लेकिन ग़रीब तो वैसा का वैसा बना रहा. सुविधाएँ लेता रहा, वोट देता रहा, भक्ति में डूबा रहा. उसका क्या बदला ?