देश के बालिगों को सबसे ज्यादा नाबालिगों से ख़तरा
16 दिसंबर 2012 की रात दिल्ली की एक चलती बस पर एक युवा लड़की के साथ जिस तरह सामूहिक बलात्कार और वहशी व्यवहार हुआ- उसके ब्योरे सबके रोंगटे खड़े करते रहे हैं. यह स्वाभाविक ही है कि ऐसे वीभत्स अपराध के मुजरिमों के प्रति एक तरह की घृणा पैदा हो. 16 दिसंबर 2012 के तत्काल बाद इस वारदात पर हुई देशव्यापी प्रतिक्रिया से लेकर इसके एक नाबालिग मुजरिम को छोड़ने को लेकर पैदा हुए ताज़ा गुस्से तक इस सामूहिक भावना का उचित विस्फोट दिखाई पड़ता है. लेकिन एक मुजरिम को दंड देने की सामूहिक भावना के बीच भी यह ख़याल रखना ज़रूरी है कि हमारा क्रोध न्याय के विवेक की जगह न ले ले. कि अपने गुस्से में हम कहीं ऐसे निष्कर्षों तक न पहुंच जाएं जो आने वाले दिनों में पलट कर नए अन्यायों की वजह बन जाएं.
16 दिसंबर के बाद स्त्री सुरक्षा को लेकर चली बहसों ने अनजाने और अनायास ही ‘जुवेनाइल’ को जैसे एक गंदा शब्द बना दिया है. सारी बहस जैसे यहां आकर ठिठक गई है कि ‘जुवेनाइल’ की उम्र घटाई जाए- जैसे स्त्री अपराधों के लिए ये किशोर ही सबसे बड़े ज़िम्मेदार हों, जैसे इस देश के बालिगों को इस देश के नाबालिगों से ही सबसे ज्यादा ख़तरा हो.
लेकिन हक़ीक़त क्या वाकई इतनी ख़ौफ़नाक है? क्या जुवेनाइल या किशोर उम्र के बच्चे इतने अपराध करते हैं कि उनकी उम्र राष्ट्रीय बहस का इकलौता सवाल बनती दिखे? ठोस आंकड़े कुछ और कहानी बताते हैं. भारत की आबादी में 35 फ़ीसदी हिस्सा जुवेनाइल यानी 18 साल से नीचे के किशोरों का है. जबकि 2014 के आंकड़े बताते हैं कि अपराध में उनका हिस्सा महज 1.2 प्रतिशत का है. यानी जितने नाबालिग अपराध करते हैं, उससे ज़्यादा वे अपराध झेलते हैं. और इन अपराधी नाबालिगों की पृष्ठभूमि में जाएं तो पता चलता है कि सामाजिक तौर पर कई गंभीर अपराधों के शिकार ये भी होते हैं. बाल अधिकारों के लिए काम कर रहे हर्षमंदर ने बहुत उचित ही यह लिखा है कि दरअसल नाबालिगों को बालिगों से बचाने की जरूरत है. सवाल है, महिलाओं के ख़िलाफ़ सबसे ज़्यादा अपराध कौन करता है. आंकड़े जो जवाब देते हैं, उनके मुताबिक चालीस पार की उम्र के लोग. आजकल चल रही जुवेनाइल की बहस में वे असली अपराधी छुप रहे हैं जिनकी वजह से महिलाओं का सड़क पर चलना, दफ़्तर में काम करना और यहां तक कि घर में रहना भी दूभर हो जाता है.
लेकिन हम यह देखने की बजाय एक बहुत मुश्किल लड़ाई के आसान तरीक़े और शिकार खोज कर आंदोलन और इंसाफ़ करने बैठ जाते हैं. इससे यह संदेह होता है कि क्या हम वाकई बलात्कार या महिला अपराध को लेकर इतने संवेदनशील हैं जितना दिखने की कोशिश कर रहे हैं? हमारे लिए 16 दिसंबर का गैंगरेप बस एक प्रतीक भर है जिसके मुजरिमों को जेल से न निकलने देकर हम यह तसल्ली पाल लेंगे कि इंसाफ़ हो गया, जिसमें हमारी भी भूमिका रही और लड़कियां अब सुरक्षित हैं. जबकि सच्चाई यह है कि 16 दिसंबर के बाद भी बलात्कार या यौन शोषण से जुड़े अपराधों में कमी नहीं आई है- कहीं छोटी बच्चियां तो कहीं बुज़ुर्ग महिलाएं इस वहशत की जद में हैं. 16 दिसंबर 2012 की तारीख़ बेशक इस लिहाज से अहम है कि इस दिन घटी एक त्रासदी को भारतीय महिलाओं ने अपने साथ हो रहे अपराध की एक बड़ी स्मृति में बदला और वह ज़रूरी बहस खड़ी की जिसके बाद बलात्कार या यौन उत्पीड़न की शिकार लड़कियां खुलकर सामने आ रही हैं, अपनी शिकायत दर्ज करा रही हैं.
लेकिन यह काफी नहीं है. यह समझना भी ज़रूरी है कि बलात्कार इस देश में सामाजिक उत्पीड़न और राजनीतिक दमन तक का हथियार है. दबंग और आर्थिक तौर पर ताकतवर जातियां दलित और कमज़ोर पृष्ठभूमि से आई लड़कियों को बार-बार इसका शिकार बनाती रही हैं जिस पर कहीं कोई नाराज़गी नहीं दिखती. झारखंड और छत्तीसगढ़ से लेकर पूर्वोत्तर और कश्मीर तक सुरक्षा के नाम पर तो कभी राजनीतिक दमन के लिए, लड़कियां बलात्कार की शिकार बनाई जाती रहीं. छत्तीसगढ़ की सोनी सोरी ने जो कुछ झेला, वह निर्भया से ज़रा ही कम था- लेकिन सोनी सोरी पर नक्सली होने की मुहर लगाई गई, शायद इसीलिए सबने मान लिया कि उसके साथ जो हुआ, वह जायज़ हुआ. अगर नहीं तो जंतर-मंतर पर वह भीड़ उसके लिए क्यों नहीं उमड़ी जो निर्भया के लिए उमड़ी?
इस पूरी बहस में एक पक्ष उस तथाकथित आधुनिकता का है जो बाजार बना रहा है. बाज़ार ने बड़े निर्मम ढंग से स्त्री को सिर्फ देह में और उसकी देह को बस वस्तु में बदल डाला है. जो फिल्में बन रही हैं, जो विज्ञापन बन रहे हैं, जो बाज़ार का पूरा तामझाम बन रहा है, वह स्त्री देह को चारे की तरह इस्तेमाल कर रहा है. पिछले दिनों पटना में स्त्रियों पर चल रही एक कार्यशाला के दौरान अभिनेत्री सोनल झा ने किसी टीवी चैनल पर चल रहे क्रिकेट मैच के बाद के एक आयोजन का ज़िक्र किया जिसमें एक स्टार खिलाड़ी तो पूरे सूटबूट में बात कर रहे थे लेकिन उनके साथ जो महिला थी, वह बिल्कुल खुले परिधानों में थी. जाहिर है, क्रिकेट की चर्चा में भी लड़की के क्रिकेट-ज्ञान से ज्यादा अहम उसका ग्लैमरस दिखना है. यह अनायास नहीं है कि इन दिनों बड़ी तेजी से दुनिया भर में फूल-फल रहे पर्यटन उद्योग के नाम पर सबसे ज़्यादा ‘सी, सन और सेक्स’ बेचा जा रहा है. इक्कीसवीं सदी में औरत की तस्करी का कारोबार ऐसे ग्लोबल आयाम ले चुका है, जैसा पहले किसी सदी ने देखा न हो.
तो एक तरफ़ स्त्री को लगातार हेय और उपभोग्य और कमतर बनाती बाज़ार-प्रेरित तथाकथित आधुनिकता है जो उसे सामान में बदलती है और दूसरी तरफ सामाजिक, आर्थिक और मर्दवादी आधार पर उसका लगातार उत्पीड़न कर रही परंपरा भी है, जो उसकी आज़ादी को उसकी बदचलनी की तरह देखती है. इन दोनों के बीच अगर कोई निर्भया अकेली निकलती है तो वह बस इसलिए असुरक्षित नहीं होती कि कुछ खूंखार किस्म के लड़के उसके पीछे लग जाते हैं. वह इसलिए भी असुरक्षित होती है कि इस आधुनिकता ने उसे सामान बना डाला है और परंपरा ने उसे बदचलन ठहरा दिया है. इसलिए उस पर हमला आसान होता है, वह एक आसान शिकार होती है. निर्भया के मामले में शिकारियों की हैसियत अगर कुछ बड़ी होती, अगर वे किन्हीं बड़े घरों के बेटे होते तो कहना मुश्किल है कि वे उतनी आसानी से पकड़े जाते जितनी आसानी से ये बस ड्राइवर, क्लीनर या फल विक्रेता पकड़े गए.
बहरहाल, इस बहस के आख़िरी सिरे पर लौटें – उस खूंखार नाबालिग तक जो समाज के लिए सबको ख़तरा लग रहा है. हो सकता है, वह ख़तरा हो, लेकिन फिर यह सवाल पूछना ज़रूरी हो जाता है कि आख़िर बाल सुधार गृह में उसके बिताए तीन सालों के दौरान वाकई उसको सुधारने की कोशिश क्यों नहीं हुई? क्योंकि हमारी जेलों की तरह हमारे बाल सुधार गृह भी अपराध छुड़ाने के नहीं, अपराधी बनाने के कारख़ाने हैं. बाल सुधार गृहों की अपनी एक हकीक़त है जिसे देखकर कोई न्यायप्रिय व्यवस्था शर्मसार हो जाए. अगर ऐसा नहीं होता, बाल सुधार गृह वाकई बाल सुधार गृह होते तो इस नाबालिग मुजरिम को वे कुछ बदलते. लेकिन यह सोच शायद वहां विकसित ही नहीं हो पाई.
दरअसल हमारे नाबालिग मुजरिम हमारी अपनी सामाजिक विफलताओं की संतानें हैं. हम इस विफलता को पहचानने और स्वीकार करने की जगह ऐसा दिखावा कर रहे हैं जैसे इस मुजरिम को कुछ और सज़ा देकर हम अपनी निर्भयाओं को बचा लेंगे. जबकि लड़ाई की यह मुद्रा उस वास्तविक लड़ाई से काफी दूर ही नहीं, उसके विरुद्ध भी खड़ी है जो निर्भयाओं को एक गरिमापूर्ण और सुरक्षित जीवन देने के लिए ज़रूरी है. क्योंकि अंततः एक स्त्री के सम्मान के लिए अपरिहार्यतः एक व्यापक मानवीय समाज का होना ज़रूरी है जो अपनी लड़कियों की भी फिक्र करे, अपने नाबालिगों और बच्चों की भी.