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पहाड़ काट कर जबलपुर डुमना में लॉ यूनिवर्सिटी निर्माण कहाँ तक न्याय संगत

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हाड़ स्थानीय पर्यावास, समाज, अर्थ व्यवस्था, आस्था, विश्वास का प्रतीक होते हैं। प्रकृति में जिस पहाड़ के निर्माण में हजारों-हजार साल लगते हैं, हमारा समाज उसे उन निर्माणों की सामग्री जुटाने के नाम पर तोड़ देता है जो कि बामुष्किल सौ साल चलते हैं। पहाड़ केवल पत्थर के ढेर नहीं हाते, वे इलाके के जंगल, जल और वायु की दिशा और दशा तय करने के साध्य होते हैं। जहां सरकारी निर्माण पहाड़ के प्रति बेपरवाह है तो पहाड़ की नाराजी भी समय-समय पर सामने आ रही है, कभी हिमाचल में तो कभी कश्मीर में तो कभी महाराश्ट्र या मध्यप्रदेश में अब धीरे धीरे यह बात सामने आ रही है कि पहाड़ खिसकने के पीछे असल कारण उस बेजान खडी संरचना के प्रति बेपरवाही ही था।

 


गलत आकलन का दोषी कौन ?
डाउन टू अर्थ के अनुसार ये बात सामने आई कि पहाड़ सुरंग व खुदाई के दौरान अक्सर अस्थिर हो जाते हैं। जबलपुर डुमना में लॉ यूनिवर्सिटी (धर्मशास्त्र विधि विश्वविद्यालय ) निर्माण के पहाड़ की भूमि को चुना गया है। ये कहाँ तक न्याय सांगत है। एक उदाहरण गुजरात का देते है जहाँ पर गुजरात से देश की राजधानी को जोड़ने वाली 692 किलोमीटर लंबी अरावली पर्वतमाला को ही लें, अदालतें बार-बार चेतावनी दे रही हैं कि पहाड़ों से छेड़छाड़ मत करो, लेकिन बिल्डर लॉबी सब पर भारी है। मतलब यहाँ पर अरावली पर्वतमाला से छेड़ छाड़ पर अदालतें बार-बार चेतावनी दिए जा रही है और वही लॉ यूनिवर्सिटी (धर्मशास्त्र विधि विश्वविद्यालय ) निर्माण पर पहाड़ कटाई व छेड़ छाड़ मौन धारण कर रही है।

अगर कोई अनहोनी होती है तो इसके लिए खराब भू-विज्ञान को इसका दोषी माना जायेगा जो इस जगह का चयन करवाने में आपत्ति नहीं की। जबलपुर डुमना लॉ यूनिवर्सिटी परियोजना के लिए आवश्यक भूमि का मूल्यांकन गलत भी हो सकता है जरुरत है आज जिम्मेदारों को गहन विचार करने की तभी प्रकृति के साथ छेड़ छाड़ करने की कोशिस करें।

 

निर्माण के दौरान ये घटनाये भी घट सकती है
भू-स्खलन की घटनाये भी हो सकती है खुदाई करने वाली मशीन निर्माणाधीन बिल्डिंग पहाड़ों में दफन हो सकती है उस वक्त जवाबदार कौन होगा। जबलपुर भूकंप प्रभावित क्षेत्र होने के कारण आज सरकार / हाईकोट इन पहाड़ों को काटने की इजाजत क्यों दे रहा है। क्या आम नागरिक के लिए पहाड़ों को काटने पर प्रतिबन्ध तो हाईकोट अपने विकास के लिए प्रकृति से छेड़ छाड़ क्यों करना चाह रहा है। हाईकोट की निगाह केवल इससे होने वाली आय पर है जबकि समाज बता रहा है कि पहाड़ के साथ ही वहां की हरियाली, जल संसाधन, जीव-जंतु सभी कुछ खतम हो रहे है। विकास के नाम पर ऐसे ही पहाड़ों की कटाई चालू रही तो वह दिन दूर नहीं जब जबलपुर अपनी प्रकृतिक सुंदरता खो कर केवल रेगिस्तान में तब्दील हो जायेगा।

एक नज़ारा एयरपोर्ट विस्तारीकरण का देख लिया जाय
ठीक इसी पहाड़ी के पीछे एयरपोर्ट का विस्तारीकरण किया जा रहा है जहाँ पर पहाड़ों को मनमाने तरीके से बारूद से उड़ाने वाले इंजीनियरों ने ऐसे ऐसा काटा है कि सैकड़ों फिट खाई में तब्दील करवा दिया है। यहाँ पर अगर कोई मवेशी या अंजान अगर भागते हुए आता है तो वह यकाएक 300 फिट गहरी खाई में गिर कर मौत की नींद सो जायेगा। मानव को अपने विकास के लिए प्रकृति की डिस्टर्ब करने वाली जगह ही उपयोगी लगती है।

एयरपोर्ट का विस्तारीकरण जहाँ पर पहाड़ों को मनमाने तरीके से ऐसा काटा है

दूसरा नज़ारा इस COD पहाड़ी का देखे
लॉ यूनिवर्सिटी के लिए हॉस्टल बनाने के लिए COD से लगी पहाड़ी को चुना गया है यहाँ पर भी चुना से खुदाई का मैप बना दिया गया है। रक्षा मंत्रालय भी इस पर चुप्पी साधे हुए है। बम गोला बारूद के बीच स्टूडेंट की जिंदगी हॉस्टल में बीतेगी। इन पहाड़ की कटाई पर अगर जबलपुर शहर को किसी प्रकार की त्रासदी का सबसे खौफनाक मंजर देखना पड़ जाय तो क्या होगा ! क्या यही सोच रहे है जो होगा देखा जायेगा ? तब मंदिर में घंटा बजाने से कुछ नहीं होगा, क्योकि ईश्वर को अपने यहीं नाराज़ कर दिया है, तब प्रकृति भी आपसे कहेगी अब कुछ नहीं हो सकता ये मेरा फैसला है। तब अपनी व्यथा के आंसू पोंछते हुए मंदिरों में घंटा बजाते बैठे रहिएगा। इसपर विचार किया जाय। क्या ऐसा विकास शहर चाहता है? सोचिये जरा पहाड़ के नाराज होने पर होने वाली त्रासदी का सबसे खौफनाक मंजर अभी कुछ साल पहले ही उत्तराख्ांड में केदारनाथ यात्रा के मार्ग पर देखा गया था। देश में पर्यावरण संरक्षण के लिए जंगल, पानी बचाने की तो कई मुहीम चल रही है, लेकिन मानव जीवन के विकास की कहानी के आधार रहे पहाड़-पठारों के नैसर्गिक स्वरूप को उजाड़ने पर कम ही विमर्ष है। समाज और सरकार के लिए पहाड़ अब जमीन या धनार्जन का माध्यम रह गए हैं और पहाड़ निराश-हताश से अपनी अंतिम सांस तक समाज को सहेजने के लिए संघर्श कर रहे हैं।

दूसरा नज़ारा इस COD पहाड़ी का देखे

समाज पहाड़ का उपयोग खनिज के लिए, सड़क व पुल की जमीन के लिए या फिर निर्माण सामग्री के लिए, बस्ती के लिए, विस्तार के लिए करता आ रहा है। जब जमीन बची नहीं तो लोगों ने पहाड़ों को सबसे सस्ता, सुलभ व सहज जरिया मान लिया। उस पर किसी की दावेदारी भी नहीं थी।

सतपुडा, मेकल, पश्चिमी घाट, हिमालय, कोई भी पर्वतमालाएं लें, खनन ने पर्यावरण को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है। रेल मार्ग, एयरपोर्ट का विस्तारीकरण या हाई वे बनाने के लिए पहाड़ों को मनमाने तरीके से बारूद से उड़ाने वाले इंजीनियर इस तथ्य को नजरअंदाज कर देते हैं कि पहाड़ स्थानीय पर्यावास, समाज, अर्थ व्यवस्था, आस्था, विश्वास का प्रतीक होते हैं।

पारंपरिक समाज भले ही इतनी तकनीक ना जानता हो, लेकिन इंजीनियर तो जानते हैं कि धरती के दो भाग जब एक-दूसरे की तरफ बढ़ते हैं या सिकुडते हैं तो उनके बीच का हिस्सा संकुचित हो कर ऊपर की ओर उठ कर पहाड़ की शक्ल लेता है। जाहिर है कि इस तरह की संरचना से छोड़छाड़ के भूगर्भीय दुश्परिणाम उस इलाके के कई-कई किलोमीटर दूर तक हो सकते हैं।

पुणे जिले के मालिण गांव का उदाहरण लो जहाँ कुछ ही दूरी पर एक बांध है, उसको बनाने में वहां की पहाड़ियों पर खूब बारूद उड़ाया गया था। मालिध्ण वहीं गांव है जो कि दो साल पहले बरसात में पहाड़ ढहने के कारण पूरी तरह नश्ट हो गया था। यह जांच का विषय है कि इलाके के पहाड़ों पर हुई तोड़-फोड़ का इस भूस्खलन से कहीं कुछ लेना-देना है या नहीं। किसी पहाड़ी की तोड़फोड़ से इलाके के भूजल स्तर पर असर पड़ने, कुछ झीलों का पानी पाताल में चले जाने की घटनाएं तो होती ही रहती हैं।

यदि धरती पर जीवन के लिए वृक्ष अनिवार्य है तो वृक्ष के लिए पहाड़ का अस्तित्व बेहद जरूरी है। वृक्ष से पानी, पानी से अन्न तथा अन्न से जीवन मिलता है। ग्लोबल वार्मिंग व जलवायु परिवर्तन की विश्वव्यापी समस्या का जन्म भी जंगल उजाड़ दिए गए पहाड़ों से ही हुआ है।

यह विडंबना है कि आम भारतीय के लिए ‘‘पहाड़’’ पर्यटन स्थल है या फिर उसके कस्बे का पहाड़ एक डरावनी सी उपेक्षित संरचना। विकास के नाम पर पर्वतीय राज्यों में बेहिसाब पर्यटन ने प्रकृति का हिसाब गड़बउ़ाया तो गांव-कस्बों में विकास के नाम पर आए वाहनों, के लिए चौड़ी सड़कों ेक निर्माण के लिए जमीन जुटाने या कंक्रीट उगाहने के लिए पहाड़ को ही निशाना बनाया गया। यही नहीं जिन पहाड़ों पर इमारती पत्थर या कीमती खनिज थे, उन्हें जम कर उजाड़ा गया और गहरी खाई, खुदाई से उपजी धूल को कोताही से छोड़ दिया गया। राजस्थान इस तरह से पहाड़ों के लापरवाह खनन की बड़ी कीमत चुका रहा है। यहां जमीन बंजर हुई, भूजल के स्त्रोत दूषित हुए व सूख गए, लोगों को बीमारियां लगीं व बारिश होने पर खईयों में भरे पानी में मवेशी व इंसान डूब कर मरे भी।

आज हिमालय के पर्यावरण, ग्लेषियर्स के गलने आदि पर तो सरकार सक्रिय हो गई है, लेकिन देश में हर साल बढ़ते बाढ़ व सुखाड़ के क्षेत्रफल वाले इलाकों में पहाड़ों से छेड़छाड़ पर कहीं गंभीरता नहीं दिखती। पहाड़ नदियों के उदगम स्थल हैं। पहाड़ नदियों का मार्ग हैं, पहाड़ पर हरियाली ना होने से वहां की मिट्टी तेजी से कटती है और नीचे आ कर नदी-तालाब में गाद के तौर पर जमा हो कर उसे उथला बना देती है। पहाड़ पर हरियाली बादलों को बरसने का न्यौता होती है, पहाड़ अपने करीब की बस्ती के तापमान को नियंत्रित करते हैं, इलाके के मवेषियें का चरागाह होते हैं। ये पहाड़ गांव-कस्बे की पहचान हुआ करते थे। और भी बहुत कुछ कहा जा सकता है इन मौन खड़े छोटे-बड़े पहाड़ों के लिए, लेकिन अब आपको भी कुछ कहना होगा इनके प्राकृतिक स्वरूप को अक्षुण्ण रखने के लिए।