कचरा निस्तारण के लिए सियोल शहर से सबक ले सकता है भारत

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दक्षिण कोरिया का सियोल कचरा निस्तारण के लिए विश्व में अनूठी मिसाल पेश कर रहा है। यहां कूड़ा-करकट के पहाड़ से जाना जाने वाला नानजैडो क्षेत्र वर्ल्ड कप पार्क’ नाम में बदल गया है। यह एक विशाल पारिस्थितिकी पार्क है जो सभी के लिए आकर्षण का केंद्र है।

अनिस्तारित कूड़े-कचरे की समस्या से निपटने के लिए दक्षिण कोरिया ने एक अनूठा तरीका अपनाया है। यहाँ नानजैडो सियोल के पास एक विशाल कूड़ा डलावघर था। सालों से लगातार कूड़ा पड़ने की वजह से यहां कूड़े का पहाड़ बन गया था। लेकिन यहां की सरकार ने इस जगह के सौंदर्यकरण का बीड़ा उठाया। और अथक मेहनत के बाद कूड़ा-करकट का पहाड़, ‘वर्ल्ड कप पार्क’ नाम से एक विशाल पारिस्थितिकी पार्क में परिवर्तित कर दिया गया।

साल 2002 में आयोजित कोरिया-जापान विश्व कप खेल और नई सहस्त्राब्दी की याद में इस जगह का निर्माण 1 मई 2002 को किया गया। नानजैडो में साल 1993 से ही लगातार हर दिन हज़ारों टन कूड़ा यहां डाला जा रहा था। पार्क का निर्माण होने तक यहां तकरीबन 1 करोड़ 30 लाख टन कूड़े का पहाड़ बन चुका था। हर ओर गंदगी का आलम था। लेकिन राजनीतिक इच्छाशक्ति और प्रशासनिक कुशलता की बदौलत अब यहां का नज़ारा बदल चुका है। आज यह इलाका दक्षिण कोरिया का एक प्रसिद्ध पर्यटक स्थल बन गया है।

इस पूरे क्षेत्र को पांच अलग थीम पार्कों में बदल दिया गया है, जहाँ हर साल दुनिया भर से लाखों की तादाद में पर्यटक आते हैं। विविध पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण के लिए इन पार्कों में सभी सुविधाएं उपलब्ध हैं। इस पार्क का निर्माण इस तकनीक से किया गया है कि इसके नीचे दबे कचरे से जो ज्वलनशील गैसें निकलती हैं, उन्हें एकत्र करके उसका व्यावसायिक उपयोग किया जा सके।

सियोल में किया गया यह अद्भुत प्रयोग सही मायनों में भारत के लिए एक बड़ा सबक है। हमारे देश में कूड़े का सही ढंग से निस्तारण नहीं हो पाना एक बहुत गंभीर समस्या है। अप्रयुक्त हो चुकी डंपिंग साइट्स, पर्यावरण के लिए खतरा पैदा कर रही हैं। राजधानी दिल्ली में ही जगह-जगह कूड़े के पहाड़ खड़े हैं। ‘स्वच्छ भारत अभियान’ की सफलता के लिए भी अपशिष्ट निपटान के लिए एक प्रभावी नीति और उसके उचित क्रियान्वयन की बहुत आवश्यकता है। ऐसी अनोखे प्रयास हमारी “स्मार्ट सिटी’ परियोजनाओं में भी मील का पत्थर साबित होंगे।

सियोल शहर का रूपांतरण हम सब के सामने एक सफल उदाहरण है। दक्षिण कोरिया से सीखकर जहां अपशिष्ट निपटान की समस्या से निजात पा सकते हैं, वहीं सैलानियों के लिए पर्यावरण अनुकूल पर्यटक स्थलों का विकास भी कर सकते हैं।