जमीन पर उतर रहा है हिंदू राष्ट्र का सपना

र्जिकल स्ट्राइक, नोटबंदी और अब योगी आदित्यनाथ यह तीसरी शॉक थेरेपी बता रही है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीतिक मंसूबों को भांपना किसी भी राजनीतिक पंड़ित के लिए आसान नहीं है। योगी आदित्यनाथ उत्तरप्रदेश में भाजपा के पोस्टर बॉय नहीं थे। और न ही उस कद के नेता थे जिनके नाम पर गंभीर कयास लगाए जा सके।

वे तो उस फायर ब्रांड ब्रिगेड के अग्रणी मेंबर थे जिनकी पहचान भड़काउ बयान और ध्रुवीकरण की राजनीति रही। भाजपा चुनाव से पहले ऐसा कोई कदम नहीं उठाना चाहती थी। एक भगवा चेहरा और विकास का एजेंडा के साथ साथ नहीं चल सकता था। तो क्या यह चौकाने वाला कार्ड था जिसे सत्ता आने के बाद ही खेला जाना था? कयास कुछ भी लगाए जा सकते हैं।

उत्तराखंड और अब यूपी दोनों ही जगह पर संघ के प्रचारक और कट्टर हिंदूवादी की मुख्यमंत्री के पद पर ताजपोशी बता रही है कि संघ का समग्र हिंदू राष्ट्र का सपना अब जमीन पर उतरने लगा है। उत्तरप्रदेश में एक लाख से ज्यादा सक्रिय स्वंय सेवकों और पूर्णकालिक प्रचारकों ने अपनी सेवाएं दी थीं। अलग अलग समितियां अलग अलग नामों से सक्रिय संगठनों ने बिखरी जातियों को एकजुट करने में अपनी ताकत झोंकी थी।

संघ का मकसद ही जातियों में बंटे भारतीय समाज को हिंदूत्व के बैनर तले एकसाथ लाना है। निसंदेह उत्तरप्रदेश संघ के लिए एक मॉडल स्टेट बनकर सामने आया है। जहां चुनाव में जातियां खत्म हुई और हिंदू बड़ा वोटबैंक बना। अब यहीं सफलता 2019 में दोहरानी है तो योगी आदित्यनाथ पर जाना होगा। वे संघ की भी पंसद है।

योगी का मतलब है उत्तरप्रदेश में दिखने वाला कट्टर हिंदूत्व का चेहरा,और राममंदिर के निर्माण को लेकर बंधती उम्मीदें। कोई अतिशयोक्ति नहीं अगर 2019 से पहले सर्वानुमति का कोई रास्ता खोजकर योगी आदित्यनाथ राम मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त कर दें। यह बात अलहिदा है कि उत्तरप्रदेश का 20 प्रतिशत मुसलमान योगी के पूर्व भड़काउ बयानों से आज स्वयं को असहज और भयग्रस्त मेहसूस कर रहा हो।

यह तो वकत ही बताएगा कि योगी एक फायर ब्रांड नेता से हटकर जब मुख्यमंत्री के पद पर अब काबिज हैं तो क्या करते हैं। यहां उस घटना को भी याद करना होगा जब पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने देश के प्रधानमंत्री की दौड़ में रहते हिंदूत्व की छवि से हटकर पाकिस्तान में जिन्ना की मजार पर जाकर उन्होंने जो बात कही उसने उनकी राजनीति की दिशा बदल दी। संघ ने जता दिया कि राजनीति के लिए सिध्दांतों से समझौता मंजूर नहीं है।

माना जा रहा है कि मोदी ने एक सप्ताह की कवायद के बाद योगी आदित्यनाथ के नाम पर मोहर लगाकर एक तरह से 17 साल के पुराने इतिहास को दोहराया है। जब पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने उन्हें संघ प्रचारक से गुजरात का मुख्यमंत्री बना दिया था। और मोदी पर अपना पूरा प्रभाव रखते हुए आडवाणी अपनी मौजूदगी दर्ज करवा रहे थे। क्या ऐसा ही अब उत्तरप्रदेश में होगा। अनुभव हीन युवा योगी आदित्यनाथ अमित शाह और मोदी के प्रभाव से सत्ता चलाने का ककहरा सीखेंगे?

भाजपा के अंदरूनी हलकों में अब योगी आदित्यनाथ मोदी, अमित शाह के बाद ताकतवर नेताओं की पंक्ति में खड़े दिखाई दे रहे हैं। यूपी के दिग्गज नेता केंद्रीय मंत्री राजनाथसिंह दरकिनार दिख रहे हैं, क्योंकि यूपी में उनका जनाधार नहीं है। वे हर बार अपनी सीट बदल बदल कर चुनाव लड़ते हैं।

योगी उ व्यापक जनाधार वाले नेता हैं। गोरखपुर से लेकर पूर्वी उत्तरप्रदेश की पचास से ज्यादा विधानसभा सीटों पर उनका सीधा प्रभाव है। वे ध्रुवीकरण की राजनीति में अव्वल हैं, और तीखे और आक्रामक वक्ता हैं। मोदी ब्रांड पर जीते गए उत्तरप्रदेश के चुनाव में वे एक भारी जोखिम भी है, बावजूद इसके उन पर दांव खेला गया है। क्योंकि 2019 की नैया को पार करने के लिए सिर्फ विकास का चप्पू नहीं कट्टर हिंदूवाद चाहिए।

लेखक – जयश्री पिंगले