गोवा एवं मणिपुर में बीजेपी ने पेश किया सरकार बनाने का दावा

गोवा में भाजपा ने सरकार बनाने की कवायद तेज़ कर दी है। रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर के नेतृत्व में गोवा में भाजपा सरकार बनाएगी। एमजीपी, जीएफपी और 2 निर्दलीय विधायकों के समर्थन के बाद भाजपा गोवा में सरकार बनाने का दावा किया है।

मणिपुर में एनपीपी, एनएफपी और एलजेपी के समर्थन के बाद भाजपा विधायकों ने राज्यपाल नजमा हेपतुल्ला से मिलकर सरकार बनाने का दावा किया है। इस बीच टीएमसी के विधायक रबीन्द्रो ने भी भाजपा को समर्थन देने की बात कही है। इस तरह भाजपा के 21, एनपीपी और एनपीएफ के 4-4 और लोजपा, कांग्रेस और टीएमसी के 1-1 विधायकों के साथ भाजपा के समर्थन में विधायकों आकड़ा 32 तक पहुंच गया है।

पूर्वोत्तर के राज्य मणिपुर में पिछले 15 सालों से कांग्रेस की सत्ता कायम थी। यानि, मणिपुर को कांग्रेस का गढ़ माना जाता था। वक्त बदला, हवा बदली, परिवर्तन की एक ऐसी लहर चली, जिसमें भाजपा ने पहले तो असम में भारी जीत दर्ज की और अब मणिपुर में बीजेपी की मजबूत दस्तक ने साफ कर दिया कि पूर्वोत्तर में भाजपा का सूरज उग चुका है।

मणिुपर विधानसभा चुनाव में आर्थिक नाकेबंदी का मुद्दा काफी हावी रहा। आर्थिक नाकेबंदी के कारण ईंधन समेत दूसरी जरूरी वस्तुओं की भारी किल्लत पैदा हो गयी और उनकी कीमतें आसमान छू रही हैं। साथ ही, करीब 15 वर्ष तक सत्ता में रहने के बाद कांग्रेस सत्ता विरोधी लहर से भी जूझ रही थी।

लेकिन इस बीच, मणिपुर चुनाव में दूसरी सबसे हैरान करने वाली बात ये सामने आई आफस्पा कानून के खिलाफ लगभग सोलह वर्षों तक भूख हड़ताल पर बैठने वाली इरोम शर्मिला भी इस चुनाव में एक बड़ी उम्मीदवार थीं। उन्होंने मुख्यमंत्री ओकराम इबोबी सिंह के खिलाफ चुनाव लड़ा, लेकिन चुनावी दंगल में इरोम शर्मिला को 100 वोट भी नहीं मिले और उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा।

गौरतलब है कि इस बार बीजेपी और कांग्रेस के अलावा भाकपा, राजद और राकांपा के अलावा लोजपा सहित करीब एक दर्जन क्षेत्रीय पार्टियां मैदान में थी। मणिपुर में कुल 60 विधानसभा सीटों में से 40 सीटें घाटी में हैं। जबकि पहाड़ पर विधानसभा की 20 सीटें हैं। प्रदेश की राजनीति में हमेशा मेतई समुदाय का ही दबदबा रहा है। मणिपुर की करीब 31 लाख जनसंख्या में 63 फीसदी मेतई है। मुख्यमंत्री इबोबी सिंह भी मेतई समुदाय से हैं।

ऐसा साफ है कि बीजेपी ने पूर्वोत्तर में अपनी ज़मीन तैयार कर ली है। असम के बाद मणिपुर में खिलते कमल ने साबित किया है कि प्रधानमंत्री मोदी का करिश्मा पूर्वोत्तर में भी लोगों के सर चढ़कर बोल रहा है।