क्यों भारत को आईएस के खिलाफ लड़ाई में कूदने की जरूरत नहीं है
हाल में अमेरिका के दौरे से लौटने के बाद रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने ऐलान किया कि भारत संयुक्त राष्ट्र के तहत आईएस से लड़ने के लिए तैयार है. पूरी संभावना है कि उन्होंने ऐसा अमेरिका के दबाव में कहा हो. क्योंकि भारत का उस समस्या में उलझने का कोई खास मतलब नहीं बनता जिसका लेना-देना बड़ी हद तक मध्य-पूर्व से है.
आईएस के नेतृत्व की भारत में कोई खास दिलचस्पी नहीं है. कम से कम अभी तो नहीं. उसका ध्यान सीरिया, लेबनान, इराक और उनके पड़ोसी देशों पर केंद्रित है. यह जरूर है कि आईएस ने भारतीय उपमहाद्वीप को अपना विलाया यानी प्रांत बनाने का ऐलान किया है, लेकिन उसका यह ऐलान चांद को अपना प्रांत बनाने की बात जैसा ही है. हो सकता है ऐसा उसकी इच्छा हो. यह भी हो सकता है कि इस तरह के प्रचार से इस संगठन को अपना आभामंडल बड़ा करके दिखाने में मदद मिले. लेकिन अभी अबू बकर अल बगदादी के सामने भारत में अपना झंडा लहराने से कहीं बड़ी चिंताएं खड़ी हैं.

आईएस ने भारतीय उपमहाद्वीप को अपना विलाया यानी प्रांत बनाने का ऐलान किया है, लेकिन उसका यह ऐलान चांद को अपना प्रांत बनाने की बात जैसा ही है.

आईएस भारत की तरफ कूच करने का फैसला करे, उससे पहले भारत के पास तैयारी के लिए पर्याप्त समय होगा. तब तक उसके लिए बेहतर यही है कि वह आईएस से लड़ने का काम इस आतंकी संगठन से फिलहाल लड़ाई में उलझी शक्तियों पर छोड़ दे.
आप पूछ सकते हैं कि भारत से भी तो कई लोग सीरिया जाकर आईएस के लिए लड़ रहे हैं. इस मामले में तो सबसे अच्छी रणनीति यह उम्मीद करना होगी कि वे वापस न लौटें. और अगर वे लौटते हैं तो उनसे पूछताछ करके उन पर मुकदमा चलाया जाए. भारत की खुफिया एजेंसियां और कानून का पालन सुनिश्चित करवाने वाली संस्थाएं यही काम करती हैं और उन्हें अपनी तैयारी बढ़ानी होगी.
और जो भारत में विरोध प्रदर्शनों के दौरान आईएस का झंडा लहराते हैं?  क्या वे आईएस के समर्थक नहीं हैं? जवाब है नहीं. ऐसे लोगों के लिए आईएस का झंडा उसी तरह का एक प्रेरणादायी प्रतीक है जैसे खुमैनी, अराफात या बिन लादेन की तस्वीर. यह कुछ ऐसा ही है जैसे कई ऑटो वाले अपने ऑटोरिक्शा पर फिल्मी सितारों की तस्वीरें लगाए रहते हैं. फिल्मी सितारों को शायद ही इससे कोई मतलब हो कि ऑटो का किराया क्या है या ऑटोरिक्शा चलाने वालों के लिए क्या नीतियां बन रही हैं. लेकिन ऑटोवालों के लिए ये तस्वीरें खुद को अपने जैसे दूसरे लोगों से अलग दिखाने का जरिया हो जाती हैं. जहां तक आईएस का सवाल है तो पुलिस और खुफिया एजेंसियों को इन लोगों और संगठनों की पहचान करनी चाहिए जो इस आतंकी संगठन से प्रेरणा लेने का दावा करते हैं और उन पर कड़ी निगाह भी रखनी चाहिए.

आईएस का झंडा लहराने वालों के लिए यह झंडा उसी तरह का एक प्रेरणादायी प्रतीक है जैसे खुमैनी, अराफात या बिन लादेन की तस्वीर.

आतंकवाद के मामले में भारत को मुख्य खतरा अब भी पाकिस्तान से ही है. पाकिस्तानी सेना की पनाह में चल रहे जमात उद दावा, लश्कर ए तैयबा या ऐसे तमाम संगठन अब भी सबसे बड़ी चुनौती हैं और इनके खिलाफ कार्रवाई करने के बारे में ज्यादातर पश्चिमी देश गंभीरता से नहीं सोचना चाहते क्योंकि इससे उनके राष्ट्रीय हित जुड़े हुए नहीं हैं.
उधर, भारत के साथ ऐसा नहीं है. इसके सामने इन संगठनों से लड़ने के सिवाय कोई विकल्प नहीं है. हमारे लिए अहम यह है कि हम इस तरफ ध्यान केंद्रित करें और मध्य पूर्व में ऐसे नए मोर्चे न खोलें जिनकी हमें जरूरत नहीं है.
(थिंकटैंक तक्षशिला इंस्टीट्यूशन के निदेशक नितिन पई की यह टिप्पणी मूल रूप से यहां प्रकाशित हुई है.)