बदलते भारत की तस्वीर बनी कुंवर बाई, बकरियां बेच कर बनाया शौचालय

बदलाव का जज़्बा कोई कुंवरबाई से सीखे। जिस उम्र में लोगों की हिम्मत नहीं होती है उस उम्र में छत्तीसगढ़ की कुवंरबाई ने अपने गांव में ऐसी मिसाल पेश की जिसे देख लोग उसी ओर मुड़ चले। 104 साल की कुवंर बाई ने शौचालय बनवाने के लिए अपनी बकरीयां बेच दी और उनकी इस पहल से पूरे गांव की तस्वीर ही बदल गई।

क्या अकेले कोई मुहिम शुरू की जा सकती है। तो आमतौर पर यही कहा जाता है कि नहीं ये तो मुमकिन ही नहीं है। दिमाग में यही तो चलता है कि हम तो अकेले है हम क्या कर सकते है। अगर आप ऐसा सोचते है तो ज़रा रूकिये और मिलिए 104 साल की उम्र में आपको और हमे कुछ करने ..कुछ सोचने पर मजूबर करने वाली कुंवर बाई से। नामुमकिन को मुमकिन बनाने की ये कहानी है कुंवर बाई की। उम्र के इस आखिरी पड़ाव पर भले ही देखने सुनने की क्षमता न हो लेकिन समाज के लिए कुछ करने की…एक नई लकीर खींचने की क्षमता कहीं से भी कम नहीं है।

अपने गांव में कुंवर बाई अम्मा के नाम से मशहूर है। धमतरी जिले में जब लोगों से शौचालय बनाने की अपील की गई तो गांव की 104 वर्षीया कुंवर बाई यादव सबसे पहले इस काम में अपना सहयोग देने के लिए आगे आईं। यह उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति का ही कमाल है जो आज इस गांव का कायाकल्प हो गया है। बकरियां चराकर जीवन-यापन करने वाली कुंवर बाई ने बकरियां बेचकर 22 हजार रुपये में गांव में सबसे पहले शौचालय बनवाया।

छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले में गंगरेल जलाशय के पास कुदरत की खूबसूरती और वन संपदाओं से हरा-भरा गांव कोटार्भी है। कुवंर बाई का गांव। अब तस्वीर बदल चुकी है। गांव के लोग अब खुले में शौच नहीं जाते हैं। ये सब अगर हो पाया है तो सिर्फ कुंवर बाई के कारण। उन्होनें बाकायदा घर-घर जाकर लोगों को शौचालय बनाने के लिए प्रेरित किया और गांववालों को इसके फायदे समझाने में कामयाब भी हुईं।

इस इस प्रेरणादायी कहानी की शुरूआत हुई थी प्रधानमंत्री मोदी के उस संकल्प के साथ जिसमें वो सवा सौ करोड़ भारतीयों को एक साथ लेकर देश को गंदगी से मुक्ति की तरफ ले जाने का आह्वान किया था। यहीं से एक आंदोलन की शुरूआत हुई। कोटार्भी में लगभग साढ़े चार सौ लोगों की जनसंख्या है।

शुरूआत की कुंवर बाई ने। बकरियां चराकर जीवन-यापन करने वाला बूढ़ा शरीर भले ही जवाब दे रहा हो लेकिन उनकी जिंदादिली व जुझारुपन हर किसी के लिए एक उदाहरण है। आखि‍र उन्हीं की बदौलत कोटार्भी के खुले में शौच से मुक्त घोषित हो चुका है। कुंवर बाई ने अकेले आगाज़ किया सब मिल गये तो मकदस को अंजाम मिला।