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मोमबत्ती की मद्धिम रोशनी मुझे सुकून देती है

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आलेख – स्व. खुशवंत सिंह
मैं तब लाहौर कॉलेज में था। मियां सर फजल हुसैन सूबे के काबीना मंत्री थे। उनके बड़े बेटे कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे थे। एक शाम को वहां बिजली चली गई। उन्होंने अपने पिता को लिखा। मैं मोमबत्ती की रोशनी में पढ़ाई कर रहा हूं। वह थरथराती है और बुझ जाती है। यह एक किस्म की भविष्यवाणी थी। वह कुछ दिन बाद चल बसे।
वह चिट्ठी दो अंग्रेजी अखबारों में छपी थी। लाहौर से निकलने वाले ‘द ट्रिब्यून’ और ‘द सिविल ऐंड मिलिटरी गजट’ में। न जाने क्यों, उस लिखे को मैं भूल नहीं पाता हूं। मैं असगरी कादिर को उसकी याद दिलाता रहता हूं। वह उनकी छोटी बहन हैं। वह और उनके शौहर मंजूर हमारे परिवार के नजदीक रहे हैं।
मैं शायद ठीक-ठीक कारण नहीं जानता, लेकिन मोमबत्ती का असर मुझ पर चढ़कर बोलता है। सुबह बहुत जल्द उठ जाता हूं। उस वक्त अंधेरा होता है। मैं अपने बेडरूम में मोमबत्ती जलाता हूं। लाइट का इस्तेमाल तभी करता हूं, जब सुबह के अखबार आ जाते हैं।
शाम को अपने मिलने वालों के आने से पहले मैं तीन मोमबत्ती जलाकर रखता हूं। अब जब भी कोई खूबसूरत महिला मेहमान आती है, तभी मैं लाइट जलाता हूं। ताकि मैं उसका चेहरा ठीक से देख पाऊं। जब बेगम दिलशाद शेख आती हैं, तो मुझे लाइट जलानी ही पड़ती है। वह अपनी सर्दियां दिल्ली में ही बिताती हैं। और वह भी मेरे पड़ोस में। उनको देखकर मुझे कुछ लाइनें याद आती हैं-
यही है मेरी तमन्ना, यही है मेरी आरजू/ तू सामने बैठा करे और मैं तुझे देखा करूं।
कुल मिलाकर मैं अपने पढ़ने वालों को यह सलाह देना चाहता हूं कि मोमबत्ती का इस्तेमाल करें। लाइट खासी चकाचौंध पैदा करती है। मोमबत्ती मन और आत्मा को सुकून देती है और हमारी पुरानी यादों को ताजा कर जाती है।