लोकतंत्र में आंदोलन के महत्व और लेखपालों की हड़ताल

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✍ भोलानाथ मिश्र

लोकतंत्र में धरना प्रदर्शन, कार्य बहिष्कार और जेल भरो आंदोलन सत्याग्रह आदि अधिकार एवं न्याय मांगने के माध्यम होते हैं। आजादी के समय महात्मा गांधी जी ने नारा दिया था कि-” न मारेगें न मानेगें बहादुर कष्ट झेलेगें”। यहीं कारण है आंदोलन के दौरान आंदोलनकारी पुलिस की लाठी गोली खाने के बावजूद हिंसक नहीं होते हैं।

आजतक आंदोलन, विरोध एवं कार्य बहिष्कार हड़ताल के सहारे जितनी सफलता कर्मचारी संगठनों को मिल जाती है उतनी आमलोगों को धरना प्रदर्शन करने पर जल्दी नही मिल पाती है। कहावत है कि-” संघे शक्ति कलियुगे” यानी कलियुग में सगंठन की शक्ति ही महाशक्ति होती है इसीलिए लोकतंत्र में संगठित होकर संघर्ष करने की सलाह दी जाती है।

संगठन और एकजुटता के कारण ही अगर हाथ से किसी को मुक्का मार दिया जाय तो वह मरणासन्न हो जाय वरना् एक एक करके पाँचों अगुँलियों आसानी से तोड़ा जा सकता है।सगंठनात्मक एकता एकरूपता एवं संघर्ष की पराकाष्ठा के नमूने हैं सरकारी कर्मचारियों के संगठन।यहीं कारण है कि वह जब जो चाहते हैं उसे सरकार से मनवा लेते हैं और कोई उनका बाँल तक बाँका नही कर पाता है।

इस समय लेखपालों की हड़ताल चर्चा का विषय बनी हुयी है और सरकार ने इस हड़ताल पर रोक लगा दी है। इतना ही नहीं हड़ताली लेखपालों के खिलाफ एस्मा कानून के तहत मुकदमें दर्ज कराये जा रहे हैं और लेखपालों को बर्खास्त तक करने की प्रक्रिया शुरू हो गई है।

लेखपाल पिछले काफी दिनों से अपनी कुछ लाभदायी मांगों को लेकर सांकेतिक हड़ताल चला रहे थे लेकिन इधर उन्होंने हड़ताल के स्वरूप को धरातल पर उतारकर उग्र कर दिया और सारा कामकाज बंद करके बेमियादी नेतागीरी शुरू कर दी गई है।

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इस नेतागीरी या हड़ताल का सीधा असर सरकार पर कम आमजनता पर अधिक पड़ रहा है और सबसे ज्यादा दिक्कत राजस्व मामलों में हो रही है।लोगों को जाति निवास एवं आय प्रमाण पत्र नही मिल पा रहे हैं।हड़ताल करके अपनी माँग मनवाने के आदी लेखपाल इस बार बुरे फंस गये हैं और अब गुड़ भरा हंसिया न खाते बन रहा है और न ही उगलते बन रहा है।

सरकार भी जिद्द पर अड़ गयी है और साफ कह दिया है कि पहले हड़ताल खत्म करो फिर आगे की बात करो अन्यथा कार्यवाही झेलने के लिए तैयार हो जाय। वैसे लोकतंत्र में आंदोलन हड़ताल को राष्ट्रहित में दबाया जा सकता है किन्तु जहां पर अधिकारों एवं हक की लड़ाई हो वहां पर आंदोलनकारियों की बात सुनकर उनकी जायज मांगों पर गौर करके उन्हें पूरा कराना सरकार का दायित्व होता है।

लेखपालों की माँग अगर जायज हैं तो सरकार का फर्ज बनता है कि उसे पूरा करे क्योंकि सरकार जनता के साथ अपने कर्मचारियों अधिकारियों की भी अभिभावक होती है।अभिभावक या मुखिया के बारे में कहा गया है कि-” मुखिया मुख सो चाहिए खान पान सो एक—-।

इसलिए अभिभावक घर का मुखिया होने के नाते सरकार को चाहिए कि लेखपालों की तरफ भी सहानुभूति करे लेकिन लेखपालों का भी दायित्व है कि वह संगठन को हथियार न समझ कर अपने कर्तव्यों एवं उत्तरदायित्वों का भी ध्यान रखें और संगठन का दुरपयोग न करें।

लेखपाल सीधे आमलोगों से जुड़ा राजस्व का प्रथम लोकसेवक होता है और उसकी पैमाइश एवं जाँच रिपोर्ट आदि पर अदालत सिर्फ बहस सुनती है।लेखपाल जनजीवन से जुड़ा एक महत्वपूर्ण पद होता है जिसकी भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण होती है तथा वह ग्राम पंचायत में प्रधान के सचिव की भूमिका निभाता है।

लेखपालों की हड़ताल कितनी जायज क्यों न हो लेकिन उनकी हड़ताल से सबसेे नुकसान उन्हीं परिवारों का हो रहा है जहाँ से निकलकर वह लोग लेखपाल बने हैं। सरकार की सख्ती को देखकर लेखपाल नेताओं के होश फाख्ता है और वह सभी गिरफ्तारी की भय से भूमिगत हो गये हैं। ????????